श्रीगोपालसहस्रनामस्तोत्रम्
Shri Gopal Sahasranama Stotram
सम्मोहन तन्त्र का पार्वती-शिव संवाद: पूर्वभाग, विनियोग, न्यास, ध्यान, 142 नाम-श्लोक और फलश्रुति, पूर्वभाग और फलश्रुति के अर्थ सहितShiva's answer to Parvati in the Sammohana Tantra: the opening dialogue, viniyoga, nyasa, dhyana, 142 name shlokas and the phalashruti, with the framing verses explained

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श्रीगोपालसहस्रनामस्तोत्र भगवान् श्रीकृष्ण के गोपाल रूप के हज़ार नामों का संस्कृत स्तोत्र है। इसकी समाप्ति-पंक्ति के अनुसार यह सम्मोहन तन्त्र में पार्वती और ईश्वर (शिव) के संवाद के रूप में आता है: कैलास पर पार्वती पूछती हैं कि सबके पूज्य शिव स्वयं प्रतिदिन किसका स्तोत्र पढ़ते हैं, और शिव बताते हैं कि वे राधा-माधव की उसी एक ज्योति का ध्यान करते हैं जिसके नाम गोपाल ने स्वयं कहे। स्तोत्र के अनुसार इसे श्रीकृष्ण ने राधा को सुनाया और नारद ने लोक में प्रकट किया; इसके रचयिता का नाम ज्ञात नहीं है।
लोग इसे श्रीकृष्ण-भक्ति, घर की सुख-शान्ति और कठिन समय में सहारे के भाव से पढ़ते हैं, विशेषकर एकादशी, जन्माष्टमी और कार्तिक मास में। इस पृष्ठ पर पूरा पाठ गीता प्रेस, गोरखपुर के 'सहस्रनामस्तोत्रसंग्रह' के छपे पाठ के अनुसार है; पूर्वभाग, विनियोग, न्यास, ध्यान और फलश्रुति के हर श्लोक का सीधा अर्थ दिया गया है, नाम-श्लोक कैसे पढ़े जाते हैं और कुछ प्रसिद्ध नामों के अर्थ एक अलग खण्ड में हैं, और साइन-इन के बाद पूरा पाठ मुफ्त PDF में डाउनलोड किया जा सकता है।
The Shri Gopal Sahasranama Stotram is a Sanskrit hymn of a thousand names of Krishna in his form as Gopala, the cowherd. Its closing line places it in the Sammohana Tantra, as a dialogue between Parvati and Ishvara (Shiva): on Kailasa, Parvati asks whose hymn Shiva, whom everyone worships, recites every day, and Shiva answers that he meditates on the single light of Radha and Madhava, whose names Gopala himself spoke. The hymn says that Krishna told it to Radha and that Narada made it known; its author is not known.
People read it out of devotion to Krishna, for peace and happiness at home and as a support in hard times, especially on Ekadashi, on Janmashtami and in the month of Kartika. The full text on this page follows the printed text of the Gita Press, Gorakhpur collection Sahasranama Stotra Sangrah; every shloka of the opening dialogue, the viniyoga, the nyasas, the dhyana and the phalashruti has a plain meaning, a separate section explains how the name shlokas are read and glosses some well-known names, and after signing in the whole text can be downloaded as a free PDF.
पाठThe text
श्लोकShloka 1
पार्वत्युवाच कैलासशिखरे रम्ये गौरी पृच्छति शंकरम्। ब्रह्माण्डाखिलनाथस्त्वं सृष्टिसंहारकारकः॥
पार्वती जी ने कहा। रमणीय कैलास के शिखर पर गौरी (पार्वती) शंकर से पूछती हैं: आप समस्त ब्रह्माण्ड के स्वामी हैं और सृष्टि तथा संहार करने वाले हैं।Parvati said. On the lovely peak of Kailasa, Gauri (Parvati) asks Shankara: you are the lord of the whole universe, the one who brings about creation and dissolution.
श्लोकShloka 2
त्वमेव पूज्यसे लोकैर्ब्रह्मविष्णुसुरादिभिः। नित्यं पठसि देवेश कस्य स्तोत्रं महेश्वर॥
ब्रह्मा, विष्णु और देवता आदि सब लोक आपकी ही पूजा करते हैं। हे देवेश (देवताओं के स्वामी), हे महेश्वर, फिर आप स्वयं प्रतिदिन किसका स्तोत्र पढ़ते हैं?It is you whom the worlds worship, Brahma, Vishnu, the gods and all. Then, lord of the gods (Devesha), great lord (Maheshvara), whose hymn is it that you yourself recite every day?
