श्रीशिवसहस्रनामस्तोत्रम्

Shri Shiva Sahasranama Stotram

महाभारत के अनुशासन पर्व का शिवसहस्रनाम, जिसे उपमन्यु ने श्रीकृष्ण को सुनाया (तण्डिकृत स्तवराज): 182 श्लोक, आरम्भ और फलश्रुति के अर्थ सहितThe Shiva Sahasranama of the Mahabharata's Anushasana Parva, taught by Upamanyu to Krishna (Tandi's Stavaraja): 182 shlokas, with the meaning of the opening and the phalashruti

श्रीशिवसहस्रनामस्तोत्रम् · Shri Shiva Sahasranama Stotram

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श्रीशिवसहस्रनामस्तोत्रम् भगवान शिव के एक हज़ार आठ नामों का स्तोत्र है। यह महाभारत के अनुशासन पर्व में आता है: श्रीकृष्ण युधिष्ठिर को बताते हैं कि ऋषि उपमन्यु ने उन्हें ये नाम कैसे सुनाए थे। स्तोत्र स्वयं कहता है कि ब्रह्मा के कहे दस हज़ार नामों का सार निकालकर यह बना; यह ब्रह्मलोक से स्वर्ग में उतारा गया और ऋषि तण्डि इसे स्वर्ग से पृथ्वी पर लाए, इसलिए इसे ‘तण्डिकृत स्तवराज’ भी कहते हैं। नाम ‘स्थिरः स्थाणुः प्रभुर्भीमः’ से आरम्भ होते हैं।

शिव-भक्त इसे सोमवार, प्रदोष, महाशिवरात्रि और सावन में, और शिव-पूजा या रुद्राभिषेक के साथ पढ़ते हैं; परम्परा में इसे मन की शान्ति, भक्ति और कठिन समय में धैर्य के लिए पढ़ा जाता है। इस पृष्ठ पर गीता प्रेस की छपाई से लिया गया पूरा मूल पाठ है, आरम्भ के संवाद और फलश्रुति के हर श्लोक का सरल हिन्दी और अंग्रेज़ी अर्थ है, नामों को पढ़ने का तरीका और कुछ प्रसिद्ध नामों के अर्थ हैं, और साइन-इन के बाद इसका मुफ़्त PDF डाउनलोड किया जा सकता है।

The Shri Shiva Sahasranama Stotram is a hymn of the thousand and eight names of Lord Shiva. It comes in the Anushasana Parva of the Mahabharata, where Krishna tells Yudhishthira how the sage Upamanyu taught him these names. The hymn itself says it was drawn as the essence of ten thousand names spoken by Brahma, that it was brought down from Brahmaloka to svarga, and that the sage Tandi brought it from svarga to the earth, so it is also called Tandi's Stavaraja (king of hymns). The names begin ‘sthirah sthanuh prabhur bhimah’.

Devotees of Shiva read it on Mondays, on Pradosh, on Mahashivratri and through Sawan, and with Shiva puja or a rudrabhishek; by tradition it is read for a calm mind, for devotion and for patience in hard times. This page gives the full text from the Gita Press print, a plain Hindi and English meaning of every shloka of the opening dialogue and the phalashruti, a note on how the names are read with the sense of some well-known names, and a free PDF to download after signing in.

पाठThe text

  1. श्लोकShloka 1

    वासुदेव उवाच ततः स प्रयतो भूत्वा मम तात युधिष्ठिर। प्राञ्जलिः प्राह विप्रर्षिर्नामसंग्रहमादितः॥

    वासुदेव (श्रीकृष्ण) ने कहा: हे तात युधिष्ठिर, तब उन विप्रर्षि (ब्राह्मण ऋषि उपमन्यु) ने मन को संयत किया और हाथ जोड़कर मुझे आरम्भ से नामों का संग्रह सुनाया।Vasudeva (Krishna) said: Then, dear Yudhishthira, that brahmin sage (Upamanyu) composed himself and, with palms joined, recited to me the collection of names from the beginning.

  2. श्लोकShloka 2

    उपमन्युरुवाच ब्रह्मप्रोक्तैर्ऋषिप्रोक्तैर्वेदवेदाङ्गसम्भवैः। सर्वलोकेषु विख्यातं स्तुत्यं स्तोष्यामि नामभिः॥

    उपमन्यु ने कहा: ब्रह्मा और ऋषियों के कहे हुए, वेद और वेदांगों से निकले नामों से मैं उन स्तुति-योग्य देव की स्तुति करूँगा, जो सब लोकों में प्रसिद्ध हैं।Upamanyu said: With names spoken by Brahma and by the rishis, born of the Vedas and the Vedangas, I shall praise the one who is worthy of praise and renowned in all the worlds.

  3. श्लोकShloka 3

    महद्भिर्विहितैः सत्यैः सिद्धैः सर्वार्थसाधकैः। ऋषिणा तण्डिना भक्त्या कृतैर्वेदकृतात्मना॥

    ये नाम महान, शास्त्र-विहित, सत्य, सिद्ध और सब प्रयोजन पूरे करने वाले हैं; इन्हें वेद से गढ़े हुए अन्तःकरण वाले ऋषि तण्डि ने भक्ति से रचा है।These names are great, ordained, true and proven, and they accomplish every aim; the rishi Tandi, whose inner self was shaped by the Veda, composed them with devotion.

  4. श्लोकShloka 4

    यथोक्तैः साधुभिः ख्यातैर्मुनिभिस्तत्त्वदर्शिभिः। प्रवरं प्रथमं स्वर्ग्यं सर्वभूतहितं शुभम्॥

    ये नाम जैसे कहे गए वैसे ही सज्जनों और तत्त्वदर्शी मुनियों द्वारा प्रसिद्ध किए गए हैं। यह स्तोत्र श्रेष्ठ, प्रथम, स्वर्ग देने वाला, सब प्राणियों का हित करने वाला और शुभ है।These names, handed on just as they were spoken, were made known by good men and by sages who see the truth. This hymn is the best and the first, it leads to heaven, it does good to all beings and it is auspicious.

  5. श्लोकShloka 5

    श्रुतैः सर्वत्र जगति ब्रह्मलोकावतारितैः। सत्यैस्तत् परमं ब्रह्म ब्रह्मप्रोक्तं सनातनम्॥

    ये सत्य नाम संसार में सब जगह सुने जाते हैं और ब्रह्मलोक से उतारे गए हैं; यह वही परम, सनातन ब्रह्म है जिसे ब्रह्मा ने कहा।These true names are heard everywhere in the world and were brought down from Brahmaloka; this is that supreme and eternal Brahman spoken by Brahma.

  6. श्लोकShloka 6

    वक्ष्ये यदुकुलश्रेष्ठ शृणुष्वावहितो मम। वरयैनं भवं देवं भक्तस्त्वं परमेश्वरम्॥

    हे यदुकुल में श्रेष्ठ (श्रीकृष्ण), मैं इसे कहूँगा, तुम ध्यान से सुनो। तुम भक्त हो, इन परमेश्वर भव (शिव) देव को ही वरण करो।Best of the Yadu clan (Krishna), I shall tell it; listen to me with attention. You are a devotee: choose this god Bhava (Shiva), the supreme Lord.

  7. श्लोकShloka 7

    तेन ते श्रावयिष्यामि यत् तद् ब्रह्म सनातनम्। न शक्यं विस्तरात् कृत्स्नं वक्तुं सर्वस्य केनचित्॥

    इसी कारण मैं तुम्हें वह सनातन ब्रह्म सुनाऊँगा। उनकी विभूतियों (महिमाओं) का सम्पूर्ण विस्तार कोई भी पूरा नहीं कह सकता,For that reason I shall let you hear that eternal Brahman. No one at all can tell the whole of his glories (vibhutis) in full detail,

  8. श्लोकShloka 8

    युक्तेनापि विभूतीनामपि वर्षशतैरपि। यस्यादिर्मध्यमन्तं च सुरैरपि न गम्यते॥

    चाहे वह योग से युक्त हो और सैकड़ों वर्ष लगा दे; जिनके आदि, मध्य और अन्त तक देवता भी नहीं पहुँच पाते।not even one steadfast in yoga, not even in hundreds of years: his beginning, middle and end are beyond the reach even of the gods.

  9. श्लोकShloka 9

    कस्तस्य शक्नुयाद् वक्तुं गुणान् कार्त्स्न्येन माधव। किं तु देवस्य महतः संक्षिप्तार्थपदाक्षरम्॥

    हे माधव (श्रीकृष्ण), उनके गुणों को पूरा-पूरा कौन कह सकता है? फिर भी उन महान देव के चरित को संक्षिप्त अर्थ, पद और अक्षरों में,Who could tell his qualities completely, Madhava (Krishna)? Yet the deeds of that great god, in brief meaning, words and syllables,

  10. श्लोकShloka 10

    शक्तितश्चरितं वक्ष्ये प्रसादात् तस्य धीमतः। अप्राप्य तु ततोऽनुज्ञां न शक्यः स्तोतुमीश्वरः॥

    उन बुद्धिमान प्रभु की कृपा से मैं अपनी शक्ति भर कहूँगा। उनकी अनुमति पाए बिना ईश्वर की स्तुति नहीं की जा सकती।I shall tell as far as I am able, by the grace of that wise Lord. Without first receiving his permission, the Lord cannot be praised.

  11. श्लोकShloka 11

    यदा तेनाभ्यनुज्ञातः स्तुतो वै स तदा मया। अनादिनिधनस्याहं जगद्योनेर्महात्मनः॥

    जब उन्होंने मुझे अनुमति दी, तभी मैंने उनकी स्तुति की। जो आदि और अन्त से रहित हैं, जगत के उद्गम और महात्मा हैं,Only when he had given me leave did I praise him. Of him who has neither beginning nor end, the source of the world, the great soul,

  12. श्लोकShloka 12

    नाम्नां कञ्चित् समुद्देशं वक्ष्याम्यव्यक्तयोनिनः। वरदस्य वरेण्यस्य विश्वरूपस्य धीमतः॥

    जिनका उद्गम अव्यक्त है, जो वर देने वाले, वरण करने योग्य, विश्वरूप (सारे विश्व के रूप वाले) और बुद्धिमान हैं, उनके नामों का कुछ संक्षेप मैं कहूँगा।whose source is unmanifest, who grants boons, who is worthy to be chosen, whose form is the universe and who is wise, I shall give a short account of the names.

