भाव और भावेश: केंद्र, त्रिकोण और दुःस्थान — पाठ 5
Bhava and Bhavesh Kendra Trikona Dusthana Houses
कुंडली के 12 भाव (Houses) चार मुख्य समूहों में बँटे हैं: केंद्र (1, 4, 7, 10), त्रिकोण (1, 5, 9), दुःस्थान या त्रिक (6, 8, 12) और उपचय (3, 6, 10, 11)। हर भाव की राशि का जो स्वामी ग्रह है, वह उस भाव का भावेश (House Lord) कहलाता है। भावेश कुंडली में जहाँ बैठता है, उस भाव के फल को अपने भाव से जोड़ देता है। इसी से पता चलता है कि कोई भाव अपने फल देगा या उसमें बाधा आएगी।
यह हमारी सीखने की शृंखला का पाँचवाँ पाठ है। पहले पाठ में हमने 12 भाव और 9 ग्रह पहचाने, दूसरे पाठ में लग्न समझा, तीसरे में ग्रह का राशिगत बल और पिछला पाठ ग्रह दृष्टि पर था। अब हम भावों को समूहों में देखना सीखेंगे और यह समझेंगे कि भावेश की स्थिति से किसी भाव का फल कैसे पढ़ा जाता है। यही वह पाठ है जहाँ से असली फलकथन शुरू होता है।
भाव और भावेश: दो अलग चीज़ें, एक ही कहानी
नए विद्यार्थी अक्सर भाव और भावेश को मिला देते हैं, इसलिए पहले अंतर साफ़ कर लें। भाव कुंडली का घर है, जीवन का एक क्षेत्र: पहला भाव शरीर और स्वभाव, दूसरा धन और कुटुंब, चौथा माता और सुख, सातवाँ विवाह, दसवाँ कर्म। भाव स्थिर हैं, हर कुंडली में बारह ही रहते हैं। भावेश वह ग्रह है जो उस भाव में पड़ी राशि का स्वामी है। चूँकि हर लग्न में भावों पर राशियाँ अलग बैठती हैं, इसलिए भावेश हर लग्न के लिए बदल जाते हैं।
उदाहरण लें। मेष लग्न में चौथे भाव पर कर्क राशि है, इसलिए चतुर्थेश चंद्रमा हुआ। वृषभ लग्न में चौथे भाव पर सिंह राशि है, वहाँ चतुर्थेश सूर्य है। भाव वही चौथा, पर उसका स्वामी अलग। इसलिए किसी भाव का फल जानने के लिए तीन बातें देखी जाती हैं: भाव में कौन ग्रह बैठा है, भाव पर किसकी दृष्टि है, और भावेश कहाँ, किस बल में बैठा है। पिछले पाठ में हमने दृष्टि सीखी; आज तीसरी बात, भावेश की स्थिति, पर पूरा ध्यान देंगे।
केंद्र भाव: कुंडली के चार स्तंभ
पहला, चौथा, सातवाँ और दसवाँ भाव केंद्र (Kendra या Angular Houses) कहलाते हैं। इन्हें 'विष्णु स्थान' भी कहा गया है। केंद्र कुंडली के चार कोने हैं: लग्न (स्वयं), चतुर्थ (सुख, घर, माता), सप्तम (जीवनसाथी, साझेदारी) और दशम (कर्म, पद, प्रतिष्ठा)। ये जीवन के वे क्षेत्र हैं जो दिखाई देते हैं, जिनसे संसार में व्यक्ति की पहचान बनती है।
केंद्र का ग्रह बलवान माना जाता है। इसलिए दिग्बल की पूरी व्यवस्था केंद्रों पर टिकी है: गुरु और बुध लग्न में, चंद्रमा और शुक्र चौथे में, शनि सातवें में, तथा सूर्य और मंगल दसवें भाव में दिग्बली होते हैं। केंद्र में बैठा ग्रह, शुभ हो या पाप, अपने फल देने की क्षमता पाता है। पाराशरी परंपरा में केंद्रों का क्रम भी बताया गया है: दशम सबसे बलवान, फिर सप्तम, फिर चतुर्थ और फिर लग्न; हालाँकि लग्न अपने आप में त्रिकोण भी है, इसलिए उसकी महत्ता अलग है।
