श्री गणेश सहस्रनाम स्तोत्र
Shri Ganesh Sahasranama Stotra
गीता प्रेस का ‘श्रीवक्रतुण्डमहागणपतिसहस्रनामस्तोत्रम्’: विनियोग, ध्यान, 212 श्लोक और फलश्रुति का अर्थThe Gita Press ‘Shri Vakratunda Mahaganapati Sahasranama Stotram’: viniyoga, dhyana, all 212 verses and the meaning of the phalashruti

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श्री गणेश सहस्रनाम स्तोत्र भगवान् गणेश के एक हज़ार नामों का संस्कृत स्तोत्र है। गीता प्रेस, गोरखपुर के ‘सहस्रनामस्तोत्रसंग्रह’ में यह ‘श्रीवक्रतुण्डमहागणपतिसहस्रनामस्तोत्रम्’ नाम से छपा है, और उसकी पुष्पिका इसे शाक्तप्रमोद के अन्तर्गत गणेशतन्त्र से लिया गया बताती है। यही नाम इसी क्रम में गणेश पुराण के उपासना खण्ड में भी मिलते हैं, जिस पर विद्वान् भास्करराय ने टीका लिखी। इसके रचयिता का नाम ज्ञात नहीं है; स्तोत्र में ये नाम स्वयं महागणपति के मुख से कहे गए हैं। पाठ विनियोग और ध्यान से आरम्भ होता है, फिर 212 श्लोक आते हैं: पहले श्लोक से 168वें श्लोक के पूर्वार्ध तक नाम हैं और उसके बाद फलश्रुति।
लोग इसे विघ्नों को दूर करने, बुद्धि और वाणी की शुद्धता, नए काम के शुभारम्भ और गणेश चतुर्थी जैसे पर्वों पर पढ़ते हैं। इस पृष्ठ पर पूरा पाठ गीता प्रेस के छपे पाठ के अनुसार है। नामों वाले श्लोक बिना अर्थ के दिए गए हैं; नीचे का एक खण्ड बताता है कि नाम कैसे पढ़े जाते हैं और कुछ प्रसिद्ध नामों का अर्थ क्या है। विनियोग, ध्यान और फलश्रुति के हर श्लोक के नीचे उसका सीधा अर्थ है, और साइन-इन के बाद पूरा पाठ मुफ्त PDF में उतारा जा सकता है।
The Shri Ganesh Sahasranama Stotra is a Sanskrit hymn of a thousand names of Lord Ganesha. The Gita Press, Gorakhpur collection ‘Sahasranama Stotra Sangrah’ prints it as the Shri Vakratunda Mahaganapati Sahasranama Stotram, and its colophon says it is taken from the Ganesha Tantra within the Shakta Pramoda. The same names in the same order are found in the Upasana Khanda of the Ganesha Purana, the text on which the scholar Bhaskararaya wrote a commentary. The author is not known; within the hymn the names are spoken by Mahaganapati himself. It opens with a viniyoga and a dhyana, then runs to 212 verses: the names fill verse 1 to the first half of verse 168, and the phalashruti follows.
People read it to clear obstacles, for clear thinking and speech, before beginning new work and on festivals such as Ganesh Chaturthi. This page gives the full text as printed by Gita Press. The name verses are given without meanings; a section below explains how the names are read and glosses some well-known ones. The viniyoga, the dhyana and every verse of the phalashruti have a plain meaning beneath them, and after sign-in the whole text can be downloaded as a free PDF.
पाठThe text
विनियोगViniyoga
अस्य श्रीवक्रतुण्डमहागणपतिसहस्रनामस्तोत्रमन्त्रस्य महागणपतिर्ऋषिः, अनुष्टुप् छन्दः, महागणपतिर्देवता, गं बीजम्, हुं शक्तिः, स्वाहा कीलकम् चतुर्विधपुरुषार्थसिद्ध्यर्थे जपे विनियोगः।
यह विनियोग है, जो पाठ आरम्भ करने से पहले बोला जाता है। इसके अनुसार श्रीवक्रतुण्ड महागणपति के इस सहस्रनाम-स्तोत्र रूपी मन्त्र के ऋषि स्वयं महागणपति हैं, छन्द अनुष्टुप् है और देवता महागणपति हैं; ‘गं’ इसका बीज, ‘हुं’ इसकी शक्ति और ‘स्वाहा’ इसका कीलक (मन्त्र को बाँधकर स्थिर रखने वाला) है। धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष, इन चारों पुरुषार्थों की सिद्धि के लिए इसके जप में इसका विनियोग (उपयोग) किया जाता है।This is the viniyoga, spoken before the recitation begins. It names Mahaganapati himself as the seer of this hymn-mantra of the thousand names of Shri Vakratunda Mahaganapati, its metre as anushtup and its deity as Mahaganapati; ‘gam’ is its seed (bija), ‘hum’ its power (shakti) and ‘svaha’ its keystone (kilaka, what holds the mantra fast). It is recited for the four aims of life: dharma, artha, kama and moksha.
ध्यानDhyana
ध्यानम् खर्वं स्थूलतनुं गजेन्द्रवदनं लम्बोदरं सुन्दरं प्रस्यन्दन्मदगन्धलुब्धमधुपव्यालोलगण्डस्थलम्। दन्ताघातविदारितारिरुधिरैः सिन्दूरशोभाकरं वन्दे शैलसुतासुतं गणपतिं सिद्धिप्रदं कामदम्॥
यह ध्यान है, जिसमें पाठ से पहले गणपति का रूप मन में बसाया जाता है: उनका कद छोटा (खर्व) और देह भरी हुई (स्थूल) है, मुख हाथियों के राजा (गजेन्द्र) जैसा है, उदर बड़ा (लम्बोदर) है और रूप मनोहर है। उनकी कनपटियों (गण्डस्थल) से बहते मद की गन्ध से लुभाए भौंरे वहाँ मँडराते हैं, और अपने दाँत की चोट से चीरे गए शत्रुओं के रक्त से उनकी देह पर सिन्दूर-सी लाली चमकती है। ऐसे शैलसुता (पर्वतराज की पुत्री पार्वती) के पुत्र, सिद्धि देने वाले और कामनाएँ पूरी करने वाले गणपति को मेरा प्रणाम है।This is the dhyana, the verse for picturing Ganapati before the recitation: short (kharva) and stout, with the face of a lordly elephant, a large belly (lambodara) and a lovely form. Bees drawn by the scent of the musth flowing from his temples hover about his cheeks, and the blood of foes torn open by the blow of his tusk gives him a sindoor-red glow. I bow to Ganapati, son of the mountain’s daughter (Parvati), giver of success and fulfiller of wishes.
श्लोकShloka 1
महागणपतिरुवाच ॐ गणेश्वरो गणक्रीडो गणनाथो गणाधिपः। एकदंष्ट्रो वक्रतुण्डो गजवक्त्रो महोदरः॥
श्लोकShloka 2
लम्बोदरो धूम्रवर्णो विकटो विघ्ननायकः। सुमुखो दुर्मुखो बुद्धो विघ्नराजो गजाननः॥
श्लोकShloka 3
भीमः प्रमोद आमोदः सुरानन्दो मदोत्कटः। हेरम्बः शम्बरः शम्भुर्लम्बकर्णो महाबलः॥
श्लोकShloka 4
नन्दनोऽलम्पटोऽभीरुर्मेघनादो गणञ्जयः। विनायको विरूपाक्षो धीरशूरो वरप्रदः॥
श्लोकShloka 5
महागणपतिर्बुद्धिप्रियः क्षिप्रप्रसादनः। रुद्रप्रियो गणाध्यक्ष उमापुत्रोऽघनाशनः॥
श्लोकShloka 6
कुमारगुरुरीशानपुत्रो मूषकवाहनः। सिद्धिप्रियः सिद्धिपतिः सिद्धः सिद्धिविनायकः॥
श्लोकShloka 7
अविघ्नस्तुम्बुरुः सिंहवाहनो मोहिनीप्रियः। कटङ्कटो राजपुत्रः शालकः सम्मितोऽमितः॥
श्लोकShloka 8
कूष्माण्डसामसम्भूतिर्दुर्जयो धूर्जयो जयः। भूपतिर्भुवनपतिर्भूतानां पतिरव्ययः॥
श्लोकShloka 9
विश्वकर्ता विश्वमुखो विश्वरूपो निधिर्घृणिः। कविः कवीनामृषभो ब्रह्मण्यो ब्रह्मणस्पतिः॥
श्लोकShloka 10
ज्येष्ठराजो निधिपतिर्निधिप्रियपतिप्रियः। हिरण्मयपुरान्तःस्थः सूर्यमण्डलमध्यगः॥
श्लोकShloka 11
कराहतिध्वस्तसिन्धुसलिलः पूषदन्तहृत्। उमाङ्ककेलिकुतुकी मुक्तिदः कुलपालनः॥
श्लोकShloka 12
किरीटी कुण्डली हारी वनमाली मनोमयः। वैमुख्यहतदैत्यश्रीः पादाहतजितक्षितिः॥
श्लोकShloka 13
सद्योजातः स्वर्णमुञ्जमेखली दुर्निमित्तहृत्। दुःस्वप्नहृत्प्रसहनो गुणी नादप्रतिष्ठितः॥
श्लोकShloka 14
सुरूपः सर्वनेत्राधिवासो वीरासनाश्रयः। पीताम्बरः खण्डरदः खण्डेन्दुकृतशेखरः॥
श्लोकShloka 15
चित्राङ्कः श्यामदशनो भालचन्द्रश्चतुर्भुजः। योगाधिपस्तारकस्थः पुरुषो गजकर्णकः॥
श्लोकShloka 16
गणाधिराजो विजयस्थिरो गजपतिर्ध्वजी। देवदेवः स्मरप्राणदीपको वायुकीलकः॥
श्लोकShloka 17
विपश्चिद्वरदो नादोन्नादभिन्नबलाहकः। वाराहरदनो मृत्युञ्जयो व्याघ्राजिनाम्बरः॥