श्लोकShloka 3
आश्चर्यमिदमत्यन्तं जायते मम शंकर। तत्प्राणेश महाप्राज्ञ संशयं छिन्धि शंकर॥
हे शंकर, यह देखकर मुझे बहुत आश्चर्य होता है। इसलिए हे प्राणेश (मेरे प्राणों के स्वामी), हे महाप्राज्ञ (परम ज्ञानी) शंकर, मेरा यह संशय दूर कीजिए।This fills me with great wonder, Shankara. So, lord of my life (Pranesha), most wise one, Shankara, cut away this doubt of mine.
श्लोकShloka 4
श्रीमहादेव उवाच धन्यासि कृतपुण्यासि पार्वति प्राणवल्लभे। रहस्यातिरहस्यं च यत्पृच्छसि वरानने॥
श्रीमहादेव ने कहा। हे पार्वती, हे प्राणवल्लभे (प्राणों जैसी प्रिय), तुम धन्य हो और बड़े पुण्य वाली हो, क्योंकि हे वरानने (सुन्दर मुख वाली), तुम जो पूछ रही हो वह रहस्यों में भी परम रहस्य है।Shri Mahadeva said. Parvati, dear to me as my own life, you are blessed and rich in merit, for what you ask, fair-faced one, is the secret beyond all secrets.
श्लोकShloka 5
स्त्रीस्वभावान्महादेवि पुनस्त्वं परिपृच्छसि। गोपनीयं गोपनीयं गोपनीयं प्रयत्नतः॥
हे महादेवी, तुम स्त्री-स्वभाव की जिज्ञासा से फिर-फिर पूछ रही हो; पर यह ऐसी बात है जिसे यत्न से गुप्त रखना चाहिए, गुप्त रखना चाहिए, गुप्त रखना चाहिए।Great goddess, with a woman's eagerness to know you ask again and again; yet this is something to be guarded with care: guarded, guarded, guarded.
श्लोकShloka 6
दत्ते च सिद्धिहानिः स्यात्तस्माद्यत्नेन गोपयेत्। इदं रहस्यं परमं पुरुषार्थप्रदायकम्॥
इसे (हर किसी को) दे देने से इसकी सिद्धि नष्ट होती है, इसलिए इसे यत्न से गुप्त रखना चाहिए। यह परम रहस्य पुरुषार्थ (धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष) देने वाला है।Given away (to just anyone), it loses its power to bring success, so it should be guarded with care. This supreme secret grants the purusharthas (the aims of life: dharma, artha, kama and moksha).
श्लोकShloka 7
धनरत्नौघमाणिक्यतुरङ्गमगजादिकम्। ददाति स्मरणादेव महामोक्षप्रदायकम्॥
शिव कहते हैं कि केवल इसके स्मरण से ही यह धन, रत्नों के ढेर, माणिक्य, घोड़े, हाथी आदि देता है, और महामोक्ष (परम मुक्ति) भी देने वाला है।Shiva says that by merely remembering it, it gives wealth, heaps of gems, rubies, horses, elephants and the like, and it also grants the great liberation (mahamoksha).
श्लोकShloka 8
तत्तेऽहं सम्प्रवक्ष्यामि शृणुष्वावहिता प्रिये। योऽसौ निरञ्जनो देवश्चित्स्वरूपी जनार्दनः॥
हे प्रिये, वह मैं तुम्हें बताऊँगा, ध्यान से सुनो। वे जो निरंजन (माया के मल से रहित) देव हैं, चैतन्य-स्वरूप जनार्दन (विष्णु) हैं, —I shall tell it to you, dear one; listen attentively. That god who is stainless (niranjana, untouched by maya), Janardana (Vishnu), whose very form is consciousness, —
श्लोकShloka 9
संसारसागरोत्तारकारणाय सदा नृणाम्। श्रीरंगादिकरूपेण त्रैलोक्यं व्याप्य तिष्ठति॥
— वे मनुष्यों को संसार-सागर से पार उतारने के लिए सदा श्रीरंग आदि रूपों में तीनों लोकों में व्याप्त होकर स्थित रहते हैं।— remains for ever present, pervading the three worlds in forms such as Shri Ranga, to carry human beings across the ocean of worldly life.