केंद्र की एक विशेष बात याद रखें, जिसे केंद्राधिपत्य दोष कहा जाता है: केंद्र का स्वामित्व पाने पर शुभ ग्रह (गुरु, शुक्र, बुध, बली चंद्रमा) अपनी शुभता कुछ खो देते हैं और पाप ग्रह (शनि, मंगल, सूर्य, क्षीण चंद्रमा) अपनी क्रूरता छोड़कर उदासीन हो जाते हैं। इसका अर्थ यह नहीं कि केंद्रेश बुरा फल देगा; बस वह अकेले केंद्र के स्वामित्व से शुभ नहीं हो जाता। यह सूत्र लघुपाराशरी का मूल सिद्धांत है, और अगले पाठ में लग्न अनुसार शुभ-अशुभ ग्रह समझते समय यह बार-बार काम आएगा।
त्रिकोण भाव: भाग्य और पुण्य का त्रिभुज
पहला, पाँचवाँ और नौवाँ भाव त्रिकोण (Trikona या Trine Houses) हैं। इन्हें 'लक्ष्मी स्थान' कहा गया है। लग्न शरीर और वर्तमान जन्म है, पंचम पूर्व पुण्य, बुद्धि, संतान और मंत्र का भाव है, और नवम भाग्य, धर्म, गुरु और पिता का। त्रिकोण का सीधा संबंध धर्म से है, इसलिए इनके स्वामी हमेशा शुभ फल देने वाले माने जाते हैं, चाहे वे स्वभाव से पाप ग्रह ही क्यों न हों।
यही त्रिकोण का सबसे बड़ा नियम है: त्रिकोणेश सदा शुभ। मेष लग्न के लिए नवमेश गुरु शुभ है, यह तो समझ में आता है; पर कुंभ लग्न के लिए नवमेश शुक्र और वृषभ लग्न के लिए पंचमेश बुध भी शुभ हैं, और मकर लग्न के लिए पंचमेश शुक्र शुभ है। त्रिकोण का स्वामित्व ग्रह को वह शुभता देता है जो केंद्र का स्वामित्व नहीं देता। नवम भाव को त्रिकोणों में सबसे बलवान माना गया है, फिर पंचम, फिर लग्न।
पाराशरी ज्योतिष का सबसे प्रसिद्ध योग यहीं से निकलता है: केंद्र और त्रिकोण के स्वामियों का संबंध राजयोग बनाता है। संबंध चार तरह से बन सकता है: दोनों एक ही भाव में युति करें, एक-दूसरे को देखें (परस्पर दृष्टि), एक-दूसरे की राशि में बैठें (परिवर्तन), या एक दूसरे के भाव में बैठकर दूसरा उसे देखे। जैसे कर्क लग्न में मंगल चतुर्थेश और नवमेश दोनों है, तो वह स्वयं केंद्र-त्रिकोण का स्वामी होने से योगकारक है। इसी विषय पर राजयोग का पूरा लेख पढ़ सकते हैं।
दुःस्थान या त्रिक भाव: छठा, आठवाँ और बारहवाँ
छठा, आठवाँ और बारहवाँ भाव दुःस्थान या त्रिक भाव (Dusthana Houses) कहलाते हैं। छठा भाव रोग, ऋण, शत्रु और प्रतिस्पर्धा का है; आठवाँ आयु, आकस्मिकता, गुप्त बातें, गहराई और परिवर्तन का; बारहवाँ व्यय, हानि, विदेश, शयन सुख और मोक्ष का। इन भावों को इसलिए 'दुःख के स्थान' कहा गया कि जीवन के कठिन पक्ष यहीं दिखते हैं।