  13. श्लोकShloka 13

    शृणु नाम्नां चयं कृष्ण यदुक्तं पद्मयोनिना। दशनामसहस्राणि यान्याह प्रपितामहः॥

    हे कृष्ण, पद्मयोनि (कमल से जन्मे ब्रह्मा) द्वारा कहा गया नामों का संग्रह सुनो; प्रपितामह (ब्रह्मा) ने जो दस हज़ार नाम कहे थे,Hear, Krishna, the collection of names spoken by the lotus-born (Brahma): the ten thousand names that the great-grandsire (Brahma) told,

  14. श्लोकShloka 14

    तानि निर्मथ्य मनसा दध्नो घृतमिवोद्धृतम्। गिरेः सारं यथा हेम पुष्पसारं यथा मधु॥

    उन्हें मन से मथकर यह वैसे ही निकाला गया है जैसे दही से घी; जैसे पर्वत का सार सोना है और फूलों का सार मधु,churned in the mind, and this was drawn out of them as ghee is drawn from curd; as gold is the essence of a mountain and honey the essence of flowers,

  15. श्लोकShloka 15

    घृतात् सारं यथा मण्डस्तथैतत् सारमुद्धृतम्। सर्वपापापहमिदं चतुर्वेदसमन्वितम्॥

    और जैसे घी का सार मण्ड (उसका ऊपरी स्वच्छ भाग) है, वैसे ही यह सार निकाला गया है। यह सब पापों को हरने वाला है और चारों वेदों से युक्त है।and as the clear top layer is the essence of ghee, so this essence has been drawn out. It takes away all sins and holds the four Vedas within it.

  16. श्लोकShloka 16

    प्रयत्नेनाधिगन्तव्यं धार्यं च प्रयतात्मना। माङ्गल्यं पौष्टिकं चैव रक्षोघ्नं पावनं महत्॥

    इसे प्रयत्न से सीखना चाहिए और संयत मन से धारण करना चाहिए। यह मंगल देने वाला, पुष्टि देने वाला, राक्षसों का नाश करने वाला, पवित्र करने वाला और महान है।It should be learnt with effort and held with a disciplined mind. It is auspicious, nourishing, a destroyer of rakshasas, purifying and great.

  17. श्लोकShloka 17

    इदं भक्ताय दातव्यं श्रद्दधानास्तिकाय च। नाश्रद्दधानरूपाय नास्तिकायाजितात्मने॥

    यह भक्त को, और श्रद्धा रखने वाले आस्तिक को देना चाहिए; श्रद्धाहीन, नास्तिक और मन पर वश न रखने वाले को नहीं।It should be given to a devotee and to a believer who has faith; not to one without faith, to an unbeliever, or to one without self-mastery.

  18. श्लोकShloka 18

    यश्चाभ्यसूयते देवं कारणात्मानमीश्वरम्। स कृष्ण नरकं याति सह पूर्वैः सहात्मजैः॥

    श्लोक कहता है: हे कृष्ण, जो सबके कारण-रूप ईश्वर देव से द्वेष करता है, वह अपने पूर्वजों और सन्तानों सहित नरक को जाता है।The shloka says: Krishna, whoever maligns the god, the Lord whose very self is the cause of all, goes to hell along with their forebears and their children.

  19. श्लोकShloka 19

    इदं ध्यानमिदं योगमिदं ध्येयमनुत्तमम्। इदं जप्यमिदं ज्ञानं रहस्यमिदमुत्तमम्॥

    यही ध्यान है, यही योग है, यही सर्वश्रेष्ठ ध्येय है; यही जपने योग्य है, यही ज्ञान है और यही उत्तम रहस्य है।This is meditation, this is yoga, this is the highest object of meditation; this is what is to be repeated in japa, this is knowledge, this is the highest secret.

  20. श्लोकShloka 20

    यं ज्ञात्वा अन्तकालेऽपि गच्छेत परमां गतिम्। पवित्रं मङ्गलं मेध्यं कल्याणमिदमुत्तमम्॥

    इसे जानकर मनुष्य अन्त समय में भी परम गति पाता है। यह पवित्र, मंगलमय, शुद्ध और सबसे उत्तम कल्याणकारी है।Knowing it, a person reaches the highest state even at the hour of death. It is pure, auspicious, holy and the best of all blessings.

  21. श्लोकShloka 21

    इदं ब्रह्मा पुरा कृत्वा सर्वलोकपितामहः। सर्वस्तवानां राजत्वे दिव्यानां समकल्पयत्॥

    सब लोकों के पितामह ब्रह्मा ने पूर्वकाल में इसे रचकर सब दिव्य स्तोत्रों के राजा के पद पर स्थापित किया।Long ago Brahma, the grandsire of all the worlds, composed it and set it in the place of king over all divine hymns.

  22. श्लोकShloka 22

    तदाप्रभृति चैवायमीश्वरस्य महात्मनः। स्तवराज इति ख्यातो जगत्यमरपूजितः॥

    तब से महात्मा ईश्वर (शिव) का यह स्तोत्र ‘स्तवराज’ (स्तोत्रों का राजा) नाम से प्रसिद्ध है और संसार में देवताओं द्वारा पूजित है।From that time this hymn of the great Lord (Shiva) has been known as the Stavaraja (king of hymns), and the immortals honour it in the world.

  23. श्लोकShloka 23

    ब्रह्मलोकादयं स्वर्गे स्तवराजोऽवतारितः। यतस्तण्डिः पुरा प्राप तेन तण्डिकृतोऽभवत्॥

    यह स्तवराज ब्रह्मलोक से स्वर्ग में उतारा गया। पूर्वकाल में तण्डि ने इसे पाया, इसलिए यह ‘तण्डिकृत’ (तण्डि का रचा) कहलाया।This Stavaraja was brought down from Brahmaloka to svarga. Because Tandi obtained it long ago, it came to be called Tandikrita (made by Tandi).

  24. श्लोकShloka 24

    स्वर्गाच्चैवात्र भूर्लोकं तण्डिना ह्यवतारितः। सर्वमङ्गलमाङ्गल्यं सर्वपापप्रणाशनम्॥

    और तण्डि ही इसे स्वर्ग से यहाँ पृथ्वीलोक पर लाए। यह सब मंगलों में मंगल और सब पापों का नाश करने वाला है।And it was Tandi who brought it down from svarga to this earth. It is the most auspicious of all auspicious things and destroys all sins.

  25. श्लोकShloka 25

    निगदिष्ये महाबाहो स्तवानामुत्तमं स्तवम्। ब्रह्मणामपि यद् ब्रह्म पराणामपि यत् परम्॥

    हे महाबाहो (बलवान भुजाओं वाले कृष्ण), मैं स्तोत्रों में उत्तम यह स्तोत्र कहूँगा; उन (शिव) का, जो ब्रह्मों के भी ब्रह्म और परों के भी पर (श्रेष्ठों में श्रेष्ठ) हैं,Mighty-armed one (Krishna), I shall tell this best of hymns, the hymn of him (Shiva) who is the Brahman even of Brahmans and the highest even of the high,

  26. श्लोकShloka 26

    तेजसामपि यत् तेजस्तपसामपि यत् तपः। शान्तानामपि यः शान्तो द्युतीनामपि या द्युतिः॥

    जो तेजों के भी तेज, तपों के भी तप, शान्त जनों में भी शान्त और प्रकाशों के भी प्रकाश हैं,the radiance even of radiant things, the tapas even of tapas, the calmest even of the calm, and the light even of lights,

  27. श्लोकShloka 27

    दान्तानामपि यो दान्तो धीमतामपि या च धीः। देवानामपि यो देव ऋषीणामपि यस्त्वृषिः॥

    जो संयमियों में भी संयमी, बुद्धिमानों की भी बुद्धि, देवताओं के भी देव और ऋषियों के भी ऋषि हैं,the most restrained even of the restrained, the intellect even of the wise, the god even of the gods and the rishi even of the rishis,

  28. श्लोकShloka 28

    यज्ञानामपि यो यज्ञः शिवानामपि यः शिवः। रुद्राणामपि यो रुद्रः प्रभा प्रभवतामपि॥

    जो यज्ञों के भी यज्ञ, कल्याणकारी वस्तुओं में भी शिव (कल्याणरूप), रुद्रों के भी रुद्र और प्रभावशालियों की भी प्रभा हैं,the sacrifice even of sacrifices, the auspicious one even among auspicious things, the Rudra even of the Rudras and the splendour even of the mighty,

  29. श्लोकShloka 29

    योगिनामपि यो योगी कारणानां च कारणम्। यतो लोकाः सम्भवन्ति न भवन्ति यतः पुनः॥

    जो योगियों में भी योगी और कारणों के भी कारण हैं; जिनसे लोक उत्पन्न होते हैं और फिर जिनमें लीन होकर नहीं रहते।the yogi even of yogis and the cause even of causes; from him the worlds come into being, and into him they pass away again.

  30. श्लोकShloka 30

    सर्वभूतात्मभूतस्य हरस्यामिततेजसः। अष्टोत्तरसहस्रं तु नाम्नां शर्वस्य मे शृणु। यच्छ्रुत्वा मनुजव्याघ्र सर्वान् कामानवाप्स्यसि॥

    जो सब प्राणियों के आत्मा बन गए हैं, उन अपार तेज वाले हर, शर्व (शिव) के एक हज़ार आठ नाम मुझसे सुनो। श्लोक कहता है कि हे मनुजव्याघ्र (मनुष्यों में बाघ के समान श्रेष्ठ), इन्हें सुनकर तुम सब मनोरथ पाओगे।Hear from me the thousand and eight names of Sharva, Hara (Shiva) of boundless radiance, who has become the self of all beings. The shloka says that, hearing them, you, tiger among men, will gain all your wishes.

