प्रदोष व्रत 2044
प्रदोष व्रत त्रयोदशी को भगवान शिव का व्रत है, उस दिन जब सूर्यास्त के बाद प्रदोष काल में त्रयोदशी हो — महीने में दो बार। वार के अनुसार इसका नाम सोम, भौम, शनि प्रदोष आदि होता है।
प्रदोष व्रत की कथा और विधि पढ़ें- 12जन॰भौम प्रदोषमंगलवार
- 27जन॰बुध प्रदोषबुधवार
- 10फ़र॰बुध प्रदोषबुधवार
- 26फ़र॰शुक्र प्रदोषशुक्रवार
- 11मार्चशुक्र प्रदोषशुक्रवार
- 26मार्चशनि प्रदोषशनिवार
- 9अप्रैलशनि प्रदोषशनिवार
- 25अप्रैलसोम प्रदोषसोमवार
- 9मईसोम प्रदोषसोमवार
- 24मईभौम प्रदोषमंगलवार
- 7जूनभौम प्रदोषमंगलवार
- 23जूनगुरु प्रदोषगुरुवार
- 7जुल॰गुरु प्रदोषगुरुवार
- 22जुल॰शुक्र प्रदोषशुक्रवार
- 6अग॰शनि प्रदोषशनिवार
- 20अग॰शनि प्रदोषशनिवार
- 4सित॰रवि प्रदोषरविवार
- 19सित॰सोम प्रदोषसोमवार
- 4अक्टू॰भौम प्रदोषमंगलवार
- 18अक्टू॰भौम प्रदोषमंगलवार
- 3नव॰गुरु प्रदोषगुरुवार
- 17नव॰गुरु प्रदोषगुरुवार
- 2दिस॰शुक्र प्रदोषशुक्रवार
- 16दिस॰शुक्र प्रदोषशुक्रवार
प्रश्न-उत्तर
2044 में कितने प्रदोष व्रत हैं?
24 — पहला भौम प्रदोष (मंगलवार, 12 जनवरी 2044), अंतिम शुक्र प्रदोष (16 दिसंबर 2044)।
प्रदोष व्रत की तारीख अलग-अलग शहरों में अलग क्यों हो सकती है?
हिन्दू दिन एक सूर्योदय से अगले सूर्योदय तक चलता है, और सूर्योदय के समय की तिथि (या व्रत के अनुसार चन्द्रोदय, प्रदोष काल अथवा संक्रांति के क्षण की स्थिति) से दिन तय होता है। सूर्योदय हर स्थान पर अलग समय होता है, इसलिए दिल्ली से दूर का शहर व्रत एक दिन आगे-पीछे रख सकता है; अपने शहर की तारीखें मासिक कैलेंडर में देखें।