पर यहाँ नए विद्यार्थी को एक ज़रूरी बात समझनी है: दुःस्थान बुरे नहीं हैं, वे कठिन हैं। छठा भाव रोग देता है तो रोग से लड़ने की शक्ति, नौकरी, सेवा और प्रतियोगिता में जीत भी देता है; अच्छे डॉक्टर, वकील और खिलाड़ी की कुंडली में छठा भाव प्रायः सशक्त होता है। आठवाँ भाव गहरी शोध, गूढ़ विद्या, ज्योतिष, बीमा और ससुराल से धन देता है। बारहवाँ भाव विदेश वास, दान, साधना और मोक्ष का भाव है। दुःस्थान का फल इस पर निर्भर है कि उसका स्वामी और उसमें बैठे ग्रह कैसे हैं, और दशा उस भाव को कब सक्रिय करती है।
दुःस्थान के स्वामी (षष्ठेश, अष्टमेश, व्ययेश) की स्थिति का नियम सामान्य भावेशों से उल्टा चलता है। कोई अच्छा भावेश दुःस्थान में जाए तो अपने भाव का फल घटा देता है; पर दुःस्थान का स्वामी दूसरे दुःस्थान में जाए तो दुःख का नाश कर देता है। इसी से विपरीत राजयोग बनता है, जिसकी बात आगे करेंगे। एक और बात: अष्टमेश को अशुभ माना गया है, पर लग्न के लिए अपवाद है। जब कोई ग्रह लग्नेश होकर अष्टमेश भी हो, जैसे मेष लग्न में मंगल या तुला लग्न में शुक्र, तो लघुपाराशरी के अनुसार लग्नेश होने से उसका अष्टम का दोष नहीं लगता। सूर्य और चंद्रमा को भी अष्टम के स्वामित्व का दोष नहीं दिया जाता, क्योंकि वे केवल एक-एक राशि के स्वामी हैं।
उपचय भाव: जो समय के साथ बढ़ते हैं
तीसरा, छठा, दसवाँ और ग्यारहवाँ भाव उपचय (Upachaya या Growth Houses) हैं। 'उपचय' का अर्थ है वृद्धि। ये भाव पराक्रम (3), संघर्ष और सेवा (6), कर्म (10) और लाभ (11) के हैं। इन भावों का फल आयु के साथ बढ़ता है, और इनमें पाप ग्रह भी प्रायः अच्छा फल देते हैं, क्योंकि पाप ग्रह की कठोरता संघर्ष और प्रतियोगिता में सहायक होती है। जैसे तीसरे या छठे भाव का मंगल साहस और प्रतिस्पर्धा में जीत देता है, ग्यारहवें का शनि देर से पर स्थायी लाभ देता है।
मारक, पणफर और आपोक्लिम: कुछ और नाम जो आगे काम आएँगे
दूसरा और सातवाँ भाव मारक स्थान कहलाते हैं। ये आयु के शत्रु भाव हैं क्योंकि आठवें से बारहवाँ सातवाँ है और तीसरे (आयु के दूसरे भाव, अष्टम से अष्टम) से बारहवाँ दूसरा है, यानी दीर्घायु के दोनों भावों का व्यय इन्हीं से होता है। इनके स्वामी मारकेश कहलाते हैं और उनकी दशा में स्वास्थ्य और संकट पर ध्यान रखा जाता है। पर 'मारक' शब्द से डरने की ज़रूरत नहीं: हर व्यक्ति की कुंडली में मारकेश होते हैं और उनकी दशाएँ कई बार जीवन में आती हैं। मारकेश वास्तविक हानि तभी करता है जब आयु का योग भी पूरा हो रहा हो; अन्यथा वह अपनी दशा में केवल कष्ट, खर्च या थकान देता है।
भावेश किस भाव में: फल का मूल सूत्र