  31. श्लोकShloka 31

    स्थिरः स्थाणुः प्रभुर्भीमः प्रवरो वरदो वरः। सर्वात्मा सर्वविख्यातः सर्वः सर्वकरो भवः॥

  32. श्लोकShloka 32

    जटी चर्मी शिखण्डी च सर्वाङ्गः सर्वभावनः। हरश्च हरिणाक्षश्च सर्वभूतहरः प्रभुः॥

  33. श्लोकShloka 33

    प्रवृत्तिश्च निवृत्तिश्च नियतः शाश्वतो ध्रुवः। श्मशानवासी भगवान् खचरो गोचरोऽर्दनः॥

  34. श्लोकShloka 34

    अभिवाद्यो महाकर्मा तपस्वी भूतभावनः। उन्मत्तवेषप्रच्छन्नः सर्वलोकप्रजापतिः॥

  35. श्लोकShloka 35

    महारूपो महाकायो वृषरूपो महायशाः। महात्मा सर्वभूतात्मा विश्वरूपो महाहनुः॥

  36. श्लोकShloka 36

    लोकपालोऽन्तर्हितात्मा प्रसादो हयगर्दभिः। पवित्रं च महांश्चैव नियमो नियमाश्रितः॥

  37. श्लोकShloka 37

    सर्वकर्मा स्वयम्भूत आदिरादिकरो निधिः। सहस्राक्षो विशालाक्षः सोमो नक्षत्रसाधकः॥

  38. श्लोकShloka 38

    चन्द्रः सूर्यः शनिः केतुर्ग्रहो ग्रहपतिर्वरः। अत्रिरत्र्या नमस्कर्ता मृगबाणार्पणोऽनघः॥

  39. श्लोकShloka 39

    महातपा घोरतपा अदीनो दीनसाधकः। संवत्सरकरो मन्त्रः प्रमाणं परमं तपः॥

  40. श्लोकShloka 40

    योगी योज्यो महाबीजो महारेता महाबलः। सुवर्णरेताः सर्वज्ञः सुबीजो बीजवाहनः॥

  41. श्लोकShloka 41

    दशबाहुस्त्वनिमिषो नीलकण्ठ उमापतिः। विश्वरूपः स्वयं श्रेष्ठो बलवीरोऽबलो गणः॥

  42. श्लोकShloka 42

    गणकर्ता गणपतिर्दिग्वासाः काम एव च। मन्त्रवित् परमो मन्त्रः सर्वभावकरो हरः॥

  43. श्लोकShloka 43

    कमण्डलुधरो धन्वी बाणहस्तः कपालवान्। अशनी शतघ्नी खड्गी पट्टिशी चायुधी महान्॥

  44. श्लोकShloka 44

    स्रुवहस्तः सुरूपश्च तेजस्तेजस्करो निधिः। उष्णीषी च सुवक्त्रश्च उदग्रो विनतस्तथा॥

  45. श्लोकShloka 45

    दीर्घश्च हरिकेशश्च सुतीर्थः कृष्ण एव च। शृगालरूपः सिद्धार्थो मुण्डः सर्वशुभङ्करः॥

  46. श्लोकShloka 46

    अजश्च बहुरूपश्च गन्धधारी कपर्द्यपि। ऊर्ध्वरेता ऊर्ध्वलिङ्ग ऊर्ध्वशायी नभःस्थलः॥

  47. श्लोकShloka 47

    त्रिजटी चीरवासाश्च रुद्रः सेनापतिर्विभुः। अहश्चरो नक्तंचरस्तिग्ममन्युः सुवर्चसः॥

  48. श्लोकShloka 48

    गजहा दैत्यहा कालो लोकधाता गुणाकरः। सिंहशार्दूलरूपश्च आर्द्रचर्माम्बरावृतः॥

  49. श्लोकShloka 49

    कालयोगी महानादः सर्वकामश्चतुष्पथः। निशाचरः प्रेतचारी भूतचारी महेश्वरः॥

  50. श्लोकShloka 50

    बहुभूतो बहुधरः स्वर्भानुरमितो गतिः। नृत्यप्रियो नित्यनर्तो नर्तकः सर्वलालसः॥

  51. श्लोकShloka 51

    घोरो महातपाः पाशो नित्यो गिरिरुहो नभः। सहस्रहस्तो विजयो व्यवसायो ह्यतन्द्रितः॥

  52. श्लोकShloka 52

    अधर्षणो धर्षणात्मा यज्ञहा कामनाशकः। दक्षयागापहारी च सुसहो मध्यमस्तथा॥

  53. श्लोकShloka 53

    तेजोऽपहारी बलहा मुदितोऽर्थोऽजितोऽवरः। गम्भीरघोषो गम्भीरो गम्भीरबलवाहनः॥

  54. श्लोकShloka 54

    न्यग्रोधरूपो न्यग्रोधो वृक्षकर्णस्थितिर्विभुः। सुतीक्ष्णदशनश्चैव महाकायो महाननः॥

  55. श्लोकShloka 55

    विष्वक्सेनो हरिर्यज्ञः संयुगापीडवाहनः। तीक्ष्णतापश्च हर्यश्वः सहायः कर्मकालवित्॥

  56. श्लोकShloka 56

    विष्णुप्रसादितो यज्ञः समुद्रो वडवामुखः। हुताशनसहायश्च प्रशान्तात्मा हुताशनः॥

  57. श्लोकShloka 57

    उग्रतेजा महातेजा जन्यो विजयकालवित्। ज्योतिषामयनं सिद्धिः सर्वविग्रह एव च॥

  58. श्लोकShloka 58

    शिखी मुण्डी जटी ज्वाली मूर्तिजो मूर्द्धगो बली। वेणवी पणवी ताली खली कालकटंकटः॥

  59. श्लोकShloka 59

    नक्षत्रविग्रहमतिर्गुणबुद्धिर्लयोऽगमः। प्रजापतिर्विश्वबाहुर्विभागः सर्वगोऽमुखः॥

  60. श्लोकShloka 60

    विमोचनः सुसरणो हिरण्यकवचोद्भवः। मेढ्रजो बलचारी च महीचारी स्रुतस्तथा॥

  61. श्लोकShloka 61

    सर्वतूर्यनिनादी च सर्वातोद्यपरिग्रहः। व्यालरूपो गुहावासी गुहो माली तरङ्गवित्॥

  62. श्लोकShloka 62

    त्रिदशस्त्रिकालधृक् कर्म सर्वबन्धविमोचनः। बन्धनस्त्वसुरेन्द्राणां युधिशत्रुविनाशनः॥

  63. श्लोकShloka 63

    सांख्यप्रसादो दुर्वासाः सर्वसाधुनिषेवितः। प्रस्कन्दनो विभागज्ञोऽतुल्यो यज्ञविभागवित्॥

  64. श्लोकShloka 64

    सर्ववासः सर्वचारी दुर्वासा वासवोऽमरः। हैमो हेमकरोऽयज्ञः सर्वधारी धरोत्तमः॥

  65. श्लोकShloka 65

    लोहिताक्षो महाक्षश्च विजयाक्षो विशारदः। संग्रहो निग्रहः कर्ता सर्पचीरनिवासनः॥

  66. श्लोकShloka 66

    मुख्योऽमुख्यश्च देहश्च काहलिः सर्वकामदः। सर्वकालप्रसादश्च सुबलो बलरूपधृक्॥

  67. श्लोकShloka 67

    सर्वकामवरश्चैव सर्वदः सर्वतोमुखः। आकाशनिर्विरूपश्च निपाती ह्यवशः खगः॥

  68. श्लोकShloka 68

    रौद्ररूपोंऽशुरादित्यो बहुरश्मिः सुवर्चसी। वसुवेगो महावेगो मनोवेगो निशाचरः॥

  69. श्लोकShloka 69

    सर्ववासी श्रियावासी उपदेशकरोऽकरः। मुनिरात्मनिरालोकः सम्भग्नश्च सहस्रदः॥

  70. श्लोकShloka 70

    पक्षी च पक्षरूपश्च अतिदीप्तो विशाम्पतिः। उन्मादो मदनः कामो ह्यश्वत्थोऽर्थकरो यशः॥

  71. श्लोकShloka 71

    वामदेवश्च वामश्च प्राग् दक्षिणश्च वामनः। सिद्धयोगी महर्षिश्च सिद्धार्थः सिद्धसाधकः॥

  72. श्लोकShloka 72

    भिक्षुश्च भिक्षुरूपश्च विपणो मृदुरव्ययः। महासेनो विशाखश्च षष्टिभागो गवां पतिः॥

  73. श्लोकShloka 73

    वज्रहस्तश्च विष्कम्भी चमूस्तम्भन एव च। वृत्तावृत्तकरस्तालो मधुर्मधुकलोचनः॥

  74. श्लोकShloka 74

    वाचस्पत्यो वाजसनो नित्यमाश्रमपूजितः। ब्रह्मचारी लोकचारी सर्वचारी विचारवित्॥

  75. श्लोकShloka 75

    ईशान ईश्वरः कालो निशाचारी पिनाकवान्। निमित्तस्थो निमित्तं च नन्दिर्नन्दिकरो हरिः॥

  76. श्लोकShloka 76

    नन्दीश्वरश्च नन्दी च नन्दनो नन्दिवर्द्धनः। भगहारी निहन्ता च कालो ब्रह्मा पितामहः॥

  77. श्लोकShloka 77

    चतुर्मुखो महालिङ्गश्चारुलिङ्गस्तथैव च। लिङ्गाध्यक्षः सुराध्यक्षो योगाध्यक्षो युगावहः॥