श्लोकShloka 18
इच्छाशक्तिधरो देवत्राता दैत्यविमर्दनः। शम्भुवक्त्रोद्भवः शम्भुकोपहा शम्भुहास्यभूः॥
श्लोकShloka 19
शम्भुतेजाः शिवाशोकहारी गौरीसुखावहः। उमाङ्गमलजो गौरीतेजोभूः स्वर्धुनीभवः॥
श्लोकShloka 20
यज्ञकायो महानादो गिरिवर्ष्मा शुभाननः। सर्वात्मा सर्वदेवात्मा ब्रह्ममूर्धा ककुप्श्रुतिः॥
श्लोकShloka 21
ब्रह्माण्डकुम्भश्चिद्व्योमभालः सत्यशिरोरुहः। जगज्जन्मलयोन्मेषनिमिषोऽग्न्यर्कसोमदृक्॥
श्लोकShloka 22
गिरीन्द्रैकरदो धर्मो धर्मिष्ठः सामबृंहितः। ग्रहर्क्षदशनो वाणीजिह्वो वासवनासिकः॥
श्लोकShloka 23
भ्रूमध्यसंस्थितकरो ब्रह्मविद्यामदोत्कटः। कुलाचलांसः सोमार्कघण्टो रुद्रशिरोधरः॥
श्लोकShloka 24
नदीनदभुजः सर्पाङ्गुलीकस्तारकानखः। व्योमनाभिः श्रीहृदयो मेरुपृष्ठोऽर्णवोदरः॥
श्लोकShloka 25
कुक्षिस्थयक्षगन्धर्वरक्षःकिन्नरमानुषः। पृथ्वीकटिः सृष्टिलिङ्गः शैलोरुर्दस्रजानुकः॥
श्लोकShloka 26
पातालजङ्घो मुनिपात्कालाङ्गुष्ठस्त्रयीतनुः। ज्योतिर्मण्डललाङ्गूलो हृदयालातनिश्चलः॥
श्लोकShloka 27
हृत्पद्मकर्णिकाशाली वियत्केलिसरोवरः। सद्भक्तध्याननिगडः पूजावारिनिवारितः॥
श्लोकShloka 28
प्रतापी कश्यपसुतो गणपो विष्टपी बली। यशस्वी धार्मिकः स्वोजाः प्रथमः प्रमथेश्वरः॥
श्लोकShloka 29
चिन्तामणिर्द्वीपपतिः कल्पद्रुमवनालयः। रत्नमण्डपमध्यस्थो रत्नसिंहासनाश्रयः॥
श्लोकShloka 30
तीव्राशिरो धृतपदो ज्वालिनीमौलिलालितः। नन्दानन्दितपीठश्रीर्भोगदो भूषितासनः॥
श्लोकShloka 31
सकामदायिनीपीठः स्फुरदुग्रासनाश्रयः। तेजोवतीशिरोरत्नं सत्यनित्यावतंसितः॥
श्लोकShloka 32
सविघ्ननाशिनीपीठः सर्वशक्त्यम्बुजाश्रयः। लिपिपद्मासनाधारो वह्निधाम त्रयाश्रयः॥
श्लोकShloka 33
उन्नतप्रपदागूढगुल्फसंवृतपार्ष्णिकः। पीनजङ्घः श्लिष्टजानुः स्थूलोरुः प्रोन्नमत्कटिः॥
श्लोकShloka 34
निम्ननाभिः स्थूलकुक्षिः पीनवक्षा बृहद्भुजः। पीनस्कन्धः कम्बुकण्ठो लम्बोष्ठो लम्बनासिकः॥
श्लोकShloka 35
भग्नवामरदस्तुङ्गसव्यदन्तो महाहनुः। ह्रस्वनेत्रत्रयः शूर्पकर्णो निविडमस्तकः॥
श्लोकShloka 36
स्तबकाकारकुम्भाग्रो रत्नमौलिर्निरंकुशः। सर्पहारकटीसूत्रः सर्पयज्ञोपवीतवान्॥
श्लोकShloka 37
सर्पकोटीरकटकः सर्पग्रैवेयकाङ्गदः। सर्पकक्ष्योदराबन्धः सर्पराजोत्तरीयकः॥
श्लोकShloka 38
रक्तो रक्ताम्बरधरो रक्तमाल्यविभूषणः। रक्तेक्षणो रक्तकरो रक्तताल्वोष्ठपल्लवः॥
श्लोकShloka 39
श्वेतः श्वेताम्बरधरः श्वेतमाल्यविभूषणः। श्वेतातपत्ररुचिरः श्वेतचामरवीजितः॥
श्लोकShloka 40
सर्वावयवसम्पूर्णः सर्वलक्षणलक्षितः। सर्वाभरणशोभाढ्यः सर्वशोभासमन्वितः॥
श्लोकShloka 41
सर्वमङ्गलमाङ्गल्यः सर्वकारणकारणम्। सर्वदैककरः शार्ङ्गी बीजापूरी गदाधरः॥
श्लोकShloka 42
इक्षुचापधरः शूली चक्रपाणिः सरोजभृत्। पाशी धृतोत्पलः शालिमञ्जरीभृत्स्वदन्तभृत्॥
श्लोकShloka 43
कल्पवल्लीधरो विश्वाभयदैककरो वशी। अक्षमालाधरो ज्ञानमुद्रावान् मुद्गरायुधः॥
श्लोकShloka 44
पूर्णपात्री कम्बुधरो विधृतालिसमूहकः। मातुलुङ्गधरश्चूतकलिकाभृत्कुठारवान्॥
श्लोकShloka 45
पुष्करस्थः स्वर्णघटीपूर्णरत्नाभिवर्षकः। भारतीसुन्दरीनाथो विनायकरतिप्रियः॥
श्लोकShloka 46
महालक्ष्मीप्रियतमः सिद्धलक्ष्मीमनोरमः। रमारमेशपूर्वाङ्गो दक्षिणोमामहेश्वरः॥
श्लोकShloka 47
महीवराहवामाङ्गो रतिकन्दर्पपश्चिमः। आमोदमोदजननः सप्रमोदः प्रमोदनः॥
श्लोकShloka 48
सामैधिता समिद्धश्रीर्ऋद्धिसिद्धिप्रवर्तकः। दत्तसौमुख्यसुमुखः कान्तिकन्दलिताश्रयः॥
श्लोकShloka 49
मदनावत्याश्रिताङ्घ्रिः कृतदौर्मुख्यदुर्मुखः। विघ्नसम्पल्लवोपघ्नः सेवोन्निद्रमदद्रवः॥
श्लोकShloka 50
विघ्नकृन्निघ्नचरणो द्राविणीशक्तिसत्कृतः। तीव्राप्रसन्ननयनो ज्वालिनीपालितैकदृक्॥
श्लोकShloka 51
मोहिनीमोहनो भोगदायिनीकान्तिमण्डितः। कामिनीकान्तवक्त्रश्रीरधिष्ठितवसुन्धरः॥
श्लोकShloka 52
वसुन्धरामदोन्नद्धो महाशङ्खनिधिः प्रभुः। नमद्वसुमतीमौलिर्महापद्मनिधिप्रभुः॥
श्लोकShloka 53
सर्वसद्गुणसंसेव्यः शोचिष्केशहृदाश्रयः। ईशानमूर्द्धा देवेन्द्रशिखः पवननन्दनः॥
श्लोकShloka 54
अग्रप्रत्यग्रनयनो दिव्यास्त्राणां प्रयोगवित्। ऐरावतादिसर्वाशावारणावरणप्रियः॥
श्लोकShloka 55
वज्राद्यस्त्रपरीवारो गणचण्डसमाश्रयः। जयाजयपरीवारो विजयाविजयावहः॥
श्लोकShloka 56
अजिताजितपादाब्जो नित्यानित्यावतंसितः। विलासिनीकृतोल्लासः शौण्डिसौन्दर्यमण्डितः॥
श्लोकShloka 57
अनन्तानन्तसुखदः सुमङ्गलसुमङ्गलः। इच्छाशक्तिज्ञानशक्तिक्रियाशक्तिनिषेवितः॥
श्लोकShloka 58
सुभगासंश्रितपदो ललिताललिताश्रयः। कामिनीकामनः काममालिनीकेलिलालितः॥
श्लोकShloka 59
सरस्वत्याश्रयो गौरीनन्दनः श्रीनिकेतनः। गुरुगुप्तपदो वाचा सिद्धो वागीश्वरीपतिः॥
श्लोकShloka 60
नलिनीकामुको वामारामो ज्येष्ठामनोरमः। रौद्रीमुद्रितपादाब्जो हुंबीजस्तुङ्गशक्तिकः॥
श्लोकShloka 61
विश्वादिजननत्राणः स्वाहाशक्तिः सकीलकः। अमृताब्धिकृतावासो मदघूर्णितलोचनः॥
श्लोकShloka 62
उच्छिष्टगण उच्छिष्टगणेशो गणनायकः। सर्वकालिकसंसिद्धिर्नित्यशैवो दिगम्बरः॥
श्लोकShloka 63
अनपायोऽनन्तदृष्टिरप्रमेयोऽजरामरः। अनाविलोऽप्रतिरथो ह्यच्युतोऽमृतमक्षरम्॥
श्लोकShloka 64
अप्रतर्क्योऽक्षयोऽजय्योऽनाधारोऽनामयोऽमलः। अमोघसिद्धिरद्वैतमघोरोऽप्रमिताननः॥
श्लोकShloka 65
अनाकारोऽधिभूम्यग्निबलघ्नोऽव्यक्तलक्षणः। आधारपीठ आधार आधाराधेयवर्जितः॥
श्लोकShloka 66
आखुकेतन आशापूरक आखुमहारथः। इक्षुसागरमध्यस्थ इक्षुभक्षणलालसः॥
श्लोकShloka 67
इक्षुचापातिरेकश्रीरिक्षुचापनिषेवितः। इन्द्रगोपसमानश्रीरिन्द्रनीलसमद्युतिः॥
श्लोकShloka 68
इन्दीवरदलश्याम इन्दुमण्डलनिर्मलः। इध्मप्रिय इडाभाग इडाधामेन्दिराप्रियः॥
श्लोकShloka 69
इक्ष्वाकुविघ्नविध्वंसी इतिकर्तव्यतेप्सितः। ईशानमौलिरीशान ईशानसुत ईतिहा॥
श्लोकShloka 70
ईषणात्रयकल्पान्त ईहामात्रविवर्जितः। उपेन्द्र उडुभृन्मौलिरुण्डेरकबलिप्रियः॥
श्लोकShloka 71
उन्नतानन उत्तुङ्ग उदारत्रिदशाग्रणीः। ऊर्जस्वानूष्मलमद ऊहापोहदुरासदः॥
श्लोकShloka 72
ऋग्यजुःसामसम्भूतिर्ऋद्धिसिद्धिप्रवर्तकः। ऋजुचित्तैकसुलभ ऋणत्रयविमोचकः॥
श्लोकShloka 73
लुप्तविघ्नः स्वभक्तानां लुप्तशक्तिः सुरद्विषाम्। लुप्तश्रीर्विमुखार्चानां लूताविस्फोटनाशनः॥
श्लोकShloka 74
एकारपीठमध्यस्थ एकपादकृतासनः। एजिताखिलदैत्यश्रीरेजिताखिलसंश्रयः॥
श्लोकShloka 75
ऐश्वर्यनिधिरैश्वर्यमैहिकामुष्मिकप्रदः। ऐरम्मदसमोन्मेष ऐरावतनिभाननः॥
श्लोकShloka 76
ओंकारवाच्य ओंकार ओजस्वानोषधिपतिः। औदार्यनिधिरौद्धत्यधुर्य औन्नत्यनिःस्वनः॥
श्लोकShloka 77
अङ्कुशः सुरनागानामङ्कुशः सुरविद्विषाम्। असमस्तविसर्गाणां पदेषु परिकीर्तितः॥
श्लोकShloka 78
कमण्डलुधरः कल्पः कपर्दी कलभाननः। कर्मसाक्षी कर्मकर्ता कर्माकर्मफलप्रदः॥
श्लोकShloka 79
कदम्बगोलकाकारः कूष्माण्डगणनायकः। कारुण्यदेहः कपिलः कथकः कटिसूत्रभृत्॥
श्लोकShloka 80
खर्वः खड्गप्रियः खड्गखातान्तःस्थः खनिर्मलः। खल्वाटशृङ्गनिलयः खट्वाङ्गी खंदुरासदः॥
श्लोकShloka 81
गुणाढ्यो गहनो गस्थो गद्यपद्यसुधार्णवः। गद्यगानप्रियो गर्जो गीतगीर्वाणपूर्वजः॥
श्लोकShloka 82
गुह्याचाररतो गुह्यो गुह्यागमनिरूपितः। गुहाशयो गुहाब्धिस्थो गुरुगम्यो गुरोर्गुरुः॥
श्लोकShloka 83
घण्टाघर्घरिकामाली घटकुम्भो घटोदरः। चण्डश्चण्डेश्वरसुहृच्चण्डेशश्चण्डविक्रमः॥
श्लोकShloka 84
चराचरपतिश्चिन्तामणिश्चर्वणलालसः। छन्दश्छन्दोवपुश्छन्दोदुर्लक्ष्यश्छन्दविग्रहः॥
श्लोकShloka 85
जगद्योनिर्जगत्साक्षी जगदीशो जगन्मयः। जपो जपपरो जप्यो जिह्वासिंहासनप्रभुः॥
श्लोकShloka 86
झलज्झल्लोल्लसद्दानझङ्कारिभ्रमराकुलः। टङ्कारस्फारसंरावष्टङ्कारिमणिनूपुरः॥