अब मुख्य विषय पर आते हैं। किसी भावेश के फल का सूत्र इतना है: भावेश जहाँ बैठता है, अपने भाव का फल उस भाव से जोड़ देता है, और जिस समूह के भाव में बैठता है, उसके अनुसार अपने भाव का फल बढ़ाता या घटाता है। इसे तीन स्तरों पर पढ़ा जाता है।
- भावेश केंद्र या त्रिकोण में: अपना भाव सँभला रहता है, उसके फल प्रकट और स्थिर होते हैं। जैसे दशमेश नवम में हो तो कर्म का भाग्य से संबंध, पिता या गुरु से कर्मक्षेत्र में सहायता।
- भावेश दुःस्थान (6, 8, 12) में: अपने भाव के फल में बाधा, विलंब या हानि। जैसे सप्तमेश छठे में हो तो वैवाहिक जीवन में मतभेद या जीवनसाथी के स्वास्थ्य पर ध्यान देने की ज़रूरत; पर यहाँ भी ग्रह का बल और दृष्टि फल बदल देते हैं।
- भावेश अपने ही भाव में: स्वक्षेत्र में भावेश अपने भाव की रक्षा करता है। लग्नेश लग्न में, चतुर्थेश चतुर्थ में, दशमेश दशम में, ये स्थितियाँ उस भाव को बहुत बली बनाती हैं।
- भावेश उपचय में (3, 6, 10, 11): फल प्रयास और समय से बढ़ता है; 11वें भाव में भावेश प्रायः उस भाव से लाभ दिलाता है।
इस सूत्र का एक सरल रूप यह है: भावेश अपने भाव से जितने भाव आगे या पीछे बैठा है, वह संख्या भी गिनें। भावेश अपने भाव से 6, 8 या 12वें भाव में हो तो अपने भाव के फल में कमी आती है, भले ही वह भाव लग्न से केंद्र हो। जैसे चतुर्थेश नवम भाव में है: नवम लग्न से त्रिकोण है, पर चतुर्थ से छठा है। इसलिए चतुर्थेश वहाँ भाग्य और धर्म से तो जुड़ा, पर माता या घर के सुख में कुछ कमी या दूरी दे सकता है। दोनों पहलू साथ पढ़ें, तभी सही चित्र बनता है।
भाव-भावेश का संबंध: योग इसी से बनते हैं
जब दो भावेश आपस में संबंध बनाते हैं, तो दोनों भावों के फल जुड़ जाते हैं। यही ज्योतिष के अधिकांश योगों का आधार है। कुछ मुख्य संबंध जो हर विद्यार्थी को पहचानने आने चाहिए:
- राजयोग: केंद्रेश और त्रिकोणेश का संबंध, विशेषकर नवमेश-दशमेश का। पद, प्रतिष्ठा और भाग्य का कर्म से मेल।
- धनयोग: द्वितीयेश, पंचमेश, नवमेश और एकादशेश का आपस में या लग्नेश से संबंध। धन का आगमन और संचय।
- विपरीत राजयोग: षष्ठेश, अष्टमेश या व्ययेश का दूसरे दुःस्थान में बैठना या इन स्वामियों का आपस में संबंध, और साथ ही अन्य शुभ ग्रहों से संबंध न होना। कठिनाई से उठकर सफलता। फलदीपिका और उत्तरकालामृत में इसका विवेचन मिलता है; इसकी शर्तें कड़ी हैं, इसलिए हर अष्टमेश-व्ययेश युति को विपरीत राजयोग न मान लें।
- परिवर्तन योग: दो भावेश एक-दूसरे की राशि में बैठें। शुभ भावों (1, 2, 4, 5, 7, 9, 10, 11) के स्वामियों के बीच परिवर्तन महायोग, जिसमें दुःस्थानेश शामिल हो वह दैन्य योग, और जिसमें तृतीयेश शामिल हो वह खल योग। 'महा-खल-दैन्य' का यह त्रय उत्तरकालामृत की परंपरा से माना जाता है।