  78. श्लोकShloka 78

    बीजाध्यक्षो बीजकर्ता अध्यात्मानुगतो बलः। इतिहासः सकल्पश्च गौतमोऽथ निशाकरः॥

  79. श्लोकShloka 79

    दम्भो ह्यदम्भो वैदम्भो वश्यो वशकरः कलिः। लोककर्ता पशुपतिर्महाकर्ता ह्यनौषधः॥

  80. श्लोकShloka 80

    अक्षरं परमं ब्रह्म बलवच्छक्र एव च। नीतिर्ह्यनीतिः शुद्धात्मा शुद्धो मान्यो गतागतः॥

  81. श्लोकShloka 81

    बहुप्रसादः सुस्वप्नो दर्पणोऽथ त्वमित्रजित्। वेदकारो मन्त्रकारो विद्वान् समरमर्दनः॥

  82. श्लोकShloka 82

    महामेघनिवासी च महाघोरो वशी करः। अग्निज्वालो महाज्वालो अतिधूम्रो हुतो हविः॥

  83. श्लोकShloka 83

    वृषणः शङ्करो नित्यं वर्चस्वी धूमकेतनः। नीलस्तथाङ्गलुब्धश्च शोभनो निरवग्रहः॥

  84. श्लोकShloka 84

    स्वस्तिदः स्वस्तिभावश्च भागी भागकरो लघुः। उत्सङ्गश्च महाङ्गश्च महागर्भपरायणः॥

  85. श्लोकShloka 85

    कृष्णवर्णः सुवर्णश्च इन्द्रियं सर्वदेहिनाम्। महापादो महाहस्तो महाकायो महायशाः॥

  86. श्लोकShloka 86

    महामूर्धा महामात्रो महानेत्रो निशालयः। महान्तको महाकर्णो महोष्ठश्च महाहनुः॥

  87. श्लोकShloka 87

    महानासो महाकम्बुर्महाग्रीवः श्मशानभाक्। महावक्षा महोरस्को ह्यन्तरात्मा मृगालयः॥

  88. श्लोकShloka 88

    लम्बनो लम्बितोष्ठश्च महामायः पयोनिधिः। महादन्तो महादंष्ट्रो महाजिह्वो महामुखः॥

  89. श्लोकShloka 89

    महानखो महारोमा महाकोशो महाजटः। प्रसन्नश्च प्रसादश्च प्रत्ययो गिरिसाधनः॥

  90. श्लोकShloka 90

    स्नेहनोऽस्नेहनश्चैव अजितश्च महामुनिः। वृक्षाकारो वृक्षकेतुरनलो वायुवाहनः॥

  91. श्लोकShloka 91

    गण्डली मेरुधामा च देवाधिपतिरेव च। अथर्वशीर्षः सामास्य ऋक्सहस्रामितेक्षणः॥

  92. श्लोकShloka 92

    यजुः पादभुजो गुह्यः प्रकाशो जङ्गमस्तथा। अमोघार्थः प्रसादश्च अभिगम्यः सुदर्शनः॥

  93. श्लोकShloka 93

    उपकारः प्रियः सर्वः कनकः काञ्चनच्छविः। नाभिर्नन्दिकरो भावः पुष्करस्थपतिः स्थिरः॥

  94. श्लोकShloka 94

    द्वादशस्त्रासनश्चाद्यो यज्ञो यज्ञसमाहितः। नक्तं कलिश्च कालश्च मकरः कालपूजितः॥

  95. श्लोकShloka 95

    सगणो गणकारश्च भूतवाहनसारथिः। भस्मशयो भस्मगोप्ता भस्मभूतस्तरुर्गणः॥

  96. श्लोकShloka 96

    लोकपालस्तथालोको महात्मा सर्वपूजितः। शुक्लस्त्रिशुक्लः सम्पन्नः शुचिर्भूतनिषेवितः॥

  97. श्लोकShloka 97

    आश्रमस्थः क्रियावस्थो विश्वकर्ममतिर्वरः। विशालशाखस्ताम्रोष्ठो ह्यम्बुजालः सुनिश्चलः॥

  98. श्लोकShloka 98

    कपिलः कपिशः शुक्ल आयुश्चैव परोऽपरः। गन्धर्वो ह्यदितिस्तार्क्ष्यः सुविज्ञेयः सुशारदः॥

  99. श्लोकShloka 99

    परश्वधायुधो देवो अनुकारी सुबान्धवः। तुम्बवीणो महाक्रोध ऊर्ध्वरेता जलेशयः॥

  100. श्लोकShloka 100

    उग्रो वंशकरो वंशो वंशनादो ह्यनिन्दितः। सर्वाङ्गरूपो मायावी सुहृदो ह्यनिलोऽनलः॥

  101. श्लोकShloka 101

    बन्धनो बन्धकर्ता च सुबन्धनविमोचनः। सयज्ञारिः सकामारिर्महादंष्ट्रो महायुधः॥

  102. श्लोकShloka 102

    बहुधा निन्दितः शर्वः शङ्करः शङ्करोऽधनः। अमरेशो महादेवो विश्वदेवः सुरारिहा॥

  103. श्लोकShloka 103

    अहिर्बुध्न्योऽनिलाभश्च चेकितानो हविस्तथा। अजैकपाच्च कापाली त्रिशङ्कुरजितः शिवः॥

  104. श्लोकShloka 104

    धन्वन्तरिर्धूमकेतुः स्कन्दो वैश्रवणस्तथा। धाता शक्रश्च विष्णुश्च मित्रस्त्वष्टा ध्रुवो धरः॥

  105. श्लोकShloka 105

    प्रभावः सर्वगो वायुरर्यमा सविता रविः। उषङ्गुश्च विधाता च मान्धाता भूतभावनः॥

  106. श्लोकShloka 106

    विभुर्वर्णविभावी च सर्वकामगुणावहः। पद्मनाभो महागर्भश्चन्द्रवक्त्रोऽनिलोऽनलः॥

  107. श्लोकShloka 107

    बलवांश्चोपशान्तश्च पुराणः पुण्यचञ्चुरी। कुरुकर्ता कुरुवासी कुरुभूतो गुणौषधः॥

  108. श्लोकShloka 108

    सर्वाशयो दर्भचारी सर्वेषां प्राणिनां पतिः। देवदेवः सुखासक्तः सदसत्सर्वरत्नवित्॥

  109. श्लोकShloka 109

    कैलासगिरिवासी च हिमवद्गिरिसंश्रयः। कूलहारी कूलकर्ता बहुविद्यो बहुप्रदः॥

  110. श्लोकShloka 110

    वणिजो वर्धकी वृक्षो बकुलश्चन्दनश्छदः। सारग्रीवो महाजत्रुरलोलश्च महौषधः॥

  111. श्लोकShloka 111

    सिद्धार्थकारी सिद्धार्थश्छन्दोव्याकरणोत्तरः। सिंहनादः सिंहदंष्ट्रः सिंहगः सिंहवाहनः॥

  112. श्लोकShloka 112

    प्रभावात्मा जगत्कालस्थालो लोकहितस्तरुः। सारङ्गो नवचक्राङ्गः केतुमाली सभावनः॥

  113. श्लोकShloka 113

    भूतालयो भूतपतिरहोरात्रमनिन्दितः॥

  114. श्लोकShloka 114

    वाहिता सर्वभूतानां निलयश्च विभुर्भवः। अमोघः संयतो ह्यश्वो भोजनः प्राणधारणः॥

  115. श्लोकShloka 115

    धृतिमान् मतिमान् दक्षः सत्कृतश्च युगाधिपः। गोपालिर्गोपतिर्ग्रामो गोचर्मवसनो हरिः॥

  116. श्लोकShloka 116

    हिरण्यबाहुश्च तथा गुहापालः प्रवेशिनाम्। प्रकृष्टारिर्महाहर्षो जितकामो जितेन्द्रियः॥

  117. श्लोकShloka 117

    गान्धारश्च सुवासश्च तपःसक्तो रतिर्नरः। महागीतो महानृत्यो ह्यप्सरोगणसेवितः॥

  118. श्लोकShloka 118

    महाकेतुर्महाधातुर्नैकसानुचरश्चलः। आवेदनीय आदेशः सर्वगन्धसुखावहः॥

  119. श्लोकShloka 119

    तोरणस्तारणो वातः परिधी पतिखेचरः। संयोगो वर्धनो वृद्धो अतिवृद्धो गुणाधिकः॥

  120. श्लोकShloka 120

    नित्य आत्मसहायश्च देवासुरपतिः पतिः। युक्तश्च युक्तबाहुश्च देवो दिविसुपर्वणः॥

  121. श्लोकShloka 121

    आषाढश्च सुषाढश्च ध्रुवोऽथ हरिणो हरः। वपुरावर्तमानेभ्यो वसुश्रेष्ठो महापथः॥

  122. श्लोकShloka 122

    शिरोहारी विमर्शश्च सर्वलक्षणलक्षितः। अक्षश्च रथयोगी च सर्वयोगी महाबलः॥

  123. श्लोकShloka 123

    समाम्नायोऽसमाम्नायस्तीर्थदेवो महारथः। निर्जीवो जीवनो मन्त्रः शुभाक्षो बहुकर्कशः॥

  124. श्लोकShloka 124

    रत्नप्रभूतो रत्नाङ्गो महार्णवनिपानवित्। मूलं विशालो ह्यमृतो व्यक्ताव्यक्तस्तपोनिधिः॥

  125. श्लोकShloka 125

    आरोहणोऽधिरोहश्च शीलधारी महायशाः। सेनाकल्पो महाकल्पो योगो युगकरो हरिः॥

  126. श्लोकShloka 126

    युगरूपो महारूपो महानागहनोऽवधः। न्यायनिर्वपणः पादः पण्डितो ह्यचलोपमः॥

  127. श्लोकShloka 127

    बहुमालो महामालः शशी हरसुलोचनः। विस्तारो लवणः कूपस्त्रियुगः सफलोदयः॥

  128. श्लोकShloka 128

    त्रिलोचनो विषण्णाङ्गो मणिविद्धो जटाधरः। विन्दुर्विसर्गः सुमुखः शरः सर्वायुधः सहः॥