श्लोकShloka 87
ठद्वयी पल्लवान्तःस्थः सर्वमन्त्रैकसिद्धिदः। डिण्डिमुण्डो डाकिनीशो डामरो डिण्डिमप्रियः॥
श्लोकShloka 88
ढक्कानिनादमुदितो ढौङ्को ढुण्ढिविनायकः। तत्त्वानां परमं तत्त्वं तत्त्वम्पदनिरूपितः॥
श्लोकShloka 89
तारकान्तरसंस्थानस्तारकस्तारकान्तकः। स्थाणुः स्थाणुप्रियः स्थाता स्थावरञ्जङ्गमं जगत्॥
श्लोकShloka 90
दक्षयज्ञप्रमथनो दाता दानवमोहनः। दयावान् दिव्यविभवो दण्डभृद्दण्डनायकः॥
श्लोकShloka 91
दन्तप्रभिन्नाभ्रमालो दैत्यवारणदारणः। दंष्ट्रालग्नद्विपघटो देवार्थनृगजाकृतिः॥
श्लोकShloka 92
धनधान्यपतिर्धन्यो धनदो धरणीधरः। ध्यानैकप्रकटो ध्येयो ध्यानं ध्यानपरायणः॥
श्लोकShloka 93
नन्द्यो नन्दिप्रियो नादो नादमध्यप्रतिष्ठितः। निष्कलो निर्ममो नित्यो नित्यानित्यो निरामयः॥
श्लोकShloka 94
परं व्योम परं धाम परमात्मा परं पदम्। परात्परः पशुपतिः पशुपाशविमोचकः॥
श्लोकShloka 95
पूर्णानन्दः परानन्दः पुराणपुरुषोत्तमः। पद्मप्रसन्ननयनः प्रणताज्ञानमोचनः॥
श्लोकShloka 96
प्रमाणप्रत्ययातीतः प्रणतार्तिनिवारणः। फलहस्तः फणिपतिः फेत्कारः फाणितप्रियः॥
श्लोकShloka 97
बाणार्चिताङ्घ्रियुगलो बालकेलिकुतूहली। ब्रह्म ब्रह्मार्चितपदो ब्रह्मचारी बृहस्पतिः॥
श्लोकShloka 98
बृहत्तमो ब्रह्मपरो ब्रह्मण्यो ब्रह्मवित्प्रियः। बृहन्नादाग्र्यचीत्कारो ब्रह्माण्डावलिमेखलः॥
श्लोकShloka 99
भ्रूक्षेपदत्तलक्ष्मीको भर्गो भद्रो भयापहः। भगवान् भक्तिसुलभो भूतिदो भूतिभूषणः॥
श्लोकShloka 100
भव्यो भूतालयो भोगदाता भ्रूमध्यगोचरः। मन्त्रो मन्त्रपतिर्मन्त्री मदमत्तो मनोरमः॥
श्लोकShloka 101
मेखलावान् मन्दगतिर्मतिमान् कमलेक्षणः। महाबलो महावीर्यो महाप्राणो महामनाः॥
श्लोकShloka 102
यज्ञो यज्ञपतिर्यज्ञगोप्ता यज्ञफलप्रदः। यशस्करो योगगम्यो याज्ञिको याजकप्रियः॥
श्लोकShloka 103
रसो रसप्रियो रस्यो रञ्जको रावणार्चितः। रक्षोरक्षाकरो रत्नगर्भो राज्यसुखप्रदः॥
श्लोकShloka 104
लक्ष्यालक्षप्रदो लक्ष्यो लयस्थो लड्डुकप्रियः। लानप्रियो लास्यपरो लाभकृल्लोकविश्रुतः॥
श्लोकShloka 105
वरेण्यो वह्निवदनो वन्द्यो वेदान्तगोचरः। विकर्ता विश्वतश्चक्षुर्विधाता विश्वतोमुखः॥
श्लोकShloka 106
वामदेवो विश्वनेता वज्री वज्रनिवारणः। विश्वबन्धनविष्कम्भाधारो विश्वेश्वरप्रभुः॥
श्लोकShloka 107
शब्दब्रह्म शमप्राप्यः शम्भुशक्तिगणेश्वरः। शास्ता शिखाग्रनिलयः शरण्यः शिखरीश्वरः॥
श्लोकShloka 108
षड्ऋतुकुसुमस्रग्वी षडाधारः षडक्षरः। संसारवैद्यः सर्वज्ञः सर्वभेषजभेषजम्॥
श्लोकShloka 109
सृष्टिस्थितिलयक्रीडः सुरकुञ्जरभेदनः। सिन्दूरितमहाकुम्भः सदसद्व्यक्तिदायकः॥
श्लोकShloka 110
साक्षी समुद्रमथनः स्वसंवेद्यः स्वदक्षिणः। स्वतन्त्रः सत्यसंकल्पः सामगानरतः सुखी॥
श्लोकShloka 111
हंसो हस्तिपिशाचीशो हवनं हव्यकव्यभुक्। हव्यं हुतप्रियो हर्षो हृल्लेखामन्त्रमध्यगः॥
श्लोकShloka 112
क्षेत्राधिपः क्षमाभर्ता क्षमापरपरायणः। क्षिप्रक्षेमकरः क्षेमानन्दः क्षोणीसुरद्रुमः॥
श्लोकShloka 113
धर्मप्रदोऽर्थदः कामदाता सौभाग्यवर्धनः। विद्याप्रदो विभवदो भुक्तिमुक्तिप्रदायकः॥
श्लोकShloka 114
आभिरूप्यकरो वीरः श्रीप्रदो विजयप्रदः। सर्ववश्यकरो गर्भदोषहा पुत्रपौत्रदः॥
श्लोकShloka 115
मेधादः कीर्तिदः शोकहारी दौर्भाग्यनाशनः। श्रीशोकहारी दौर्भाग्यनाशनः सर्वशक्तिभृत्॥
श्लोकShloka 116
प्रतिवादिमुखस्तम्भो हृष्टचित्तप्रसादनः। पराभिचारशमनो दुःखभञ्जनकारकः॥
श्लोकShloka 117
लवस्त्रुटिः कला काष्ठा निमेषस्तत्परः क्षणः। घटी मुहूर्तः प्रहरो दिवानक्तमहर्निशम्॥
श्लोकShloka 118
पक्षो मासोऽयनं वर्षं युगं कल्पो महालयः। राशिस्तारा तिथिर्योगो वारः करणमंशकम्॥
श्लोकShloka 119
लग्नं होरा कालचक्रं मेरुः सप्तर्षयो ध्रुवः। राहुर्मन्दः कविर्जीवो बुधो भौमः शशी रविः॥
श्लोकShloka 120
कालः सृष्टिः स्थितिर्विश्वं स्थावरं जङ्गमं च यत्। भूरापोऽग्निर्मरुद् व्योमाहंकृतिः प्रकृतिः पुमान्॥
श्लोकShloka 121
ब्रह्मा विष्णुः शिवो रुद्र ईशः शक्तिः सदाशिवः। त्रिदशाः पितरः सिद्धा यक्षरक्षांसि किन्नराः॥
श्लोकShloka 122
साध्या विद्याधरा भूता मनुष्याः पशवः खगाः। समुद्राः सरितः शैला भूतभव्यभवोद्भवः॥
श्लोकShloka 123
सांख्यं पातञ्जलं योगं पुराणानि श्रुतिः स्मृतिः। वेदाङ्गानि सदाचारो मीमांसा न्यायविस्तरः॥
श्लोकShloka 124
आयुर्वेदो धनुर्वेदो गान्धर्वं काव्यनाटकम्। वैखानसं भागवतं सात्वतं पाञ्चरात्रकम्॥
श्लोकShloka 125
शैवं पाशुपतं कालमुखं भैरवशासनम्। शाक्तं वैनायकं सौरं जैनमार्हतसंहिता॥
श्लोकShloka 126
सदसद् व्यक्तमव्यक्तं सचेतनमचेतनम्। बन्धो मोक्षः सुखं भोगो योगः सत्यमणुर्महान्॥
श्लोकShloka 127
स्वस्ति हुं फट् स्वधा स्वाहा श्रौषड् वौषड् वषण्नमः। ज्ञानविज्ञानमानन्दो बोधः संविच्छमो यमः॥
श्लोकShloka 128
एक एकाक्षराधार एकाक्षरपरायणः। एकाग्रधीरेकवीर एकानेकस्वरूपधृक्॥
श्लोकShloka 129
द्विरूपो द्विभुजो द्व्यक्षो द्विरदो द्वीपरक्षकः। द्वैमातुरो द्विवदनो द्वन्द्वातीतो द्वयातिगः॥
श्लोकShloka 130
त्रिधामा त्रिकरस्त्रेता त्रिवर्गफलदायकः। त्रिगुणात्मा त्रिलोकादिस्त्रिशक्तीशस्त्रिलोचनः॥
श्लोकShloka 131
चतुर्बाहुश्चतुर्दन्तश्चतुरात्मा चतुर्मुखः। चतुर्विधोपायमयश्चतुर्वर्णाश्रमाश्रयः॥
श्लोकShloka 132
चतुर्विधवचो वृत्तिपरिवर्तप्रवर्तकः। चतुर्थीपूजनप्रीतश्चतुर्थीतिथिसम्भवः॥
श्लोकShloka 133
पञ्चाक्षरात्मा पञ्चात्मा पञ्चास्यः पञ्चकृत्यकृत्। पञ्चाधारः पञ्चवर्णः पञ्चाक्षरपरायणः॥
श्लोकShloka 134
पञ्चतालः पञ्चकरः पञ्चप्रणवभावितः। पञ्चब्रह्ममयस्फूर्तिः पञ्चवारणवारितः॥
श्लोकShloka 135
पञ्चभक्ष्यप्रियः पञ्चबाणः पञ्चशिवात्मकः। षट्कोणपीठः षट्चक्रधामा षड्ग्रन्थिभेदकः॥
श्लोकShloka 136
षडध्वध्वान्तविध्वंसी षडङ्गुलमहाह्रदः। षण्मुखः षण्मुखभ्राता षट्शक्तिपरिवारितः॥
श्लोकShloka 137
षड्वैरिवर्गविध्वंसी षडूर्मिभयभञ्जनः। षट्तर्कदूरः षट्कर्मनिरतः षड्रसाश्रयः॥
श्लोकShloka 138
सप्तपातालचरणः सप्तद्वीपोरुमण्डलः। सप्तस्वर्लोकमुकुटः सप्तसप्तिवरप्रदः॥
श्लोकShloka 139
सप्ताङ्गराज्यसुखदः सप्तर्षिगणमण्डितः। सप्तच्छन्दोनिधिः सप्तहोता सप्तस्वराश्रयः॥
श्लोकShloka 140
सप्ताब्धिकेलिकासारः सप्तमातृनिषेवितः। सप्तच्छन्दोमोदमदः सप्तच्छन्दो मखप्रभुः॥
श्लोकShloka 141
अष्टमूर्तिर्ध्येयमूर्तिरष्टप्रकृतिकारणम्। अष्टाङ्गयोगफलभूरष्टपात्राम्बुजासनः॥
श्लोकShloka 142
अष्टशक्तिसमृद्धिश्रीरष्टैश्वर्यप्रदायकः। अष्टपीठोपपीठश्रीरष्टमातृसमावृतः॥
श्लोकShloka 143
अष्टभैरवसेव्योऽष्टवसुवन्द्योऽष्टमूर्तिभृत्। अष्टचक्रस्फुरन्मूर्तिरष्टद्रव्यहविःप्रियः॥
श्लोकShloka 144
नवनागासनाध्यासी नवविध्यनुशासिता। नवद्वारपुराधारो नवद्वारनिकेतनः॥
श्लोकShloka 145
नवनारायणस्तुत्यो नवदुर्गानिषेवितः। नवनाथमहानाथो नवनागविभूषणः॥
श्लोकShloka 146
नवरत्नविचित्राङ्गो नवशक्तिशिरोधृतः। दशात्मको दशभुजो दशदिक्पतिवन्दितः॥
श्लोकShloka 147
दशाध्यायो दशप्राणो दशेन्द्रियनियामकः। दशाक्षरमहामन्त्रो दशाशा व्याधिविग्रहः॥
श्लोकShloka 148
एकादशादिभिः रुद्रैः स्तुत एकादशाक्षरः। द्वादशोद्दण्डदोर्दण्डो द्वादशान्तनिकेतनः॥
श्लोकShloka 149
त्रयोदशभिदाभिन्नविश्वदेवाधिदैवतम्। चतुर्दशेन्द्रवरदश्चतुर्दशमनुप्रभुः॥
श्लोकShloka 150
चतुर्दशादिविद्याढ्यश्चतुर्दशजगत्प्रभुः। सामपञ्चदशः पञ्चदशीशीतांशुनिर्मलः॥
श्लोकShloka 151
षोडशाधारनिलयः षोडशस्वरमातृकः। षोडशान्तपदावासः षोडशेन्दुकलात्मकः॥
श्लोकShloka 152
कलासप्तदशी सप्तदशः सप्तदशाक्षरः। अष्टादशद्वीपपतिरष्टादशपुराणकृत्॥
श्लोकShloka 153
