प्रदोष व्रत 2046
प्रदोष व्रत त्रयोदशी को भगवान शिव का व्रत है, उस दिन जब सूर्यास्त के बाद प्रदोष काल में त्रयोदशी हो — महीने में दो बार। वार के अनुसार इसका नाम सोम, भौम, शनि प्रदोष आदि होता है।
प्रदोष व्रत की कथा और विधि पढ़ें- 4जन॰गुरु प्रदोषगुरुवार
- 20जन॰शनि प्रदोषशनिवार
- 3फ़र॰शनि प्रदोषशनिवार
- 18फ़र॰रवि प्रदोषरविवार
- 4मार्चरवि प्रदोषरविवार
- 20मार्चभौम प्रदोषमंगलवार
- 3अप्रैलभौम प्रदोषमंगलवार
- 18अप्रैलबुध प्रदोषबुधवार
- 3मईगुरु प्रदोषगुरुवार
- 17मईगुरु प्रदोषगुरुवार
- 1जूनशुक्र प्रदोषशुक्रवार
- 16जूनशनि प्रदोषशनिवार
- 1जुल॰रवि प्रदोषरविवार
- 15जुल॰रवि प्रदोषरविवार
- 31जुल॰भौम प्रदोषमंगलवार
- 13अग॰सोम प्रदोषसोमवार
- 29अग॰बुध प्रदोषबुधवार
- 12सित॰बुध प्रदोषबुधवार
- 27सित॰गुरु प्रदोषगुरुवार
- 12अक्टू॰शुक्र प्रदोषशुक्रवार
- 27अक्टू॰शनि प्रदोषशनिवार
- 10नव॰शनि प्रदोषशनिवार
- 25नव॰रवि प्रदोषरविवार
- 10दिस॰सोम प्रदोषसोमवार
- 25दिस॰भौम प्रदोषमंगलवार
प्रश्न-उत्तर
2046 में कितने प्रदोष व्रत हैं?
25 — पहला गुरु प्रदोष (गुरुवार, 4 जनवरी 2046), अंतिम भौम प्रदोष (25 दिसंबर 2046)।
प्रदोष व्रत की तारीख अलग-अलग शहरों में अलग क्यों हो सकती है?
हिन्दू दिन एक सूर्योदय से अगले सूर्योदय तक चलता है, और सूर्योदय के समय की तिथि (या व्रत के अनुसार चन्द्रोदय, प्रदोष काल अथवा संक्रांति के क्षण की स्थिति) से दिन तय होता है। सूर्योदय हर स्थान पर अलग समय होता है, इसलिए दिल्ली से दूर का शहर व्रत एक दिन आगे-पीछे रख सकता है; अपने शहर की तारीखें मासिक कैलेंडर में देखें।