  129. श्लोकShloka 129

    निवेदनः सुखाजातः सुगन्धारो महाधनुः। गन्धपाली च भगवानुत्थानः सर्वकर्मणाम्॥

  130. श्लोकShloka 130

    मन्थानो बहुलो वायुः सकलः सर्वलोचनः। ततस्तालः करस्थाली ऊर्ध्वसंहननो महान्॥

  131. श्लोकShloka 131

    छत्रं सुच्छत्रो विख्यातो लोकः सर्वाश्रयः क्रमः। मुण्डो विरूपो विकृतो दण्डी कुण्डी विकुर्वणः॥

  132. श्लोकShloka 132

    हर्यक्षः ककुभो वज्री शतजिह्वः सहस्रपात्। सहस्रमूर्धा देवेन्द्रः सर्वदेवमयो गुरुः॥

  133. श्लोकShloka 133

    सहस्रबाहुः सर्वाङ्गः शरण्यः सर्वलोककृत्। पवित्रं त्रिककुन्मन्त्रः कनिष्ठः कृष्णपिङ्गलः॥

  134. श्लोकShloka 134

    ब्रह्मदण्डविनिर्माता शतघ्नीपाशशक्तिमान्। पद्मगर्भो महागर्भो ब्रह्मगर्भो जलोद्भवः॥

  135. श्लोकShloka 135

    गभस्तिर्ब्रह्मकृद् ब्रह्मी ब्रह्मविद् ब्राह्मणो गतिः। अनन्तरूपो नैकात्मा तिग्मतेजाः स्वयम्भुवः॥

  136. श्लोकShloka 136

    ऊर्ध्वगात्मा पशुपतिर्वातरंहा मनोजवः। चन्दनी पद्मनालाग्रः सुरभ्युत्तरणो नरः॥

  137. श्लोकShloka 137

    कर्णिकारमहास्रग्वी नीलमौलिः पिनाकधृत्। उमापतिरुमाकान्तो जाह्नवीधृदुमाधवः॥

  138. श्लोकShloka 138

    वरो वराहो वरदो वरेण्यः सुमहास्वनः। महाप्रसादो दमनः शत्रुहा श्वेतपिङ्गलः॥

  139. श्लोकShloka 139

    पीतात्मा परमात्मा च प्रयतात्मा प्रधानधृत्। सर्वपार्श्वमुखस्त्र्यक्षो धर्मसाधारणो वरः॥

  140. श्लोकShloka 140

    चराचरात्मा सूक्ष्मात्मा अमृतो गोवृषेश्वरः। साध्यर्षिर्वसुरादित्यो विवस्वान् सवितामृतः॥

  141. श्लोकShloka 141

    व्यासः सर्गः सुसंक्षेपो विस्तरः पर्ययो नरः। ऋतुः संवत्सरो मासः पक्षः संख्यासमापनः॥

  142. श्लोकShloka 142

    कलाः काष्ठा लवा मात्रा मुहूर्ताहःक्षपाः क्षणाः। विश्वक्षेत्रं प्रजाबीजं लिङ्गमाद्यस्तु निर्गमः॥

  143. श्लोकShloka 143

    सदसद् व्यक्तमव्यक्तं पिता माता पितामहः। स्वर्गद्वारं प्रजाद्वारं मोक्षद्वारं त्रिविष्टपम्॥

  144. श्लोकShloka 144

    निर्वाणं ह्लादनश्चैव ब्रह्मलोकः परा गतिः। देवासुरविनिर्माता देवासुरपरायणः॥

  145. श्लोकShloka 145

    देवासुरगुरुर्देवो देवासुरनमस्कृतः। देवासुरमहामात्रो देवासुरगणाश्रयः॥

  146. श्लोकShloka 146

    देवासुरगणाध्यक्षो देवासुरगणाग्रणीः। देवातिदेवो देवर्षिर्देवासुरवरप्रदः॥

  147. श्लोकShloka 147

    देवासुरेश्वरो विश्वो देवासुरमहेश्वरः। सर्वदेवमयोऽचिन्त्यो देवतात्माऽऽत्मसम्भवः॥

  148. श्लोकShloka 148

    उद्भित् त्रिविक्रमो वैद्यो विरजो नीरजोऽमरः। ईड्यो हस्तीश्वरो व्याघ्रो देवसिंहो नरर्षभः॥

  149. श्लोकShloka 149

    विबुधोऽग्रवरः सूक्ष्मः सर्वदेवस्तपोमयः। सुयुक्तः शोभनो वज्री प्रासानां प्रभवोऽव्ययः॥

  150. श्लोकShloka 150

    गुहः कान्तो निजः सर्गः पवित्रं सर्वपावनः। शृङ्गी शृङ्गप्रियो बभ्रू राजराजो निरामयः॥

  151. श्लोकShloka 151

    अभिरामः सुरगणो विरामः सर्वसाधनः। ललाटाक्षो विश्वदेवो हरिणो ब्रह्मवर्चसः॥

  152. श्लोकShloka 152

    स्थावराणां पतिश्चैव नियमेन्द्रियवर्धनः। सिद्धार्थः सिद्धभूतार्थोऽचिन्त्यः सत्यव्रतः शुचिः॥

  153. श्लोकShloka 153

    व्रताधिपः परं ब्रह्म भक्तानां परमा गतिः। विमुक्तो मुक्ततेजाश्च श्रीमाञ्श्रीवर्धनो जगत्॥

  154. फलश्रुतिPhalashruti 154

    यथाप्रधानं भगवानिति भक्त्या स्तुतो मया। यन्न ब्रह्मादयो देवा विदुस्तत्त्वेन नर्षयः॥

    इस प्रकार मैंने भक्ति से प्रमुख नामों द्वारा भगवान की स्तुति की, जिन्हें ब्रह्मा आदि देवता और ऋषि भी तत्त्व से नहीं जानते।Thus I have praised the Lord with devotion by his principal names, the Lord whom even Brahma and the other gods, and the rishis, do not know as he truly is.

  155. फलश्रुतिPhalashruti 155

    स्तोतव्यमर्च्यं वन्द्यं च कः स्तोष्यति जगत्पतिम्। भक्त्या त्वेवं पुरस्कृत्य मया यज्ञपतिर्विभुः॥

    जो स्तुति, पूजा और वन्दना के योग्य हैं, उन जगत्पति की स्तुति कौन कर सकता है? फिर भी भक्ति को आगे रखकर मैंने इस प्रकार यज्ञपति, सर्वव्यापी प्रभु की,Who can praise the lord of the world, who is to be praised, worshipped and saluted? Yet, putting devotion first, I have in this way (praised) the all-pervading lord of sacrifice,

  156. फलश्रुतिPhalashruti 156

    ततोऽभ्यनुज्ञां सम्प्राप्य स्तुतो मतिमतां वरः। शिवमेभिः स्तुवन् देवं नामभिः पुष्टिवर्धनैः॥

    उनकी अनुमति पाकर, बुद्धिमानों में श्रेष्ठ उन प्रभु की स्तुति की। जो पुष्टि बढ़ाने वाले इन नामों से शिव देव की स्तुति करता है,after receiving his leave: so the best of the wise was praised. One who praises the god Shiva with these names, which increase well-being,

  157. फलश्रुतिPhalashruti 157

    नित्ययुक्तः शुचिर्भक्तः प्राप्नोत्यात्मानमात्मना॥

    वह सदा योग में लगा हुआ, पवित्र भक्त अपने आत्मा द्वारा आत्मा को प्राप्त कर लेता है। (यह श्लोक एक ही पंक्ति का है।)that devotee, ever steadfast in yoga and pure, attains the Self through the self. (This shloka is a single line.)

  158. फलश्रुतिPhalashruti 158

    एतद्धि परमं ब्रह्म परं ब्रह्माधिगच्छति। ऋषयश्चैव देवाश्च स्तुवन्त्येतेन तत्परम्॥

    यही परम ब्रह्म है, इससे साधक परम ब्रह्म तक पहुँचता है। ऋषि और देवता भी इसी से उस परम तत्त्व की स्तुति करते हैं।This is the supreme Brahman; through it one reaches the supreme Brahman. The rishis and the gods too praise that Supreme with it.

  159. फलश्रुतिPhalashruti 159

    स्तूयमानो महादेवस्तुष्यते नियतात्मभिः। भक्तानुकम्पी भगवानात्मसंस्थाकरो विभुः॥

    संयमी जनों द्वारा स्तुति किए जाने पर महादेव प्रसन्न होते हैं; वे भक्तों पर दया करने वाले, सर्वव्यापी भगवान हैं, जो उन्हें आत्मा में स्थित कर देते हैं।Praised by those of disciplined mind, Mahadeva is pleased: the all-pervading Lord, compassionate to his devotees, who establishes them in the Self.

  160. फलश्रुतिPhalashruti 160

    तथैव च मनुष्येषु ये मनुष्याः प्रधानतः। आस्तिकाः श्रद्दधानाश्च बहुभिर्जन्मभिः स्तवैः॥

    इसी प्रकार मनुष्यों में जो श्रेष्ठ मनुष्य आस्तिक और श्रद्धावान हैं, वे बहुत-से जन्मों में स्तोत्रों द्वारा,In the same way, among human beings, those who are foremost, believers and people of faith, over many births and with hymns,

  161. फलश्रुतिPhalashruti 161

    भक्त्या ह्यनन्यमीशानं परं देवं सनातनम्। कर्मणा मनसा वाचा भावेनामिततेजसः॥

    अनन्य भक्ति से उन ईशान, परम सनातन देव, अपार तेज वाले प्रभु का कर्म, मन, वाणी और भाव से (ध्यान करते हैं),with undivided devotion to Ishana, the supreme and eternal god of boundless radiance, in deed, mind, speech and feeling,

  162. फलश्रुतिPhalashruti 162

    शयाना जाग्रमाणाश्च व्रजन्नुपविशंस्तथा। उन्मिषन् निमिषंश्चैव चिन्तयन्तः पुनः पुनः॥

    सोते और जागते, चलते और बैठते, आँख खोलते और मूँदते हुए, बार-बार उनका चिन्तन करते रहते हैं।lying down and waking, walking and sitting, opening and closing their eyes, keep thinking of him again and again.