अष्टादशौषधीसृष्टिरष्टादशविधिस्मृतः। अष्टादशलिपिव्यष्टिसमष्टिज्ञानकोविदः॥
श्लोकShloka 154
एकविंशः पुमानेकविंशत्यङ्गुलिपल्लवः। चतुर्विंशतितत्त्वात्मा पञ्चविंशाख्यपूरुषः॥
श्लोकShloka 155
सप्तविंशतितारेशः सप्तविंशतियोगकृत्। द्वात्रिंशद्भैरवाधीशश्चतुस्त्रिंशन्महाह्रदः॥
श्लोकShloka 156
षट्त्रिंशत्तत्त्वसम्भूतिरष्टत्रिंशत्कलातनुः। नमदेकोनपञ्चाशन्मरुद्वर्गनिरर्गलः॥
श्लोकShloka 157
पञ्चाशदक्षरश्रेणिः पञ्चाशद्रुद्रविग्रहः। पञ्चाशद्विष्णुशक्तीशः पञ्चाशन्मातृकालयः॥
श्लोकShloka 158
द्विपञ्चाशद्वपुःश्रेणिस्त्रिषष्ट्यक्षरसंश्रयः। चतुष्षष्ट्यर्णनिर्णेता चतुःषष्टिकलानिधिः॥
श्लोकShloka 159
चतुष्षष्टिमहासिद्धयोगिनीवृन्दवन्दितः। अष्टषष्टिमहातीर्थक्षेत्रभैरवभावनः॥
श्लोकShloka 160
चतुर्नवतिमन्त्रात्मा षण्णवत्यधिकप्रभुः। शतानन्दः शतधृतिः शतपत्रायतेक्षणः॥
श्लोकShloka 161
शतानीकः शतमखः शतधारवरायुधः। सहस्रपत्रनिलयः सहस्रफणभूषणः॥
श्लोकShloka 162
सहस्रशीर्षा पुरुषः सहस्राक्षः सहस्रपात्। सहस्रनामसंस्तुत्यः सहस्राक्षबलापहः॥
श्लोकShloka 163
दशसाहस्रफणिभृत् फणिराजकृतासनः। अष्टाशीतिसहस्रौघमहर्षिस्तोत्रयन्त्रितः॥
श्लोकShloka 164
लक्षाधीशप्रियाधारो लक्षाधीशमनोमयः। चतुर्लक्षजपप्रीतश्चतुर्लक्षप्रकाशितः॥
श्लोकShloka 165
चतुरशीतिलक्षाणां जीवानां देहसंस्थितः। कोटिसूर्यप्रतीकाशः कोटिचन्द्रांशुनिर्मलः॥
श्लोकShloka 166
शिवाभवाध्युष्टकोटिविनायकधुरन्धरः। सप्तकोटिमहामन्त्रमन्त्रितावयवद्युतिः॥
श्लोकShloka 167
त्रयस्त्रिंशत्कोटिसुरश्रेणीप्रणतपादुकः। अनन्तदेवतासेव्यो ह्यनन्तमुनिसंस्तुतः॥
श्लोकShloka 168
अनन्तनामानन्तश्रीरनन्तानन्तसौख्यदः। इति वैनायकं नाम्नां सहस्रमिदमीरितम्॥
पहली पंक्ति में अन्तिम नाम हैं: अनन्तनामा (अनन्त नामों वाले), अनन्तश्री (अनन्त शोभा और समृद्धि वाले) और अनन्तानन्तसौख्यद (अपार से भी अपार सुख देने वाले)। यहीं नाम पूरे होते हैं, और महागणपति कहते हैं कि इस प्रकार विनायक के ये सहस्र (हज़ार) नाम कहे गए। छपे पाठ में इन दो पंक्तियों के बीच ‘फलश्रुतिः’ शीर्षक है, यानी यहाँ से पाठ का फल बताने वाला भाग आरम्भ होता है।The first line holds the last names: Anantanama (of endless names), Anantashri (of endless splendour and fortune) and Anantanantasaukhyada (giver of joy beyond all measure). Here the names end, and Mahaganapati says: thus have these thousand names of Vinayaka been told. The print sets the heading ‘phalashruti’ between these two lines, marking the start of the part that tells the fruit of the reading.
फलश्रुतिPhalashruti 169
इदं ब्राह्मे मुहूर्ते वै यः पठेत् प्रत्यहं नरः। करस्थं तस्य सकलमैहिकामुष्मिकं सुखम्॥
फलश्रुति कहती है कि जो व्यक्ति इसे प्रतिदिन ब्राह्म मुहूर्त में (सूर्योदय से पहले के शान्त समय में) पढ़ता है, उसके लिए इस लोक और परलोक का सारा सुख मानो उसके हाथ में रखा (करस्थ) हो जाता है।The phalashruti says that for one who reads this every day at brahma muhurta (the quiet time before sunrise), all the happiness of this world and the next is as if placed in their hand.
फलश्रुतिPhalashruti 170
आयुरारोग्यमैश्वर्यं धर्मः शौर्यं बलं यशः। मेधा प्रज्ञा धृतिः कान्तिः सौभाग्यमतिरूपता॥
फलश्रुति आगे गिनाती है: आयु, आरोग्य, ऐश्वर्य, धर्म, शौर्य, बल, यश, मेधा (धारण करने वाली बुद्धि), प्रज्ञा (गहरी समझ), धृति (धैर्य और स्थिरता), कान्ति (तेज), सौभाग्य और अतिशय सुन्दरता (अतिरूपता)। यह सूची 173वें श्लोक तक चलती है।The phalashruti goes on to list: long life, health, prosperity, dharma, courage, strength, fame, retentive intelligence (medha), insight (prajna), steadiness (dhriti), radiance (kanti), good fortune and great beauty (atirupata). The list runs on to verse 173.
फलश्रुतिPhalashruti 171
सत्यं दया क्षमा शान्तिर्दाक्षिण्यं धर्मशीलता। जगत्संयमनं विश्वसंवादो वादपाटवम्॥
सत्य, दया, क्षमा, शान्ति, दाक्षिण्य (उदार और विनम्र व्यवहार), धर्म में स्वाभाविक रुचि (धर्मशीलता), संसार को वश में रखने की शक्ति (जगत्संयमन), सबसे मेल-जोल (विश्वसंवाद) और वाद-विवाद में कुशलता (वादपाटव)।Truthfulness, compassion, forgiveness, peace, courtesy (dakshinya), a dharmic nature (dharmashilata), the power to hold the world in check (jagatsamyamana), harmony with all (vishvasamvada) and skill in debate (vadapatava).
फलश्रुतिPhalashruti 172
सभापाण्डित्यमौदार्यं गाम्भीर्यं ब्रह्मवर्चसम्। औन्नत्यं च कुलं शीलं प्रतापो वीर्यमार्यता॥
सभा में चमकने वाली विद्वत्ता (सभापाण्डित्य), उदारता, गम्भीरता, ब्रह्मवर्चस (विद्या और तप का तेज), उन्नति, उत्तम कुल, शील (अच्छा आचरण), प्रताप, पराक्रम (वीर्य) और आर्यता (सज्जनता)।Learning that shines in an assembly (sabhapanditya), generosity, depth, brahmavarchas (the radiance of sacred learning and austerity), eminence, a good family, good conduct (shila), majesty (pratapa), valour (virya) and nobility (aryata).
फलश्रुतिPhalashruti 173
ज्ञानं विज्ञानमास्तिक्यं धैर्यं विश्वातिशायिता। धनधान्यादिवृद्धिश्च सकृदस्य जपाद्भवेत्॥
ज्ञान, विज्ञान (अनुभव से पक्का हुआ ज्ञान), आस्तिकता, धैर्य, संसार में सबसे बढ़कर होना (विश्वातिशायिता) और धन-धान्य आदि की वृद्धि; फलश्रुति कहती है कि यह सब इस स्तोत्र के एक बार (सकृत्) के जप से भी होता है।Knowledge, realised knowledge (vijnana), faith, fortitude, pre-eminence in the world (vishvatishayita) and growth of wealth, grain and the like: the phalashruti says all this comes from reciting the hymn even once (sakrit).
फलश्रुतिPhalashruti 174
वश्यं चतुर्विधं नृणां जपादस्य प्रजायते। राज्ञो राजकलत्रस्य राजपुत्रस्य मन्त्रिणः॥
फलश्रुति के अनुसार इसके जप से लोगों पर चार प्रकार का वश्य (प्रभाव) उत्पन्न होता है: राजा पर, राजा की रानी (राजकलत्र) पर, राजकुमार पर और मन्त्री पर। यह वाक्य अगले श्लोक में पूरा होता है।According to the phalashruti, reciting it gives a fourfold influence (vashya) over people: over a king, a king’s consort (rajakalatra), a prince and a minister. The sentence is completed in the next verse.
फलश्रुतिPhalashruti 175
जप्यते यस्य वश्यार्थे स दासस्तस्य जायते। धर्मार्थकाममोक्षाणामनायासेन साधनम्॥
जिसे अनुकूल करने के लिए इसका जप किया जाए, वह जप करने वाले का सेवक-सा हो जाता है, ऐसा फलश्रुति कहती है। इसे धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष, चारों को बिना श्रम (अनायास) साधने का उपाय भी बताया गया है।Whoever it is recited to win over becomes like a servant to the reciter, the phalashruti says. It is also called an effortless (anayasa) means to all four aims of life: dharma, artha, kama and moksha.
फलश्रुतिPhalashruti 176
शाकिनीडाकिनीरक्षोयक्षोरगभयापहम्। साम्राज्यसुखदं चैव समस्तरिपुमर्दनम्॥
यह स्तोत्र शाकिनी, डाकिनी, राक्षस, यक्ष और सर्पों (उरग) का भय दूर करने वाला, साम्राज्य का सुख देने वाला और सब शत्रुओं को परास्त करने वाला कहा गया है।This hymn is said to remove the fear of shakinis, dakinis, rakshasas, yakshas and serpents (uraga), to give the joy of sovereignty and to overcome all enemies.
