प्रदोष व्रत 2045
प्रदोष व्रत त्रयोदशी को भगवान शिव का व्रत है, उस दिन जब सूर्यास्त के बाद प्रदोष काल में त्रयोदशी हो — महीने में दो बार। वार के अनुसार इसका नाम सोम, भौम, शनि प्रदोष आदि होता है।
प्रदोष व्रत की कथा और विधि पढ़ें- 1जन॰रवि प्रदोषरविवार
- 15जन॰रवि प्रदोषरविवार
- 30जन॰सोम प्रदोषसोमवार
- 14फ़र॰भौम प्रदोषमंगलवार
- 1मार्चबुध प्रदोषबुधवार
- 15मार्चबुध प्रदोषबुधवार
- 30मार्चगुरु प्रदोषगुरुवार
- 14अप्रैलशुक्र प्रदोषशुक्रवार
- 28अप्रैलशुक्र प्रदोषशुक्रवार
- 14मईरवि प्रदोषरविवार
- 28मईरवि प्रदोषरविवार
- 12जूनसोम प्रदोषसोमवार
- 26जूनसोम प्रदोषसोमवार
- 12जुल॰बुध प्रदोषबुधवार
- 26जुल॰बुध प्रदोषबुधवार
- 10अग॰गुरु प्रदोषगुरुवार
- 24अग॰गुरु प्रदोषगुरुवार
- 8सित॰शुक्र प्रदोषशुक्रवार
- 23सित॰शनि प्रदोषशनिवार
- 8अक्टू॰रवि प्रदोषरविवार
- 23अक्टू॰सोम प्रदोषसोमवार
- 6नव॰सोम प्रदोषसोमवार
- 21नव॰भौम प्रदोषमंगलवार
- 6दिस॰बुध प्रदोषबुधवार
- 21दिस॰गुरु प्रदोषगुरुवार
प्रश्न-उत्तर
2045 में कितने प्रदोष व्रत हैं?
25 — पहला रवि प्रदोष (रविवार, 1 जनवरी 2045), अंतिम गुरु प्रदोष (21 दिसंबर 2045)।
प्रदोष व्रत की तारीख अलग-अलग शहरों में अलग क्यों हो सकती है?
हिन्दू दिन एक सूर्योदय से अगले सूर्योदय तक चलता है, और सूर्योदय के समय की तिथि (या व्रत के अनुसार चन्द्रोदय, प्रदोष काल अथवा संक्रांति के क्षण की स्थिति) से दिन तय होता है। सूर्योदय हर स्थान पर अलग समय होता है, इसलिए दिल्ली से दूर का शहर व्रत एक दिन आगे-पीछे रख सकता है; अपने शहर की तारीखें मासिक कैलेंडर में देखें।