  163. फलश्रुतिPhalashruti 163

    शृण्वन्तः श्रावयन्तश्च कथयन्तश्च ते भवम्। स्तुवन्तः स्तूयमानाश्च तुष्यन्ति च रमन्ति च॥

    वे भव (शिव) की कथा सुनते हैं, दूसरों को सुनाते हैं और कहते हैं; उनकी स्तुति करते हैं और स्वयं भी स्तुति पाते हैं, और सन्तुष्ट रहकर आनन्द मनाते हैं।They hear of Bhava (Shiva), tell others of him and speak of him; they praise him and are praised in turn, and they are content and rejoice.

  164. फलश्रुतिPhalashruti 164

    जन्मकोटिसहस्रेषु नानासंसारयोनिषु। जन्तोर्विगतपापस्य भवे भक्तिः प्रजायते॥

    नाना योनियों में हज़ारों करोड़ जन्मों के बाद, जिस जीव के पाप मिट चुके हों, उसके मन में भव (शिव) के प्रति भक्ति उत्पन्न होती है।After thousands of crores of births in many kinds of bodies in samsara, devotion to Bhava (Shiva) arises in a being whose sins have been worn away.

  165. फलश्रुतिPhalashruti 165

    उत्पन्ना च भवे भक्तिरनन्या सर्वभावतः। भाविनः कारणे चास्य सर्वयुक्तस्य सर्वथा॥

    और जब भव के प्रति, जो जगत के कारण और सबसे युक्त हैं, पूरे भाव से अनन्य भक्ति उत्पन्न होती है,And when undivided devotion arises, with one's whole being, towards Bhava, the cause of all that comes to be, who is joined to everything in every way,

  166. फलश्रुतिPhalashruti 166

    एतद् देवेषु दुष्प्रापं मनुष्येषु न लभ्यते। निर्विघ्ना निश्चला रुद्रे भक्तिरव्यभिचारिणी॥

    तो रुद्र के प्रति ऐसी निर्विघ्न, अटल और कभी न डगमगाने वाली भक्ति देवताओं को भी कठिनाई से मिलती है और मनुष्यों में (साधारणतः) नहीं मिलती।such devotion to Rudra, free of obstacles, unshaken and never straying, is hard to find even among the gods and is not (commonly) found among men.

  167. फलश्रुतिPhalashruti 167

    तस्यैव च प्रसादेन भक्तिरुत्पद्यते नृणाम्। येन यान्ति परां सिद्धिं तद्भावगतचेतसः॥

    उन्हीं की कृपा से मनुष्यों में भक्ति उत्पन्न होती है, जिससे उनमें मन लगाए हुए लोग परम सिद्धि को पाते हैं।By his grace alone devotion arises in human beings, and through it those whose minds are fixed on him reach the highest attainment.

  168. फलश्रुतिPhalashruti 168

    ये सर्वभावानुगताः प्रपद्यन्ते महेश्वरम्। प्रपन्नवत्सलो देवः संसारात् तान् समुद्धरेत्॥

    जो पूरे भाव से उनका अनुसरण करते हुए महेश्वर की शरण लेते हैं, शरणागतों से प्रेम करने वाले देव उन्हें संसार से पार उतार देते हैं।The god who loves those who seek refuge in him lifts out of samsara all who follow him with their whole being and take refuge in Maheshvara.

  169. फलश्रुतिPhalashruti 169

    एवमन्ये विकुर्वन्ति देवाः संसारमोचनम्। मनुष्याणामृते देवं नान्या शक्तिस्तपोबलम्॥

    श्लोक कहता है कि दूसरे देवता इस प्रकार मनुष्यों की संसार से मुक्ति में बाधा डालते हैं; इन देव (शिव) को छोड़कर (मुक्ति देने की) कोई दूसरी शक्ति या तप का बल नहीं है।The shloka says that other gods in this way put obstacles in the path of men's release from samsara; apart from this god (Shiva) there is no other power and no force of tapas (that gives release).

  170. फलश्रुतिPhalashruti 170

    इति तेनेन्द्रकल्पेन भगवान् सदसत्पतिः। कृत्तिवासाः स्तुतः कृष्ण तण्डिना शुभबुद्धिना॥

    हे कृष्ण, इस प्रकार इन्द्र के समान तेजस्वी और शुभ बुद्धि वाले तण्डि ने सत् और असत् के स्वामी, कृत्तिवासा (गजचर्म धारण करने वाले) भगवान की स्तुति की थी।In this way, Krishna, Tandi, who was like Indra and whose mind was pure, praised the Lord, master of what is and what is not, Krittivasa (who wears a hide).

  171. फलश्रुतिPhalashruti 171

    स्तवमेतं भगवतो ब्रह्मा स्वयमधारयत्। गीयते च स बुद्ध्येत ब्रह्मा शङ्करसंनिधौ॥

    भगवान के इस स्तोत्र को स्वयं ब्रह्मा ने धारण किया। यह गाया जाता है, और श्लोक कहता है कि शंकर के सान्निध्य में ब्रह्मा ने इसका बोध पाया।Brahma himself held this hymn of the Lord in his memory. It is sung, and the shloka says that Brahma came to understand it in Shankara's presence.

  172. फलश्रुतिPhalashruti 172

    इदं पुण्यं पवित्रं च सर्वदा पापनाशनम्। योगदं मोक्षदं चैव स्वर्गदं तोषदं तथा॥

    यह पुण्यदायक और पवित्र है, सदा पापों का नाश करता है; यह योग, मोक्ष, स्वर्ग और सन्तोष देने वाला है।It is meritorious and pure and always destroys sin; it gives yoga, liberation, heaven and contentment.

  173. फलश्रुतिPhalashruti 173

    एवमेतत् पठन्ते य एकभक्त्या तु शङ्करम्। या गतिः सांख्ययोगानां व्रजन्त्येतां गतिं तदा॥

    जो इस प्रकार एकनिष्ठ भक्ति से शंकर का यह स्तोत्र पढ़ते हैं, वे वही गति पाते हैं जो सांख्य और योग के साधकों की होती है।Those who recite it in this way with single-minded devotion to Shankara reach the same state that the followers of Sankhya and Yoga reach.

  174. फलश्रुतिPhalashruti 174

    स्तवमेतं प्रयत्नेन सदा रुद्रस्य संनिधौ। अब्दमेकं चरेद् भक्तः प्राप्नुयादीप्सितं फलम्॥

    फलश्रुति कहती है कि जो भक्त प्रयत्नपूर्वक एक वर्ष तक सदा रुद्र के सान्निध्य में इस स्तोत्र का पाठ करता है, वह मनचाहा फल पाता है।The phalashruti says that a devotee who practises this hymn with care for one year, always in the presence of Rudra, gains the fruit desired.

  175. फलश्रुतिPhalashruti 175

    एतद् रहस्यं परमं ब्रह्मणो हृदि संस्थितम्। ब्रह्मा प्रोवाच शक्राय शक्रः प्रोवाच मृत्यवे॥

    यह परम रहस्य ब्रह्मा के हृदय में स्थित था। ब्रह्मा ने इसे शक्र (इन्द्र) को बताया और शक्र ने मृत्यु (मृत्यु के देवता) को।This highest secret dwelt in Brahma's heart. Brahma told it to Shakra (Indra), and Shakra told it to Mrityu (the god of death).

  176. फलश्रुतिPhalashruti 176

    मृत्युः प्रोवाच रुद्रेभ्यो रुद्रेभ्यस्तण्डिमागमत्। महता तपसा प्राप्तस्तण्डिना ब्रह्मसद्मनि॥

    मृत्यु ने इसे रुद्रों को बताया, और रुद्रों से यह तण्डि को मिला; तण्डि ने इसे ब्रह्मा के धाम में बड़े तप से प्राप्त किया।Mrityu told it to the Rudras, and from the Rudras it came to Tandi; Tandi obtained it by great tapas in the abode of Brahma.

  177. फलश्रुतिPhalashruti 177

    तण्डिः प्रोवाच शुक्राय गौतमाय च भार्गवः। वैवस्वताय मनवे गौतमः प्राह माधव॥

    तण्डि ने इसे शुक्र को बताया, और भार्गव (शुक्र) ने गौतम को; हे माधव, गौतम ने इसे वैवस्वत मनु को बताया।Tandi told it to Shukra, and Bhargava (Shukra) to Gautama; Gautama, Madhava, told it to Vaivasvata Manu.

  178. फलश्रुतिPhalashruti 178

    नारायणाय साध्याय समाधिष्ठाय धीमते। यमाय प्राह भगवान् साध्यो नारायणोऽच्युतः॥

    (मनु ने इसे) समाधि में स्थित, बुद्धिमान साध्य नारायण को बताया; और भगवान साध्य नारायण अच्युत ने इसे यम को बताया।(Manu told it) to Narayana of the Sadhyas, steady in samadhi and wise; and the Lord Narayana of the Sadhyas, Achyuta, told it to Yama.

  179. फलश्रुतिPhalashruti 179

    नाचिकेताय भगवानाह वैवस्वतो यमः। मार्कण्डेयाय वार्ष्णेय नाचिकेतोऽभ्यभाषत॥

    भगवान वैवस्वत यम (सूर्यपुत्र यम) ने इसे नाचिकेत को बताया; हे वार्ष्णेय (वृष्णिवंशी कृष्ण), नाचिकेत ने इसे मार्कण्डेय को कहा।The Lord Yama, son of Vivasvan, told it to Nachiketa; Nachiketa, Varshneya (Krishna of the Vrishni clan), passed it on to Markandeya.