एक बात हमेशा ध्यान रखें: योग बनना और योग का फल मिलना दो अलग बातें हैं। कोई भी योग तभी फल देता है जब योगकारक ग्रह बली हों और उनकी दशा-अंतर्दशा आए। यही कारण है कि एक ही राजयोग किसी के जीवन में 25 की आयु में फल देता है और किसी के जीवन में 50 की आयु में।
लग्नेश: सबसे महत्वपूर्ण भावेश
बारह भावेशों में लग्नेश का स्थान सर्वोपरि है, क्योंकि लग्न केंद्र भी है और त्रिकोण भी। लग्नेश की स्थिति से पूरे जीवन की दिशा का संकेत मिलता है। लग्नेश जिस भाव में बैठता है, जातक का मन, शरीर और प्रयास उसी क्षेत्र की ओर झुकते हैं: लग्नेश दशम में हो तो कर्म और पद के प्रति समर्पण; नवम में हो तो धर्म, शिक्षा और भाग्य का साथ; सप्तम में हो तो जीवनसाथी और साझेदारी जीवन का केंद्र; चतुर्थ में हो तो घर, माता और भूमि से लगाव।
उदाहरण: एक कुंडली में भाव-भावेश पढ़ना
मान लीजिए किसी की सिंह लग्न की कुंडली है। सिंह लग्न में भावेश यों बनते हैं: लग्नेश सूर्य, द्वितीयेश बुध, तृतीयेश शुक्र, चतुर्थेश मंगल, पंचमेश गुरु, षष्ठेश और सप्तमेश शनि, अष्टमेश गुरु, नवमेश मंगल, दशमेश शुक्र, एकादशेश बुध और व्ययेश चंद्रमा। पहला निष्कर्ष बिना ग्रह स्थिति देखे ही निकलता है: मंगल चतुर्थेश और नवमेश दोनों होने से सिंह लग्न का योगकारक है; गुरु पंचमेश होकर अष्टमेश भी है, इसलिए मिश्रित; शनि षष्ठेश-सप्तमेश होकर मारकेश है; शुक्र दशमेश होकर तृतीयेश भी है, इसलिए उसके फल कर्म के साथ पराक्रम से जुड़ते हैं।
अब मान लीजिए इस कुंडली में सूर्य दशम भाव में वृषभ राशि में, मंगल दशम में ही सूर्य के साथ, गुरु पंचम में धनु राशि में, शनि छठे भाव में मकर राशि में और चंद्रमा दूसरे भाव में कन्या राशि में है। इसे समूहों के चश्मे से पढ़ें:
- लग्नेश सूर्य दशम भाव में: केंद्र में, दिग्बली। जीवन की दिशा कर्म, पद और प्रतिष्ठा की ओर; यहाँ योगकारक मंगल की युति से केंद्र-त्रिकोण का सुंदर राजयोग, जिसमें लग्नेश स्वयं शामिल है।
- मंगल (चतुर्थेश-नवमेश) दशम भाव में: योगकारक केंद्र में। भूमि-भवन, पिता और भाग्य का सहयोग कर्मक्षेत्र में। दशम से देखें तो चतुर्थ के लिए सातवाँ और नवम के लिए दूसरा भाव, दोनों अच्छे स्थान।
- गुरु (पंचमेश-अष्टमेश) पंचम में स्वराशि धनु में: भावेश अपने भाव में, संतान, बुद्धि और मंत्र का भाव बली। अष्टम के स्वामी के रूप में भी गुरु यहाँ अष्टम से दसवाँ है, इसलिए आकस्मिकता की जगह गूढ़ ज्ञान और शोध का लाभ।
- शनि (षष्ठेश-सप्तमेश) छठे भाव में स्वराशि मकर में: षष्ठेश अपने भाव में और स्वराशि, रोग और शत्रु पर विजय; पर सप्तमेश छठे में, यानी सप्तम से बारहवें, इसलिए वैवाहिक जीवन में प्रयास और समायोजन की आवश्यकता। शनि की दशम दृष्टि तीसरे भाव पर है, इसलिए पराक्रम में अनुशासन।