फलश्रुतिPhalashruti 177
समस्तकलहध्वंसि दग्धबीजप्ररोहणम्। दुःस्वप्नशमनं क्रुद्धस्वामिचित्तप्रसादनम्॥
इसे सब कलहों (झगड़ों) को मिटाने वाला, जले हुए बीज को भी अंकुरित कर देने वाला (दग्धबीजप्ररोहण), बुरे स्वप्नों को शान्त करने वाला और क्रोधित स्वामी के मन को प्रसन्न करने वाला बताया गया है।It is said to end all quarrels, to make even a burnt seed sprout (dagdhabija-prarohana), to quiet bad dreams and to soothe the mind of an angry master.
फलश्रुतिPhalashruti 178
षट्कर्माष्टमहासिद्धित्रिकालज्ञानसाधनम्। परकृत्योपशमनं परचक्रविमर्दनम्॥
यह षट्कर्म (तन्त्र के छह कर्म), आठ महासिद्धियों और तीनों कालों के ज्ञान का साधन, दूसरों द्वारा किए गए अभिचार (परकृत्या) को शान्त करने वाला और शत्रु-सेना (परचक्र) को परास्त करने वाला कहा गया है।It is called a means to the six rites of tantra (shatkarma), the eight great siddhis and knowledge of past, present and future, a calmer of sorcery worked by others (parakritya) and a vanquisher of hostile armies (parachakra).
फलश्रुतिPhalashruti 179
संग्रामरङ्गे सर्वेषामिदमेकं जयावहम्। एवं वन्ध्यात्वदोषघ्नं गर्भरक्षैककारणम्॥
युद्ध-भूमि (संग्राम-रंग) में सबके लिए यही एक स्तोत्र विजय दिलाने वाला बताया गया है। इसी प्रकार इसे वन्ध्यात्व (सन्तान न होने) के दोष को दूर करने वाला और गर्भ की रक्षा का मुख्य साधन कहा गया है।On the field of battle this one hymn is said to bring victory to all. In the same way it is called a remover of the fault of barrenness (vandhyatva) and the chief means of protecting a pregnancy.
फलश्रुतिPhalashruti 180
पठ्यते प्रत्यहं यत्र स्तोत्रं गणपतेरिदम्। देशे तत्र न दुर्भिक्षमीतयो दुरितानि च॥
जिस देश (स्थान) में गणपति का यह स्तोत्र प्रतिदिन पढ़ा जाता है, वहाँ अकाल (दुर्भिक्ष), ईतियाँ (टिड्डी, अतिवृष्टि जैसी खेती की विपत्तियाँ) और पाप से उपजे कष्ट नहीं होते, ऐसा फलश्रुति कहती है।Where this hymn of Ganapati is read every day, the phalashruti says, that land knows no famine, no itis (plagues on crops such as locusts or floods) and no ills born of wrongdoing.
फलश्रुतिPhalashruti 181
न तद्गेहं जहाति श्रीर्यत्रायं जप्यते स्तवः। क्षयकुष्ठप्रमेहार्शो भगन्दरविषूचिकाः॥
जिस घर में यह स्तुति जपी जाती है, उस घर को लक्ष्मी (श्री) नहीं छोड़तीं। यहाँ से रोगों की एक सूची आरम्भ होती है जो 185वें श्लोक तक चलती है: क्षय, कुष्ठ, प्रमेह (मूत्र-रोग), अर्श (बवासीर), भगन्दर और विषूचिका (हैज़ा)।Shri (Lakshmi) does not leave the house where this hymn is recited. Here begins a list of illnesses that runs to verse 185: consumption (kshaya), skin disease (kushtha), prameha (urinary disorders), piles (arsha), fistula (bhagandara) and cholera (vishuchika).
फलश्रुतिPhalashruti 182
गुल्मं प्लीहानमाध्मानमतिसारं महोदरम्। कासं श्वासमुदावर्तं शूलं शोकारिसम्भवम्॥
गुल्म (पेट की गाँठ), प्लीहा (तिल्ली) का रोग, आध्मान (पेट फूलना), अतिसार, महोदर (जलोदर), खाँसी, श्वास, उदावर्त (वायु का उलटा चढ़ना), और शोक या शत्रुओं से उपजा शूल (तीव्र पीड़ा; शोकारिसम्भव)।Abdominal lumps (gulma), disease of the spleen, bloating (adhmana), diarrhoea, dropsy (mahodara), cough, breathlessness, udavarta (wind forced upward), and the sharp pain (shula) that arises from grief or from foes (shokarisambhava).
फलश्रुतिPhalashruti 183
शिरोरोगं वमिं हिक्कां गण्डमालामरोचकम्। वातपित्तकफद्वन्द्वत्रिदोषजनितज्वरम्॥
सिर के रोग, वमन (उलटी), हिचकी, गण्डमाला (गले की गाँठें), अरुचि (भोजन में रुचि न होना), और वात, पित्त, कफ में से दो (द्वन्द्व) या तीनों (त्रिदोष) के बिगड़ने से उपजा ज्वर।Diseases of the head, vomiting, hiccups, scrofula (gandamala), loss of appetite, and fever from a disorder of two of the three doshas (vata, pitta, kapha) or of all three.
फलश्रुतिPhalashruti 184
आगन्तुविषमं शीतमुष्णं चैकाहिकादिकम्। इत्याद्युक्तमनुक्तं वा रोगं दोषादिसम्भवम्॥
बाहरी कारण से आया (आगन्तु) ज्वर, विषम ज्वर, ठण्ड वाला और गर्मी वाला ज्वर, प्रतिदिन लौटने वाला (ऐकाहिक) आदि ज्वर; संक्षेप में, यहाँ कहे गए या न कहे गए, दोषों आदि से उपजे सभी रोग (इनकी बात अगले श्लोक में पूरी होती है)।Fever from an outside cause (agantu), irregular fever (vishama), fevers of cold and of heat, the daily (aikahika) and other recurring fevers; in short, every illness born of the doshas and the like, whether named here or not (the sentence ends in the next verse).
फलश्रुतिPhalashruti 185
सर्वं प्रशमयत्याशु स्तोत्रस्यास्य सकृज्जपात्। सकृत् पाठेन संसिद्धिः स्त्रीशूद्रपतितैरपि॥
इस स्तोत्र के एक बार के जप से शीघ्र शान्त हो जाते हैं, ऐसा फलश्रुति कहती है। वह यह भी कहती है कि एक बार के पाठ से स्त्रियाँ, शूद्र और पतित (समाज से बाहर किए गए) कहे जाने वाले लोग भी सिद्धि पाते हैं; अर्थात् यह पाठ सबके लिए खुला है।All these, the phalashruti says, are quickly calmed by reciting this hymn even once. It adds that a single reading brings success even to women, shudras and those called outcast (patita); that is, the reading is open to everyone.
फलश्रुतिPhalashruti 186
सहस्रनाममन्त्रोऽयं जप्तव्यस्तु शुभाप्तये। महागणपतेः स्तोत्रं सकामः प्रजपन्निदम्॥
यह सहस्रनाम-मन्त्र शुभ की प्राप्ति के लिए जपना चाहिए। जो व्यक्ति किसी कामना के साथ (सकाम भाव से) महागणपति के इस स्तोत्र का जप करता है, उसका फल आगे के श्लोकों में बताया गया है।This thousand-name mantra should be recited for the sake of what is auspicious. What follows for one who recites this hymn of Mahaganapati with a wish in mind (sakama) is told in the verses that come next.
फलश्रुतिPhalashruti 187
इच्छया सकलान् भोगानुपभुज्येह पार्थिवान्। मनोरथफलैर्दिव्यैर्व्योमयानैर्मनोरमैः॥
वह इस लोक में इच्छानुसार पृथ्वी के सब भोग भोगकर, मनोरथ का फल देने वाले, मन को भाने वाले दिव्य आकाश-विमानों (व्योमयान) से (आगे के श्लोक में कहे लोकों में विचरता है)।Having enjoyed at will all the pleasures of the earth here, they travel in delightful heavenly sky-chariots (vyomayana) that grant every wish, to the worlds named in the next verse.
फलश्रुतिPhalashruti 188
चन्द्रेन्द्रभास्करोपेन्द्रब्रह्मरुद्रादिसद्मसु। कामरूपः कामगतिः कामतो विचरन्निह॥
चन्द्र, इन्द्र, सूर्य (भास्कर), उपेन्द्र (विष्णु), ब्रह्मा, रुद्र आदि देवताओं के लोकों में वह इच्छानुसार रूप धारण करके (कामरूप) और इच्छानुसार गति से (कामगति) अपनी इच्छा से विचरता है।They roam at will through the worlds of the Moon, Indra, the Sun (Bhaskara), Upendra (Vishnu), Brahma, Rudra and the other gods, taking any form they wish (kamarupa) and going wherever they wish (kamagati).
फलश्रुतिPhalashruti 189
भुक्त्वा यथेप्सितान् भोगानभीष्टैः सह बन्धुभिः। गणेशानुचरो भूत्वा महागणपतेः प्रियः॥
अपने प्रिय बन्धुओं के साथ मनचाहे भोग भोगकर वह गणेश का अनुचर (सेवक-गण) बनता है और महागणपति का प्रिय होता है।Having enjoyed the pleasures they desire together with their dear ones, they become an attendant of Ganesha (ganeshanuchara) and dear to Mahaganapati.
फलश्रुतिPhalashruti 190
नन्दीश्वरादिसानन्दी नन्दितः सकलैर्गणैः। शिवाभ्यां कृपया पुत्रनिर्विशेषं च लालितः॥
वहाँ वह नन्दीश्वर आदि के साथ आनन्द में रहता है, सब गण उसका अभिनन्दन करते हैं, और शिव-पार्वती (शिवा और शिव) कृपा करके उसे अपने पुत्र के समान ही लाड़-प्यार देते हैं।There they rejoice in the company of Nandishvara and the others, are welcomed by all the ganas, and are cherished by Shiva and Parvati in their grace no differently from a son of their own.
फलश्रुतिPhalashruti 191
शिवभक्तः पूर्णकामो गणेश्वरवरात्पुनः। जातिस्मरो धर्मपरः सार्वभौमोऽभिजायते॥
फिर गणेश्वर के वर से वह शिवभक्त, सब कामनाओं से पूर्ण, पूर्वजन्म को याद रखने वाला (जातिस्मर), धर्मपरायण और सार्वभौम (पूरी पृथ्वी का राजा) होकर जन्म लेता है।Then, by the boon of Ganeshvara, they are born again as a devotee of Shiva, with every wish fulfilled, remembering their past life (jatismara), devoted to dharma and a sovereign of the whole earth (sarvabhauma).
फलश्रुतिPhalashruti 192
निष्कामस्तु जपन्नित्यं भक्त्या विघ्नेशतत्परः। योगसिद्धिं परां प्राप्य ज्ञानवैराग्यसंस्थितः॥
पर जो बिना किसी कामना के (निष्काम), भक्ति से विघ्नेश (विघ्नों के स्वामी गणेश) में मन लगाकर इसे नित्य जपता है, वह परम योग-सिद्धि पाकर ज्ञान और वैराग्य में स्थिर हो जाता है। यह वाक्य 194वें श्लोक तक चलता है।But one who recites it daily without any wish (nishkama), absorbed in devotion to Vighnesha (lord of obstacles), attains the highest perfection of yoga and becomes established in knowledge and detachment. The sentence runs on to verse 194.