  180. फलश्रुतिPhalashruti 180

    मार्कण्डेयान्मया प्राप्तो नियमेन जनार्दन। तवाप्यहममित्रघ्न स्तवं दद्यां ह्यविश्रुतम्॥

    हे जनार्दन, मैंने इसे नियमपूर्वक मार्कण्डेय से पाया। हे शत्रुओं का नाश करने वाले, यह अब तक न सुना गया स्तोत्र मैं तुम्हें भी देता हूँ।From Markandeya I received it under a vow of discipline, Janardana. To you too, slayer of foes, I give this hymn that has not been heard abroad.

  181. फलश्रुतिPhalashruti 181

    स्वर्ग्यमारोग्यमायुष्यं धन्यं वेदेन सम्मितम्। नास्य विघ्नं विकुर्वन्ति दानवा यक्षराक्षसाः। पिशाचा यातुधाना वा गुह्यका भुजगा अपि॥

    यह स्वर्ग, आरोग्य और आयु देने वाला, धन्य और वेद के समान है। फलश्रुति कहती है कि दानव, यक्ष, राक्षस, पिशाच, यातुधान, गुह्यक और सर्प भी इसके पाठ में विघ्न नहीं डालते।It leads to heaven, gives health and long life, is blessed and is equal to the Veda. The phalashruti says that danavas, yakshas, rakshasas, pishachas, yatudhanas, guhyakas and serpents do not put obstacles in its way.

  182. फलश्रुतिPhalashruti 182

    यः पठेत शुचिः पार्थ ब्रह्मचारी जितेन्द्रियः। अभग्नयोगो वर्षं तु सोऽश्वमेधफलं लभेत्॥

    ‘पार्थ’ (कुन्तीपुत्र) सम्बोधन से अब बात युधिष्ठिर से है: फलश्रुति कहती है कि जो पवित्र रहकर, ब्रह्मचर्य और इन्द्रियों के संयम के साथ, बिना साधना तोड़े एक वर्ष तक इसे पढ़ता है, वह अश्वमेध यज्ञ का फल पाता है।The address ‘Partha’ (son of Pritha) turns the words to Yudhishthira: the phalashruti says that whoever reads it while keeping pure, celibate and master of the senses, without a break in the practice for a year, gains the fruit of an ashvamedha sacrifice.

यह स्तोत्र कहाँ से हैWhere it comes from

यह सहस्रनाम महाभारत के अनुशासन पर्व में है। महाभारत की कथा में युधिष्ठिर भीष्म से शिव के नामों के बारे में पूछते हैं, और भीष्म यह बात श्रीकृष्ण से कहने को कहते हैं। श्रीकृष्ण बताते हैं कि पुत्र की कामना से वे ऋषि उपमन्यु के आश्रम गए थे, और वहाँ उपमन्यु ने उन्हें शिव की महिमा और ये नाम सुनाए। इसीलिए पहला श्लोक ‘वासुदेव उवाच’ से और दूसरा ‘उपमन्युरुवाच’ से आरम्भ होता है।

शिव के और भी सहस्रनाम प्रचलित हैं, जैसे शिव पुराण और लिंग पुराण में दिए गए सहस्रनाम। यहाँ महाभारत वाला सहस्रनाम है, जिसके नाम ‘स्थिरः स्थाणुः’ से आरम्भ होते हैं। महाभारत के अलग-अलग संस्करणों में इस अध्याय की संख्या अलग-अलग दी गई है।

यहाँ पाठ गीता प्रेस, गोरखपुर की पुस्तक ‘शिवस्तोत्ररत्नाकर’ से लिया गया है, जिसमें स्तोत्र बिना विनियोग और ध्यान के सीधे ‘वासुदेव उवाच’ से आरम्भ होता है। गीता प्रेस के ही ‘सहस्रनामस्तोत्रसंग्रह’ में यही पाठ विनियोग और ध्यान के साथ छपा है; दोनों छपाइयों का मिलान स्रोत-टिप्पणी में दिया गया है।

This sahasranama is in the Anushasana Parva of the Mahabharata. In the Mahabharata's account Yudhishthira asks Bhishma about the names of Shiva, and Bhishma asks Krishna to speak of them. Krishna tells how, wishing for a son, he went to the hermitage of the sage Upamanyu, and there Upamanyu told him of Shiva's glory and recited these names. That is why the first shloka opens with ‘Vasudeva uvacha’ (Vasudeva said) and the second with ‘Upamanyur uvacha’ (Upamanyu said).

Other Shiva sahasranamas are also in use, such as those in the Shiva Purana and the Linga Purana. This page gives the Mahabharata one, whose names begin ‘sthirah sthanuh’. Different editions of the Mahabharata give this chapter different numbers.

The text here is taken from the Gita Press, Gorakhpur book ‘Shiv Stotra Ratnakar’, where the hymn begins directly with ‘Vasudeva uvacha’, without a viniyoga or a dhyana. The same text is printed with a viniyoga and a dhyana in the Gita Press ‘Sahasranama Stotra Sangrah’; the comparison of the two prints is given in the source note.

नामों का पाठ कैसे करेंHow the names are read

स्तोत्र में 182 श्लोक हैं। श्लोक 1 से 30 तक आरम्भ का संवाद है, जिसमें उपमन्यु इस स्तोत्र की उत्पत्ति और महिमा बताते हैं; 30वाँ श्लोक कहता है ‘अब शर्व (शिव) के एक हज़ार आठ नाम सुनो’। श्लोक 31 के ‘स्थिरः’ से लेकर श्लोक 153 के ‘जगत्’ तक केवल नाम हैं, और श्लोक 154 से 182 तक फलश्रुति और यह स्तोत्र किस-किस गुरु से होकर आया, इसकी परम्परा है। छपाई में श्लोक 113 और 157 आधी-आधी पंक्ति के हैं। नामों वाले श्लोकों का अर्थ इस पृष्ठ पर अलग से नहीं दिया गया है।

श्लोकों में हर नाम प्रथमा विभक्ति में है और सन्धि से अगले नाम से जुड़ा है: ‘स्थिरः स्थाणुः प्रभुर्भीमः’ में स्थिर, स्थाणु, प्रभु और भीम, ये चार नाम हैं। बीच में आने वाले च, एव, तथा, हि, अपि, तु जैसे शब्द नाम नहीं, केवल जोड़ने वाले शब्द हैं। कुछ नाम एक से अधिक बार आते हैं, और नामों को कहाँ तोड़ा जाए इस पर टीकाकारों में मतभेद है, इसलिए एक हज़ार आठ की गिनती अलग-अलग ढंग से की जाती है।

पूजा में जब यही नाम एक-एक करके बोले जाते हैं, तो हर नाम को चतुर्थी विभक्ति में बदलकर ॐ और नमः के साथ पढ़ते हैं, जैसे ‘ॐ स्थिराय नमः’, ‘ॐ स्थाणवे नमः’, ‘ॐ प्रभवे नमः’; ऐसी सूची को नामावली कहते हैं, और हर नाम पर बिल्वपत्र, फूल या अक्षत चढ़ाया जाता है। यहाँ नामावली नहीं, केवल स्तोत्र दिया गया है, जिसे श्लोक-श्लोक करके लगातार पढ़ा जाता है।

कुछ प्रसिद्ध नाम और उनके सरल अर्थ: स्थिर (जो कभी नहीं डिगते), स्थाणु (स्तम्भ की तरह अचल), भव (जिनसे सब उत्पन्न होता है), हर (दुःख और पाप हरने वाले), नीलकण्ठ (नीले कण्ठ वाले, जिन्होंने विष पिया), उमापति (उमा अर्थात पार्वती के पति), महेश्वर (महान ईश्वर), पशुपति (सब जीवों के स्वामी), शङ्कर (कल्याण करने वाले), महादेव (देवों के भी देव), शिव (मंगलमय) और त्रिलोचन (तीन नेत्रों वाले)। श्लोक 38 में चन्द्र, सूर्य, शनि, केतु, ग्रह और ग्रहपति भी शिव के ही नाम गिनाए गए हैं।

The hymn has 182 shlokas. Shlokas 1 to 30 are the opening dialogue, in which Upamanyu tells where the hymn came from and what it is worth; shloka 30 says ‘now hear the thousand and eight names of Sharva (Shiva)’. From ‘sthirah’ in shloka 31 to ‘jagat’ in shloka 153 there is nothing but names, and shlokas 154 to 182 are the phalashruti and the line of teachers through whom the hymn came down. In the print, shlokas 113 and 157 are half-shlokas of a single line each. The name shlokas carry no separate meaning on this page.

In the shlokas each name stands in the nominative and runs into the next by sandhi: ‘sthirah sthanuh prabhur bhimah’ is the four names Sthira, Sthanu, Prabhu and Bhima. Small words such as cha, eva, tatha, hi, api and tu are joining words, not names. Some names come more than once, and commentators differ on where to divide the names, so the count of a thousand and eight is reached in more than one way.

When the same names are offered one by one in worship, each is put in the dative and framed with Om and namah, as in ‘Om sthiraya namah’, ‘Om sthanave namah’, ‘Om prabhave namah’; such a list is called a namavali, and a bel leaf, a flower or a few grains of rice are offered with each name. This page gives the hymn only, not a namavali, and it is read straight through, shloka by shloka.

Some well-known names with plain glosses: Sthira (the one who never wavers), Sthanu (unmoving like a pillar), Bhava (from whom all comes into being), Hara (who takes away sorrow and sin), Nilakantha (the blue-throated, who drank the poison), Umapati (husband of Uma, that is Parvati), Maheshvara (the great Lord), Pashupati (lord of all living beings), Shankara (the giver of good), Mahadeva (the god even of the gods), Shiva (the auspicious) and Trilochana (the three-eyed). Shloka 38 also counts Chandra (the Moon), Surya (the Sun), Shani (Saturn), Ketu, Graha and Grahapati (lord of the grahas) among the names of Shiva.