- चंद्रमा (व्ययेश) दूसरे भाव में: दुःस्थान का स्वामी धन भाव में, व्यय से बारहवें नहीं, तीसरे; खर्च और कुटुंब के मामलों का मेल, विदेश या दूर से धन की संभावना, मन का वाणी और परिवार से जुड़ाव।
देखिए, हमने केवल भावेशों की स्थिति और समूहों से जातक के कर्म, विवाह, संतान और धन का पहला खाका खींच लिया। अब इसमें पिछले पाठ की दृष्टि, तीसरे पाठ का राशिगत बल और आगे आने वाली दशा जोड़ दें तो फलकथन पूरा होने लगता है। हर कुंडली को इसी क्रम में पढ़ें: पहले लग्नेश, फिर योगकारक, फिर दुःस्थानेश और मारकेश, फिर हर भाव के तीनों स्रोत (स्थित ग्रह, भावेश, दृष्टि)।
नए विद्यार्थियों की आम भूलें
- भाव और भावेश को एक मान लेना; भाव स्थिर है, भावेश लग्न के अनुसार बदलता है।
- दुःस्थान में बैठे हर ग्रह को अशुभ कह देना, बिना यह देखे कि वह ग्रह किस भाव का स्वामी है और किस बल में है।
- केंद्र में शुभ ग्रह देखकर तुरंत राजयोग घोषित करना, केंद्राधिपत्य और दशा को भुलाकर।
- भावेश की स्थिति लग्न से तो गिनना, पर अपने भाव से न गिनना; दोनों गिनती ज़रूरी हैं।
- विपरीत राजयोग को हर दुःस्थानेश की युति में देखना, जबकि इसकी शर्तें कड़ी हैं।
सारांश
- केंद्र (1, 4, 7, 10) बल और प्रकट जीवन के भाव हैं; त्रिकोण (1, 5, 9) भाग्य और पुण्य के; दुःस्थान (6, 8, 12) संघर्ष और परिवर्तन के; उपचय (3, 6, 10, 11) समय के साथ बढ़ने वाले।
- भावेश वह ग्रह है जो भाव की राशि का स्वामी है; वह अपने भाव का फल वहाँ ले जाता है जहाँ बैठता है।
- भावेश केंद्र-त्रिकोण में सँभला, दुःस्थान में बाधित, अपने भाव में सबसे सुरक्षित; अपने भाव से 6, 8, 12वें में फल घटता है।
- त्रिकोणेश सदा शुभ; केंद्रेश बनने पर शुभ ग्रह शुभता खोते हैं और पाप ग्रह क्रूरता (केंद्राधिपत्य)।
- केंद्रेश-त्रिकोणेश का संबंध राजयोग, दुःस्थानेशों का आपसी संबंध विपरीत राजयोग, 2-5-9-11 के स्वामियों का संबंध धनयोग।
- अष्टमेश कठिन है, पर लग्नेश होने पर और सूर्य-चंद्रमा होने पर दोष नहीं; मारकेश हर कुंडली में होते हैं, डरने की बात नहीं।
- कोई भी योग तभी फल देता है जब योगकारक बली हों और उनकी दशा आए।
अब इस पाठ को अपनी कुंडली पर उतारिए। मुफ़्त कुंडली बनाकर पहले अपने लग्न के बारह भावेश लिखें, फिर हर भावेश के सामने उसका भाव और समूह (केंद्र, त्रिकोण, दुःस्थान, उपचय) लिखें, और अपने भाव से उसकी दूरी भी। लग्न कैलकुलेटर से लग्न की पुष्टि कर लें। सूर्य-चंद्रमा के अलावा हर ग्रह दो भावों का स्वामी है, इसलिए उसकी दोनों भूमिकाएँ साथ लिखें। अगले पाठ में हम इसी आधार पर हर लग्न के शुभ, अशुभ और योगकारक ग्रह समझेंगे।