फलश्रुतिPhalashruti 193
निरन्तरोदितानन्दे वरमानन्दसंविदि। विश्वोत्तीर्णे परे वारे पुनरावृत्तिवर्जिते॥
वह उस परम धाम की ओर जाता है जहाँ आनन्द निरन्तर उदित रहता है, जो श्रेष्ठ आनन्द और चेतना (संविद्) का रूप है, जो विश्व से परे है, सबसे ऊपर है और जहाँ से फिर लौटना (पुनर्जन्म) नहीं होता।They go to that supreme abode where bliss rises without a break, which is excellent bliss and pure awareness (samvid), which lies beyond the universe, above all else, and from which there is no coming back.
फलश्रुतिPhalashruti 194
लीनो वैनायके धाम्नि रमते नित्यनिर्वृतः। यो नामभिर्हुतेदेतैरर्चयेत्पूजयेन्नरः॥
विनायक के उस धाम में लीन होकर वह सदा तृप्त (नित्यनिर्वृत) रहकर आनन्द में रमता है। आगे फलश्रुति कहती है: जो मनुष्य इन नामों से आहुति देता है, अर्चना करता है और पूजा करता है, (उसका फल अगले श्लोक में है)।Merged in Vinayaka’s abode, they delight there, ever at peace (nityanirvrita). The phalashruti goes on: whoever makes offerings into the fire with these names, and honours and worships with them, gains what the next verse says.
फलश्रुतिPhalashruti 195
राजानो वश्यतां यान्ति रिपवो यान्ति दासताम्। मन्त्राः सिध्यन्ति सर्वेऽपि सुलभास्तस्य सिद्धयः॥
उसके वश में राजा आ जाते हैं, शत्रु दास बन जाते हैं, उसके सभी मन्त्र सिद्ध हो जाते हैं और सिद्धियाँ उसके लिए सुलभ हो जाती हैं, ऐसा फलश्रुति कहती है।Kings come under their sway, enemies become their servants, all their mantras bear fruit and the siddhis come easily to them, the phalashruti says.
फलश्रुतिPhalashruti 196
मूलमन्त्रादपि स्तोत्रमिदं प्रियतरं मम। नभस्ये मासि शुक्लायां चतुर्थ्यां मम जन्मनि॥
महागणपति कहते हैं: यह स्तोत्र मुझे मेरे मूलमन्त्र से भी अधिक प्रिय है। नभस्य (भाद्रपद) मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को, जो मेरा जन्म-दिन है, (क्या करना चाहिए, यह अगले श्लोक में है)।Mahaganapati says: this hymn is dearer to me even than my root mantra (mula mantra). What one should do on the fourth day of the bright half of the month of Nabhasya (Bhadrapada), the day of my birth, is told in the next verse.
फलश्रुतिPhalashruti 197
दूर्वाभिर्नामभिः पूजां तर्पणं विधिवच्चरेत्। अष्टद्रव्यैर्विशेषेण जुहुयाद्भक्तिसंयुतः॥
उस दिन इन नामों से दूर्वा चढ़ाते हुए पूजा और विधिपूर्वक तर्पण करना चाहिए, और विशेष रूप से भक्ति के साथ आठ द्रव्यों (अष्टद्रव्य) से हवन करना चाहिए।On that day one should worship with durva grass offered with these names, perform tarpana (water offerings) as prescribed, and above all offer the eight substances (ashtadravya) into the fire with devotion.
फलश्रुतिPhalashruti 198
तस्येप्सितानि सर्वाणि सिध्यन्त्यत्र न संशयः। इदं प्रजप्तं पठितं पाठितं श्रावितं श्रुतम्॥
ऐसा करने वाले की सभी इच्छाएँ यहीं पूरी होती हैं, इसमें संशय नहीं, ऐसा कहा गया है। यह स्तोत्र चाहे जपा जाए, पढ़ा जाए, पढ़ाया जाए, दूसरों को सुनाया जाए या सुना जाए, (इसका फल अगले श्लोक में है)।All the wishes of one who does this are fulfilled here, without doubt, it says. Whether this hymn is recited, read, taught, recited for others or heard, its fruit is given in the next verse.
फलश्रुतिPhalashruti 199
व्याकृतं चर्चितं ध्यातं विमृष्टमभिनन्दितम्। इहामुत्र च सर्वेषां विश्वैश्वर्यप्रदायकम्॥
चाहे इसकी व्याख्या की जाए, चर्चा की जाए, इसका ध्यान किया जाए, मनन किया जाए या इसका अभिनन्दन किया जाए, यह इस लोक और परलोक में सबको सम्पूर्ण ऐश्वर्य देने वाला कहा गया है।Whether it is explained, discussed, meditated on, reflected upon or welcomed with joy, it is said to give every kind of prosperity to all, in this world and the next.
फलश्रुतिPhalashruti 200
स्वच्छन्दचारिणाप्येष येन संधार्यते स्तवः। संरक्ष्यते शिवोद्भूतैर्गणैरध्युष्टकोटिभिः॥
जो इस स्तुति को धारण करता है (मन में या लिखकर साथ रखता है), वह चाहे स्वच्छन्द होकर कहीं भी घूमे, शिव से उत्पन्न साढ़े तीन करोड़ (अध्युष्टकोटि) गण उसकी रक्षा करते हैं, ऐसा फलश्रुति कहती है।Whoever keeps this hymn with them, in mind or in writing, even if they wander wherever they please, is guarded by the ganas born of Shiva, three and a half crore (adhyushtakoti) of them, the phalashruti says.
फलश्रुतिPhalashruti 201
पुस्तके लिखितं स्तोत्रं मन्त्रभूतं प्रपूजयेत्। तत्र सर्वोत्तमा लक्ष्मीः संनिधत्ते निरन्तरम्॥
इस स्तोत्र को पुस्तक में लिखकर, उसे मन्त्र-रूप मानकर उसकी पूजा करनी चाहिए; जहाँ ऐसा होता है, वहाँ सर्वश्रेष्ठ लक्ष्मी निरन्तर निवास करती हैं, ऐसा कहा गया है।The hymn, written in a book, should be worshipped as a mantra in itself; where that is done, the highest Lakshmi dwells without a break, it says.
फलश्रुतिPhalashruti 202
दानैरशेषैरखिलैर्व्रतैश्च तीर्थैरशेषैः सकलैर्मखैश्च। न तत्फलं विन्दति यद्गणेशसहस्र नाम्नां स्मरणेन सद्यः॥
सब दानों, सारे व्रतों, सब तीर्थों और सभी यज्ञों (मख) से भी मनुष्य वह फल नहीं पाता, जो गणेश के सहस्र नामों के स्मरण मात्र से तुरन्त मिल जाता है, ऐसा फलश्रुति कहती है।Not by every gift, every vow, every pilgrimage or every sacrifice (makha) does one gain the fruit that comes at once from simply remembering Ganesha’s thousand names, the phalashruti says.
फलश्रुतिPhalashruti 203
एतन्नाम्नां सहस्रं पठति दिनमणौ प्रत्यहं प्रोज्जिहाने सायं मध्यन्दिने वा त्रिषवणमथवा संततं वा जनो यः। स स्यादैश्वर्यधुर्यः प्रभवति वचसां कीर्तिमुच्चैस्तनोति प्रत्यूहं हन्ति विश्वं वशयति सुचिरं वर्धते पुत्रपौत्रैः॥
जो व्यक्ति इन हज़ार नामों को प्रतिदिन सूर्य (दिनमणि) के उदय के समय, या सन्ध्या को, या मध्याह्न में, या तीनों समय (त्रिषवण), या निरन्तर पढ़ता है, वह ऐश्वर्य में अग्रणी होता है, वाणी पर उसका अधिकार होता है और उसकी कीर्ति दूर तक फैलती है। फलश्रुति कहती है कि वह विघ्नों (प्रत्यूह) को नष्ट करता है, सबको अपने अनुकूल करता है और पुत्र-पौत्रों के साथ लम्बे समय तक फलता-फूलता है।Whoever reads these thousand names every day as the sun (dinamani) rises, or in the evening, or at midday, or at all three times (trishavana), or without a break, becomes foremost in prosperity, gains mastery of speech and spreads their fame far. The phalashruti says they strike down obstacles (pratyuha), win everyone over and flourish for long with children and grandchildren.
फलश्रुतिPhalashruti 204
अकिञ्चनोऽप्येकचित्तो नियतो नियतासनः। जपेत्तु चतुरो मासान् गणेशार्चनतत्परः॥
जिसके पास कुछ भी न हो (अकिंचन), वह भी यदि एकाग्र मन से, संयम से (नियत) और एक निश्चित आसन पर बैठकर, गणेश की अर्चना में लगा रहकर चार महीने तक इसका जप करे, (तो उसका फल अगले श्लोक में है)।Even one who owns nothing (akinchana), if they recite it for four months with a one-pointed mind, self-restrained (niyata), seated in a fixed posture and devoted to the worship of Ganesha, gains what the next verse says.
फलश्रुतिPhalashruti 205
दरिद्रतां समुन्मूल्य सप्तजन्मानुगामपि। लभते महतीं लक्ष्मीमित्याज्ञा पारमेश्वरी॥
वह सात जन्मों से पीछे लगी दरिद्रता को भी जड़ से उखाड़कर महान लक्ष्मी (समृद्धि) पाता है; फलश्रुति इसे परमेश्वर की आज्ञा कहती है।They uproot a poverty that has followed them through seven births and gain great fortune (Lakshmi); the phalashruti calls this the command of the Supreme Lord.
फलश्रुतिPhalashruti 206
आयुष्यं वीतरोगं कुलमतिविमलं सम्पदश्चार्तदानाः कीर्तिर्नित्यावदाता भणितिरभिनवा कान्तिरव्याजभव्या। पुत्राः सन्तः कलत्रं गुणवदभिमतं यद्यदेतच्च सत्यं नित्यं यः स्तोत्रमेतत् पठति गणपतेस्तस्य हस्ते समस्तम्॥
दीर्घ आयु, रोग-रहित जीवन, अत्यन्त निर्मल कुल, दुखियों को दान में जाने वाली सम्पत्ति, सदा उजली कीर्ति, नित नई वाणी (भणिति), सहज और सच्ची सुन्दरता (अव्याजभव्य कान्ति), सज्जन सन्तान, गुणवान और मनचाहा जीवन-साथी, और जो कुछ भी अभीष्ट हो: फलश्रुति सत्य कहकर बताती है कि गणपति का यह स्तोत्र नित्य पढ़ने वाले के हाथ में यह सब है।Long life, freedom from illness, a spotless family, wealth that goes in gifts to the needy, fame that stays ever bright, ever-fresh eloquence (bhaniti), an unaffected grace, good children, a virtuous and loving spouse and whatever else is wished for: all this, the phalashruti says as a truth, lies in the hand of one who reads this hymn of Ganapati every day.
फलश्रुतिPhalashruti 207
ॐ गणंजयो गणपतिर्हेरम्बो धरणीधरः। महागणपतिर्लक्षप्रदः क्षिप्रप्रसादनः॥
यहाँ से इक्कीस नामों का एक छोटा समूह आता है: गणंजय (गणों पर विजय पाने वाले), गणपति (गणों के स्वामी), हेरम्ब (परम्परा के अनुसार दीनों के रक्षक), धरणीधर (पृथ्वी को धारण करने वाले), महागणपति (गणों के महान स्वामी), लक्षप्रद (लाखों देने वाले) और क्षिप्रप्रसादन (शीघ्र प्रसन्न होने वाले)।Here begins a short set of twenty-one names: Ganamjaya (victor over the hosts), Ganapati (lord of the ganas), Heramba (by tradition, protector of the helpless), Dharanidhara (upholder of the earth), Mahaganapati (great lord of the ganas), Lakshaprada (giver of lakhs) and Kshipraprasadana (quickly pleased).