पाठ विधिHow to read it

स्नान करके स्वच्छ वस्त्र पहनें और शिवलिंग, शिव के चित्र या मन में शिव का ध्यान करके शान्त जगह बैठें। जल, बिल्वपत्र, फूल और दीपक अर्पित कर सकते हैं। आरम्भ में ‘ॐ नमः शिवाय’ का कुछ बार जप करके संकल्प लें कि पूरा पाठ एकाग्र होकर करेंगे।

पूरा पाठ एक बैठक में करें, श्लोक 1 से 182 तक, बीच में बात किए बिना। संस्कृत अभी कठिन लगे तो धीरे पढ़ें; शुरू के दिनों में आरम्भ के 30 श्लोक और नामों वाले श्लोक भी पर्याप्त हैं, और धीरे-धीरे पूरा पाठ होने लगेगा। 174वाँ और 182वाँ श्लोक एक वर्ष तक नियम से पाठ करने की बात कहते हैं, इसलिए कई लोग किसी शुभ दिन से संकल्प लेकर रोज़ पढ़ते हैं।

पाठ के बाद शिव से भूल-चूक की क्षमा माँगें और आरती करें। जो नामावली के साथ पूजा करना चाहते हैं, वे हर नाम पर एक बिल्वपत्र या फूल चढ़ा सकते हैं; पर यह पाठ नामावली के बिना भी पूरा माना जाता है।

Bathe, put on clean clothes and sit in a quiet place before a Shiva linga, a picture of Shiva, or with Shiva held in the mind. Water, bel leaves, flowers and a lamp may be offered. Begin by repeating ‘Om namah shivaya’ a few times and resolve to read the whole hymn with attention.

Read it in one sitting, from shloka 1 to 182, without stopping to talk. If the Sanskrit is still hard, read slowly; at first the opening 30 shlokas and the name shlokas are enough, and the full reading will come in time. Shlokas 174 and 182 speak of a year of regular recitation, so many people take a vow on an auspicious day and read it daily.

After the reading, ask Shiva's pardon for any slips and perform an aarti. Those who wish to worship with the namavali can offer a bel leaf or a flower with each name; but the reading is held to be complete without it.

महत्व और फलMeaning and fruit

स्तोत्र अपने बारे में स्वयं कहता है कि यह ध्यान, योग, जप और ज्ञान, सब कुछ है (श्लोक 19), और इसे ‘स्तवराज’, यानी स्तोत्रों का राजा, कहा गया है। इसका मुख्य भाव भक्ति है: फलश्रुति बार-बार कहती है कि शिव की कृपा से ही भक्ति उत्पन्न होती है और शरण में आए भक्त को वे संसार से पार उतारते हैं।

फलश्रुति के अनुसार यह स्तोत्र पापों का नाश करने वाला, आरोग्य, आयु और स्वर्ग देने वाला और वेद के समान है, और एक वर्ष के नियमित पाठ का फल अश्वमेध यज्ञ के बराबर बताया गया है। ये फलश्रुति के वचन हैं; परम्परा में इस पाठ को मन को शान्त और स्थिर करने वाली साधना के रूप में देखा जाता है, जो प्रयत्न और सावधानी की जगह नहीं लेती।

The hymn says of itself that it is meditation, yoga, japa and knowledge all at once (shloka 19), and it is called the Stavaraja, the king of hymns. Its heart is devotion: the phalashruti says again and again that devotion arises only by Shiva's grace, and that he lifts out of samsara the devotee who comes to him for refuge.

By its phalashruti the hymn destroys sin, gives health, long life and heaven and is equal to the Veda, and a year of regular reading is said to bear the fruit of an ashvamedha sacrifice. These are the words of the phalashruti; by tradition the reading is seen as a practice that calms and steadies the mind, not as a substitute for effort and ordinary care.

कब पढ़ेंWhen to read

सोमवार को, प्रदोष की संध्या को, महाशिवरात्रि पर और पूरे सावन में; शिव-पूजा, रुद्राभिषेक या बिल्वपत्र चढ़ाने के समय। प्रातः स्नान के बाद या संध्या को शान्त मन से एक बैठक में पढ़ें। संकल्प लेकर रोज़ पढ़ने वाले इसे एक ही समय पर पढ़ते हैं।On Mondays, in the evening of Pradosh, on Mahashivratri and through the month of Sawan; with Shiva puja, a rudrabhishek or an offering of bel leaves. Read it in one sitting with a calm mind, in the morning after bathing or at dusk. Those who take a vow to read it daily keep to the same hour each day.

कुंडली मेंIn your kundli

ज्योतिष में शिव की उपासना चन्द्रमा और शनि दोनों के उपाय के रूप में बताई जाती है: शिव मस्तक पर चन्द्रमा धारण करते हैं, और शनि की पीड़ा में शिव-पूजा की परम्परा पुरानी है। इस स्तोत्र के 38वें श्लोक में चन्द्र, सूर्य, शनि, केतु और ग्रहपति भी शिव के नाम गिनाए गए हैं। कुंडली में चन्द्रमा के क्षीण, नीच (वृश्चिक) या शनि, राहु अथवा केतु से पीड़ित होने पर, चन्द्र-शनि की युति (विष योग) में, शनि की साढ़ेसाती या ढैया में, और चन्द्रमा या शनि की महादशा-अन्तर्दशा में यह सहस्रनाम परम्परागत उपाय के रूप में पढ़ा जाता है। मन की अशान्ति, चिन्ता या लम्बे समय से चल रही कठिनाई में भी लोग इसे पढ़ते हैं। यह पाठ मन को स्थिर करने का साधन है, परिश्रम और व्यावहारिक सावधानी की जगह नहीं लेता। अपनी कुंडली में चन्द्रमा और शनि की स्थिति और चल रही दशा इसी साइट पर कुंडली बनाकर देखी जा सकती है।In Jyotish the worship of Shiva is given as a remedy for both the Moon and Saturn: Shiva wears the Moon on his head, and Shiva puja is an old remedy for the troubles of Saturn. Shloka 38 of this hymn even counts Chandra, Surya, Shani, Ketu and Grahapati among the names of Shiva. This sahasranama is traditionally read when the Moon is weak, debilitated (in Scorpio) or afflicted by Saturn, Rahu or Ketu, when the Moon and Saturn sit together (vish yoga), during sade sati or Saturn's dhaiya, and in a mahadasha or antardasha of the Moon or Saturn. People also read it in unrest of mind, worry or a long run of difficulty. It is a way to steady the mind, not a substitute for effort and ordinary care. You can see where the Moon and Saturn stand and which dasha is running by building your kundli on this site.

ग्रह: Grahas: चन्द्रMoon, शनिSaturn

अपनी कुंडली में देखेंCheck it in your kundli

प्रश्नोत्तरQuestions people ask

शिव सहस्रनाम कब पढ़ना चाहिए?When should the Shiva Sahasranama be read?
किसी भी दिन शिव-पूजा के साथ पढ़ा जा सकता है। सोमवार, प्रदोष, महाशिवरात्रि और सावन के महीने में इसका पाठ विशेष माना जाता है। प्रातः स्नान के बाद या संध्या को, एक बैठक में पढ़ना अच्छा है।It can be read with Shiva puja on any day. It is held to be special on Mondays, on Pradosh, on Mahashivratri and through the month of Sawan. It is best read in one sitting, in the morning after bathing or at dusk.
शिव सहस्रनाम कितनी बार पढ़ना चाहिए?How many times should the Shiva Sahasranama be read?
एक बार पूरा पाठ पर्याप्त है। स्तोत्र के 174वें और 182वें श्लोक एक वर्ष तक नियम से पाठ करने की बात कहते हैं, इसलिए कई लोग संकल्प लेकर रोज़ एक बार पढ़ते हैं, या महाशिवरात्रि और सावन के सोमवारों पर पढ़ते हैं। कोई संख्या अनिवार्य नहीं है; नियमितता और भाव अधिक महत्व रखते हैं।One full reading is enough. Shlokas 174 and 182 of the hymn speak of a year of regular recitation, so many people take a vow and read it once a day, or read it on Mahashivratri and the Mondays of Sawan. No count is required; regularity and feeling matter more.
शिव सहस्रनाम पढ़ने के क्या फायदे हैं?What are the benefits of reading the Shiva Sahasranama?
फलश्रुति के अनुसार यह पापों का नाश करता है, आरोग्य, आयु और स्वर्ग देता है, और भक्ति से पढ़ने वाले को शिव संसार से पार उतारते हैं। परम्परा में इसे मन की शान्ति और कठिन समय में धैर्य के लिए पढ़ा जाता है, और ज्योतिष में यह चन्द्रमा और शनि के उपाय के रूप में बताया जाता है।By its phalashruti it destroys sin, gives health, long life and heaven, and Shiva lifts out of samsara the one who reads it with devotion. By tradition it is read for peace of mind and patience in hard times, and in Jyotish it is given as a remedy for the Moon and Saturn.
शिव सहस्रनाम के पाठ के क्या नियम हैं?What are the rules for reading the Shiva Sahasranama?
स्नान करके, स्वच्छ वस्त्र पहनकर, शान्त मन से पढ़ें और पाठ बीच में न छोड़ें। स्तोत्र (श्लोक 17) कहता है कि इसे श्रद्धा रखने वाले भक्त को ही देना चाहिए, और श्लोक 182 पवित्रता, ब्रह्मचर्य और इन्द्रिय-संयम के साथ पाठ की बात कहता है। उच्चारण धीरे-धीरे सुधरता है; शुद्ध भाव से किया गया पाठ ही मुख्य है।Read it after bathing, in clean clothes and with a calm mind, and do not break off in the middle. The hymn (shloka 17) says it should be passed on only to a devotee who has faith, and shloka 182 speaks of reading it with purity, celibacy and control of the senses. Pronunciation improves with time; what matters most is a sincere reading.

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