Frequently asked questions
केंद्र, त्रिकोण और दुःस्थान कौन से भाव हैं?+
केंद्र भाव 1, 4, 7 और 10 हैं; त्रिकोण भाव 1, 5 और 9; दुःस्थान या त्रिक भाव 6, 8 और 12। इनके अलावा 3, 6, 10, 11 उपचय भाव और 2, 7 मारक स्थान कहलाते हैं। एक ही भाव एक से अधिक समूह में हो सकता है, जैसे छठा भाव दुःस्थान भी है और उपचय भी।
भावेश क्या होता है?+
किसी भाव में जो राशि पड़ी है, उस राशि का स्वामी ग्रह उस भाव का भावेश या भाव स्वामी कहलाता है। जैसे मेष लग्न में पाँचवें भाव पर सिंह राशि है, इसलिए पंचमेश सूर्य है। भावेश कुंडली में जहाँ बैठता है, अपने भाव का फल उस भाव से जोड़ देता है।
भावेश दुःस्थान में हो तो क्या होता है?+
भावेश छठे, आठवें या बारहवें भाव में हो तो उसके भाव के फल में बाधा, विलंब या हानि आ सकती है। पर यह अकेला नियम नहीं है: भावेश उच्च या स्वराशि में हो, शुभ दृष्टि में हो, तो बाधा के बाद सफलता मिलती है। दुःस्थान का स्वामी दूसरे दुःस्थान में हो तो उल्टा, विपरीत राजयोग बनता है।
योगकारक ग्रह किसे कहते हैं?+
जो ग्रह एक ही कुंडली में केंद्र और त्रिकोण, दोनों का स्वामी हो, वह योगकारक कहलाता है। जैसे कर्क और सिंह लग्न में मंगल, वृषभ और तुला लग्न में शनि, मकर और कुंभ लग्न में शुक्र। योगकारक बली हो तो अपनी दशा में पद, धन और भाग्य, सब साथ देता है।
केंद्राधिपत्य दोष क्या है?+
लघुपाराशरी का सिद्धांत है कि केंद्र का स्वामी होने पर शुभ ग्रह (गुरु, शुक्र, बुध, बली चंद्रमा) अपनी शुभता कुछ खो देते हैं और पाप ग्रह अपनी क्रूरता छोड़ देते हैं। इसका अर्थ यह नहीं कि केंद्रेश बुरा फल देगा; बस केंद्र का स्वामित्व अकेले उसे शुभ नहीं बनाता। त्रिकोण से संबंध बनने पर वही ग्रह राजयोग देता है।
विपरीत राजयोग कब बनता है?+
जब छठे, आठवें या बारहवें भाव का स्वामी किसी दूसरे दुःस्थान में बैठे, या ये स्वामी आपस में संबंध बनाएँ, और उनका अन्य शुभ भावेशों से संबंध न हो, तब विपरीत राजयोग माना जाता है। इसका फल कठिनाई, विरोध या हानि के बाद अचानक उठान है। शर्तें कड़ी हैं, इसलिए हर दुःस्थानेश की युति को यह योग न मानें।
मारकेश की दशा से डरना चाहिए क्या?+
नहीं। दूसरे और सातवें भाव के स्वामी मारकेश कहलाते हैं और हर कुंडली में होते हैं; उनकी दशाएँ जीवन में कई बार आती हैं। मारकेश वास्तविक संकट तभी देता है जब आयु का योग भी पूरा हो रहा हो। सामान्यतः उसकी दशा में स्वास्थ्य, खर्च और थकान पर ध्यान रखना पर्याप्त है, और स्वास्थ्य की बात हो तो डॉक्टर से भी मिलें।
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