फलश्रुतिPhalashruti 208
अमोघसिद्धिरमृतो मन्त्रश्चिन्तामणिर्निधिः। सुमङ्गलो बीजमाशापूरको वरदः शिवः॥
अमोघसिद्धि (जिनकी सिद्धि कभी व्यर्थ न जाए), अमृत, मन्त्र, चिन्तामणि (मनचाहा देने वाली मणि), निधि (ख़ज़ाना), सुमंगल (परम कल्याणकारी), बीज, आशापूरक (आशाएँ पूरी करने वाले), वरद (वर देने वाले) और शिव (कल्याण-स्वरूप)।Amoghasiddhi (whose success never fails), Amrita (the nectar), Mantra, Chintamani (the wish-granting gem), Nidhi (the treasure), Sumangala (supremely auspicious), Bija (the seed), Ashapuraka (fulfiller of hopes), Varada (giver of boons) and Shiva (the auspicious one).
फलश्रुतिPhalashruti 209
काश्यपो नन्दनो वाचा सिद्धो ढुण्ढिविनायकः। मोदकैरेभिरत्रैकविंशत्या नामभिः पुमान्॥
काश्यप (कश्यप मुनि के पुत्र-रूप), नन्दन (आनन्द देने वाले पुत्र), वाचासिद्ध (जिनका वचन सिद्ध होता है) और ढुण्ढिविनायक (काशी में ढुण्ढिराज नाम से पूजे जाने वाले विनायक)। जो व्यक्ति मोदक अर्पित करते हुए इन इक्कीस नामों से (स्तुति करता है, उसकी बात अगले श्लोक में है)।Kashyapa (born as the son of the sage Kashyapa), Nandana (the son who gives joy), Vachasiddha (whose word comes true) and Dhundhivinayaka (the Vinayaka worshipped in Kashi as Dhundhiraja). What follows for a person who offers modakas with these twenty-one names is told in the next verse.
फलश्रुतिPhalashruti 210
यः स्तौति मद्गतमना ममाराधनतत्परः। स्तुतो नाम्नां सहस्रेण तेनाहं नात्र संशयः॥
जो मुझमें मन लगाकर, मेरी आराधना में तत्पर होकर (इन नामों से) मेरी स्तुति करता है, उसने मानो सहस्र नामों से ही मेरी स्तुति कर दी, इसमें संशय नहीं; ऐसा महागणपति कहते हैं।One who praises me with these names, their mind set on me and intent on my worship, has praised me with the full thousand names: of this there is no doubt, says Mahaganapati.
फलश्रुतिPhalashruti 211
नमो नमः सुरवरपूजिताङ्घ्रये नमो नमो निरुपममङ्गलात्मने। नमो नमो विपुलकरैकसिद्धये नमो नमः करिकलभाननाय ते॥
श्रेष्ठ देवताओं द्वारा पूजे गए चरणों वाले आपको बार-बार नमस्कार है; अनुपम मंगल-स्वरूप आपको बार-बार नमस्कार है। जिनके विशाल कर (हाथ या सूँड़) से ही हर सिद्धि मिलती है (विपुलकरैकसिद्धि), उन आपको बार-बार नमस्कार है; हाथी के बच्चे (करिकलभ) के समान मुख वाले आपको बार-बार नमस्कार है।Salutations again and again to you whose feet the best of the gods worship; salutations again and again to you, the soul of matchless auspiciousness. Salutations again and again to you whose mighty hand (kara, hand or trunk) alone grants every success; salutations again and again to you whose face is that of a young elephant (karikalabha).
फलश्रुतिPhalashruti 212
किङ्किणिगणरणितस्तव चरणः प्रकटितगुरुमतिचरितविशेषः। मदजललहरीकलितकपोलः शमयतु दुरितं गणपतिदेवः॥
आपके चरण घुँघरुओं (किंकिणी) के समूह से झनकते हैं। जिन्होंने महान बुद्धि से भरा अपना विशेष चरित्र प्रकट किया है और जिनके कपोल मद-जल की लहरों से सजे हैं, वे गणपति देव दुरित (पाप और उससे उपजे कष्ट) को शान्त करें।Your feet ring with clusters of little bells (kinkini). May Lord Ganapati, whose deeds reveal a great wisdom and whose cheeks are marked with waves of musth, quell all wrongdoing and the ills it brings (durita).
यह स्तोत्र कहाँ से हैWhere it comes from
गीता प्रेस के ‘सहस्रनामस्तोत्रसंग्रह’ में यह बाईसवाँ स्तोत्र है। इसकी पुष्पिका कहती है कि यह शाक्तप्रमोद के अन्तर्गत गणेशतन्त्र से उद्धृत है; शाक्तप्रमोद अलग-अलग देवताओं के तन्त्रों और स्तोत्रों का एक संग्रह-ग्रन्थ है। इसके रचयिता का नाम ज्ञात नहीं है।
यही नाम, इसी क्रम में और इसी वक्ता-पंक्ति के साथ, गणेश पुराण के उपासना खण्ड के छियालीसवें अध्याय में मिलते हैं। वहाँ ब्रह्मा जी एक मुनि को बताते हैं कि त्रिपुर पर विजय के लिए निकलते समय भगवान् शिव ने पहले गणेश की पूजा नहीं की और उनके काम में विघ्न आने लगे; तब उन्होंने महागणपति की पूजा की, और प्रसन्न होकर महागणपति ने स्वयं उन्हें ये सहस्र नाम बताए। ललिता सहस्रनाम की टीका के लिए प्रसिद्ध विद्वान् भास्करराय ने पुराण के इसी पाठ पर ‘खद्योत’ नाम की टीका लिखी।
छपे पाठ और पुराण के उपलब्ध पाठों में बहुत-से शब्दों का अन्तर है, और पुराण में नामों से पहले न्यास और दो अलग ध्यान-श्लोक भी हैं। इस पृष्ठ पर गीता प्रेस का पाठ ही रखा गया है; जहाँ दूसरे स्रोत अलग पढ़ते हैं, वह अन्तर स्रोत-टिप्पणी में दर्ज है।
This is the twenty-second hymn in the Gita Press ‘Sahasranama Stotra Sangrah’. Its colophon says it is drawn from the Ganesha Tantra within the Shakta Pramoda, a compilation of the tantras and hymns of many deities. The author is not known.
The same names, in the same order and under the same speaker line, are found in chapter 46 of the Upasana Khanda of the Ganesha Purana. There Brahma tells a sage how Shiva, setting out to conquer the three cities (Tripura) without first worshipping Ganesha, met with obstacles; he then worshipped Mahaganapati, who was pleased and himself taught him these thousand names. The scholar Bhaskararaya, known for his commentary on the Lalita Sahasranama, wrote a commentary called Khadyota on this Purana text.
The printed text and the available Purana texts differ in many words, and the Purana also places a nyasa and two other dhyana verses before the names. This page keeps the Gita Press text; where the other sources read differently, the difference is recorded in the source note.
नामों का पाठ कैसे करेंHow the names are read
विनियोग और ध्यान के बाद ‘महागणपतिरुवाच’ (महागणपति ने कहा) से नाम आरम्भ होते हैं। पहले श्लोक के गणेश्वर नाम से लेकर 168वें श्लोक की पहली पंक्ति के अनन्तानन्तसौख्यद नाम तक केवल नाम हैं; उसी श्लोक की दूसरी पंक्ति नामों के पूरे होने की घोषणा करती है, और 212वें श्लोक तक फलश्रुति चलती है। 207 से 209 तक के श्लोकों में इक्कीस नामों का एक छोटा अलग समूह है, जिसे 210वाँ श्लोक पूरे सहस्रनाम के बराबर बताता है। नामों वाले श्लोकों का अर्थ इस पृष्ठ पर अलग से नहीं दिया गया है।
श्लोकों में हर नाम प्रथमा विभक्ति में है और सन्धि से अगले नाम से जुड़ा है: ‘गणेश्वरो गणक्रीडो’ में गणेश्वरः और गणक्रीडः, ये दो नाम हैं। पूजा में जब यही नाम एक-एक करके बोले जाते हैं, तो हर नाम को चतुर्थी विभक्ति में बदलकर ॐ और नमः के साथ पढ़ते हैं, जैसे ‘ॐ गणेश्वराय नमः’; ऐसी सूची को नामावली कहते हैं, और हर नाम पर दूर्वा, फूल या अक्षत चढ़ाया जाता है। यहाँ नामावली नहीं, केवल स्तोत्र दिया गया है, जिसे श्लोक-श्लोक करके लगातार पढ़ा जाता है।
कुछ प्रसिद्ध नाम और उनके सरल अर्थ: गणेश्वर (गणों के स्वामी), एकदंष्ट्र (एक दाँत वाले), वक्रतुण्ड (टेढ़ी सूँड़ वाले), लम्बोदर (बड़े पेट वाले) और विघ्नराज (विघ्नों पर शासन करने वाले राजा)।
गजानन (हाथी के मुख वाले), विनायक (जिनसे ऊपर कोई नायक नहीं), मूषकवाहन (मूषक जिनका वाहन है), भालचन्द्र (माथे पर चन्द्रमा धारण करने वाले) और चिन्तामणि (मन की इच्छा पूरी करने वाली मणि के समान)।
After the viniyoga and the dhyana, the names begin with the speaker line ‘Mahaganapatiruvacha’ (Mahaganapati said). From the name Ganeshvara in verse 1 to the name Anantanantasaukhyada in the first line of verse 168 there is nothing but names; the second line of that verse announces that the names are complete, and the phalashruti runs on to verse 212. Verses 207 to 209 hold a separate short set of twenty-one names, which verse 210 says is equal to the whole thousand. The name verses carry no separate meaning on this page.
In the verses each name stands in the nominative and runs into the next by sandhi: ‘ganeshvaro ganakrido’ is the two names Ganeshvarah and Ganakridah. When the same names are offered one by one in worship, each is put in the dative and framed with Om and namah, as in ‘Om Ganeshvaraya namah’; such a list is called a namavali, and a blade of durva, a flower or a few grains of rice are offered with each name. This page gives the hymn only, not a namavali, and it is read straight through, verse by verse.
Some well-known names with plain glosses: Ganeshvara (lord of the ganas), Ekadamshtra (the one-tusked), Vakratunda (of the curved trunk), Lambodara (of the large belly) and Vighnaraja (the king who rules over obstacles).
Gajanana (the elephant-faced), Vinayaka (above whom there is no leader), Mushakavahana (whose mount is the mouse), Bhalachandra (who wears the moon on his brow) and Chintamani (like the wish-fulfilling gem).
पाठ विधिHow to read it
स्नान करके, स्वच्छ स्थान पर गणेश जी की मूर्ति या चित्र के सामने दीपक जलाकर बैठें; दूर्वा, लाल फूल और मोदक या लड्डू अर्पित करना गणेश-पूजा की परम्परा है। पहले विनियोग पढ़ें, फिर ध्यान-श्लोक से गणेश जी का रूप मन में लाएँ, और उसके बाद महागणपतिरुवाच से नाम आरम्भ करें। पूरा पाठ एक बैठक में, बिना जल्दबाज़ी के और शब्दों को साफ़ बोलते हुए करना अच्छा माना जाता है।
फलश्रुति स्वयं पाठ के समय बताती है: प्रतिदिन ब्राह्म मुहूर्त में (169), या सूर्योदय, मध्याह्न और सन्ध्या में से किसी समय या तीनों समय (203)। भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी को, जिसे वह महागणपति का जन्म-दिन कहती है, इन नामों से दूर्वा चढ़ाकर पूजा, तर्पण और आठ द्रव्यों से हवन का विधान बताया गया है (196–197)। एक निश्चित आसन पर संयम से चार महीने तक जप करने की बात भी फलश्रुति में आती है (204)।
समय कम हो तो 207 से 209 तक के इक्कीस नाम मोदक अर्पित करते हुए पढ़े जा सकते हैं; 210वाँ श्लोक कहता है कि इनसे की गई स्तुति सहस्रनाम से की गई स्तुति के समान है। संस्कृत का उच्चारण कठिन लगे तो किसी जानकार से एक बार सुनकर पढ़ना सहायक होता है।
After bathing, sit before an image or picture of Ganesha in a clean place and light a lamp; offering durva grass, red flowers and modakas or laddus is the tradition of Ganesha worship. Read the viniyoga first, call up Ganesha’s form with the dhyana verse, then begin the names at the speaker line. It is considered good to read the whole hymn in one sitting, unhurried and with clear pronunciation.
The phalashruti itself names the times: daily at brahma muhurta, before sunrise (169), or at sunrise, midday or evening, or at all three (203). For the fourth day of the bright half of Bhadrapada, which it calls Mahaganapati’s birthday, it prescribes worship with durva offered with these names, tarpana and a fire offering of the eight substances (196–197). It also speaks of reciting it for four months with self-restraint, seated in a fixed posture (204).
When time is short, the twenty-one names of verses 207 to 209 can be read while offering modakas; verse 210 says praise with these equals praise with the thousand names. If the Sanskrit feels hard to pronounce, it helps to hear it once from someone who knows it before reading.
महत्व और फलMeaning and fruit
फलश्रुति (168 से 212) बहुत-से फल गिनाती है: आयु, आरोग्य, ऐश्वर्य, विद्या, वाणी की कुशलता, यश, घर में लक्ष्मी का वास, सन्तान का सुख, शत्रुता और कलह की शान्ति और बुरे स्वप्नों का शमन। ये परम्परा के वचन हैं; 181 से 185 तक रोगों की जो लम्बी सूची है, वहाँ भी यह पाठ उपचार के साथ मन को सहारा देने का साधन है, इलाज की जगह नहीं।
फलश्रुति दो मार्ग बताती है। कामना लेकर पढ़ने वाले के लिए वह इस लोक और परलोक के सुख की बात करती है, और बिना कामना के, केवल भक्ति से पढ़ने वाले के लिए योग-सिद्धि, ज्ञान, वैराग्य और अन्त में विनायक के उस धाम की, जहाँ से लौटना नहीं होता। 185वाँ श्लोक यह भी कहता है कि यह पाठ सबके लिए खुला है। गणेश आरम्भ के देवता हैं, इसलिए उनके नामों का पाठ हर काम को शान्त और साफ़ मन से शुरू करने का अभ्यास भी है।
The phalashruti (168 to 212) lists many fruits: long life, health, prosperity, learning, skill in speech, fame, Lakshmi’s presence in the home, the joy of children, the calming of enmity and quarrels and the quieting of bad dreams. These are the words of tradition; even for the long list of illnesses in verses 181 to 185, the reading is a support for the mind alongside treatment, not a replacement for it.
The phalashruti describes two paths. For one who reads with a wish, it speaks of happiness in this world and the next; for one who reads without any wish, out of devotion alone, it speaks of the perfection of yoga, knowledge, detachment and finally Vinayaka’s abode, from which there is no return. Verse 185 also says the reading is open to everyone. Ganesha is the god of beginnings, so reading his names is also a practice of starting every task with a calm, clear mind.
कब पढ़ेंWhen to read
प्रतिदिन प्रातः, विशेषकर ब्राह्म मुहूर्त में, जैसा फलश्रुति कहती है; बुधवार को, हर मास की संकष्टी और विनायक चतुर्थी को, और गणेश चतुर्थी (भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी) पर विशेष रूप से। किसी नए काम, पढ़ाई या व्यापार के आरम्भ से पहले और बुध या केतु की दशा में भी इसका पाठ किया जाता है।Daily in the morning, especially at brahma muhurta as the phalashruti says; on Wednesdays, on the Sankashti and Vinayaka Chaturthi of every month, and above all on Ganesh Chaturthi (the fourth day of the bright half of Bhadrapada). It is also read before starting new work, studies or a business, and during a period of Mercury or Ketu.
कुंडली मेंIn your kundli
ज्योतिष में गणेश जी को बुध और केतु दोनों से जोड़ा जाता है: बुध बुद्धि, वाणी, गणित, लेखन और व्यापार का कारक है, और केतु के उपाय के रूप में गणेश-पूजा की परम्परा पुरानी है। कुंडली में बुध के नीच (मीन) होने, अस्त होने या राहु-केतु, शनि अथवा मंगल से पीड़ित होने पर, बुध या केतु की महादशा-अन्तर्दशा में, और केतु के लग्न में, पंचम भाव में या चन्द्रमा के साथ होने पर यह सहस्रनाम परम्परागत उपाय के रूप में पढ़ा जाता है। पढ़ाई में अड़चन, बोलने-लिखने में झिझक या काम बार-बार अटकने के समय भी लोग इसे पढ़ते हैं। यह पाठ मन को स्थिर करने का साधन है, परिश्रम और व्यावहारिक सावधानी की जगह नहीं लेता। अपनी कुंडली में बुध और केतु की स्थिति और चल रही दशा इसी साइट पर कुंडली बनाकर देखी जा सकती है।In Jyotish Ganesha is linked with both Mercury and Ketu: Mercury signifies intellect, speech, arithmetic, writing and trade, and worship of Ganesha is an old remedy for Ketu. This sahasranama is traditionally read when Mercury is debilitated (in Pisces), combust or afflicted by Rahu, Ketu, Saturn or Mars, during a mahadasha or antardasha of Mercury or Ketu, and when Ketu sits in the lagna, in the fifth house or with the Moon. People also read it when studies stall, when speaking or writing comes hard, or when work keeps getting stuck. It is a way to steady the mind, not a substitute for effort and ordinary care. You can see where Mercury and Ketu stand and which dasha is running by building your kundli on this site.
ग्रह: Grahas: बुधMercury, केतुKetu
अपनी कुंडली में देखेंCheck it in your kundliप्रश्नोत्तरQuestions people ask
- गणेश सहस्रनाम का पाठ कब करना चाहिए?When should the Ganesh Sahasranama be read?
- फलश्रुति प्रतिदिन ब्राह्म मुहूर्त में पढ़ने की बात करती है, और सूर्योदय, मध्याह्न या सन्ध्या को भी। परम्परा में बुधवार, हर मास की चतुर्थी और गणेश चतुर्थी इसके लिए विशेष माने जाते हैं, और किसी नए काम के आरम्भ से पहले भी इसे पढ़ा जाता है।The phalashruti speaks of reading it daily at brahma muhurta, and also at sunrise, midday or evening. Tradition holds Wednesdays, the Chaturthi of every month and Ganesh Chaturthi as special for it, and it is also read before beginning any new work.
- इसका पाठ कितनी बार करें?How many times should it be read?
- एक बैठक में एक पूरा पाठ पर्याप्त माना जाता है; फलश्रुति कहती है कि एक बार के जप से भी फल मिलता है (173, 185)। संकल्प लेकर पढ़ने वाले इसे लगातार चार महीने तक प्रतिदिन पढ़ते हैं, जैसा 204वाँ श्लोक कहता है। समय कम हो तो 207 से 209 तक के इक्कीस नाम पढ़े जा सकते हैं।One complete reading in a sitting is considered enough; the phalashruti says even a single recitation bears fruit (173, 185). Those who take a vow read it daily for four months, as verse 204 says. When time is short, the twenty-one names of verses 207 to 209 can be read.
- गणेश सहस्रनाम के क्या लाभ बताए गए हैं?What benefits are described for the Ganesh Sahasranama?
- फलश्रुति के अनुसार इसके पाठ से विघ्न दूर होते हैं, बुद्धि, वाणी, यश और समृद्धि बढ़ती है, घर में लक्ष्मी का वास रहता है और कलह तथा बुरे स्वप्न शान्त होते हैं; बिना कामना के पढ़ने वाले के लिए वह ज्ञान, वैराग्य और मोक्ष की बात करती है। ये परम्परा के वचन हैं; रोग में यह पाठ उपचार के साथ मन का सहारा है।According to the phalashruti, reading it removes obstacles, increases intelligence, eloquence, fame and prosperity, keeps Lakshmi in the home and calms quarrels and bad dreams; for one who reads without a wish, it speaks of knowledge, detachment and liberation. These are the words of tradition; in illness the reading is a support for the mind alongside treatment.
- पाठ के नियम क्या हैं?Are there rules for reading it?
- स्नान करके, स्वच्छ स्थान पर, गणेश जी के सामने दीपक जलाकर, शान्त मन से पढ़ना अच्छा माना जाता है। पहले विनियोग और ध्यान, फिर नाम और फलश्रुति पढ़ें, और उच्चारण साफ़ रखें। दूर्वा और मोदक अर्पित करना परम्परा है। फलश्रुति (185) कहती है कि यह पाठ सबके लिए खुला है, इसलिए कोई भी श्रद्धा से इसे पढ़ सकता है।It is considered good to read it after bathing, in a clean place, with a lamp lit before Ganesha and a calm mind. Read the viniyoga and dhyana first, then the names and the phalashruti, and keep the pronunciation clear. Offering durva and modakas is the tradition. The phalashruti (185) says the reading is open to all, so anyone may read it with faith.
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Ganesh Chalisa
गणपति के जन्म और महिमा की चालीस चौपाइयाँ, अर्थ सहितForty verses on the birth and glory of Ganapati, with the meaning of every line
संकटनाशन गणेश स्तोत्र
Sankat Nashan Ganesh Stotra
नारदपुराण का 'प्रणम्य शिरसा देवं', गणेश जी के बारह नाम और फलश्रुति, अर्थ सहितPranamya Shirasa Devam from the Narada Purana: Ganesha's twelve names and the phalashruti, with the meaning of every verse
जय गणेश देवा
Jai Ganesh Deva
श्री गणेश जी की आरती, अर्थ सहितThe Ganesh aarti sung before every puja, with the meaning of every stanza
बुधवार व्रत कथा
Budhvar Vrat Katha
गणेश जी और बुध देव का बुधवार व्रत — बुधवार को पत्नी को विदा कराने वाले पुरुष की कथा, व्रत विधि और उद्यापनThe Wednesday fast for Ganesha and Budh: the man who brought his wife home on a Wednesday, how to keep the fast, and the udyapan
श्रीविष्णुसहस्रनामस्तोत्रम्
Shri Vishnu Sahasranama Stotram
'विश्वं विष्णुर्वषट्कारो': महाभारत के अनुशासन पर्व से भगवान् विष्णु के सहस्र नाम, संवाद और फलश्रुति के अर्थ सहितVishvam Vishnur Vashatkaro: the thousand names of Vishnu from the Anushasana Parva of the Mahabharata, with the meaning of the dialogue and the phalashruti
श्रीललितासहस्रनामस्तोत्रम्
Shri Lalita Sahasranama Stotram
ब्रह्माण्ड पुराण का हयग्रीव-अगस्त्य संवाद: पूर्वभाग, न्यास, ध्यान, 183 नाम-श्लोक और फलश्रुति, पूर्वभाग और फलश्रुति के अर्थ सहितHayagriva's teaching to Agastya in the Brahmanda Purana: the opening chapter, nyasa, dhyana, 183 name shlokas and the phalashruti, with the framing verses explained