श्लोकShloka 10
ततो लोका महामूढा विष्णुभक्तिविवर्जिताः। निश्चयं नाधिगच्छन्ति पुनर्नारायणो हरिः॥
फिर भी विष्णु-भक्ति से रहित, गहरे मोह में पड़े लोग (उनके विषय में) निश्चय नहीं कर पाते। तब फिर से नारायण हरि ने, —Yet people sunk in deep delusion and without devotion to Vishnu cannot arrive at certainty (about him). So once again Narayana, Hari, —
श्लोकShloka 11
निरञ्जनो निराकारो भक्तानां प्रीतिकामदः। वृन्दावनविहाराय गोपालं रूपमुद्वहन्॥
— जो निरंजन और निराकार हैं और भक्तों को प्रेम तथा मनचाहा फल देते हैं, वृन्दावन में लीला-विहार के लिए गोपाल (गायें चराने वाले) का रूप धारण किया, —— stainless and formless, who gives devotees love and what they long for, took on the form of Gopala (the cowherd) to play in Vrindavana, —
श्लोकShloka 12
मुरलीवादनाधारी राधायै प्रीतिमावहन्। अंशांशेभ्यः समुन्मील्य पूर्णरूपकलायुतः॥
— मुरली बजाने वाले बनकर, राधा के लिए प्रेम लाते हुए, और अपने अंशों तथा अंशों के भी अंशों से प्रकट होकर अपने पूर्ण रूप की सब कलाओं से युक्त होकर।— bearing and playing the flute, bringing love to Radha, unfolding from his portions and from the portions of those portions, complete with every digit (kala) of his full form.
श्लोकShloka 13
श्रीकृष्णचन्द्रो भगवान्नन्दगोपवरोद्यतः। धरणीरूपिणी माता यशोदानन्ददायिनी॥
भगवान् श्रीकृष्णचन्द्र नन्द गोप को मिले वरदान को पूरा करने के लिए उद्यत हुए; और उनकी माता बनीं यशोदा, जो पृथ्वी (धरा) का ही रूप हैं और आनन्द देने वाली हैं।Lord Shri Krishnachandra set out to fulfil the boon granted to Nanda the cowherd; and his mother was Yashoda, the Earth (Dhara) in human form, the giver of joy.
श्लोकShloka 14
द्वाभ्यां प्रयाचितो नाथो देवक्यां वसुदेवतः। ब्रह्मणाभ्यर्थितो देवो देवैरपि सुरेश्वरि॥
हे सुरेश्वरी (देवताओं की स्वामिनी), उन दोनों (देवकी और वसुदेव) के याचना करने पर वे स्वामी वसुदेव से देवकी के गर्भ में आए; ब्रह्मा और देवताओं ने भी उनसे प्रार्थना की थी।Queen of the gods, entreated by the two of them (Devaki and Vasudeva), the Lord came into Devaki through Vasudeva; Brahma and the gods too had besought him.
श्लोकShloka 15
जातोऽवन्यां मुकुन्दोऽपि मुरलीवेदरेचिका। तया सार्द्धं वचः कृत्वा ततो जातो महीतले॥
इस प्रकार मुकुन्द (मोक्ष देने वाले) पृथ्वी पर प्रकट हुए। वेद का स्वर बहाने वाली मुरली के साथ वचन करके वे धरती पर जन्मे।So Mukunda (the giver of liberation) appeared on earth. Having made a pact with the flute (murali), whose breath pours out the Veda, he was born on the face of the earth.
श्लोकShloka 16
संसारसारसर्वस्वं श्यामलं महदुज्ज्वलम्। एतज्ज्योतिरहं वेद्यं चिन्तयामि सनातनम्॥
(शिव कहते हैं:) संसार का सार और सर्वस्व, श्यामल, महान् और उज्ज्वल यह सनातन ज्योति ही जानने योग्य है; मैं इसी का चिन्तन करता हूँ।(Shiva says:) This eternal light, dark (shyamala) and yet greatly radiant, the essence and the all of worldly life, is what is to be known; it is this that I meditate on.
श्लोकShloka 17
गौरतेजो विना यस्तु श्यामतेजः समर्चयेत्। जपेद्वा ध्यायते वापि स भवेत्पातकी शिवे॥
हे शिवे (पार्वती), जो गौर तेज (राधा) के बिना केवल श्याम तेज (कृष्ण) की पूजा करता है, या उसका जप या ध्यान करता है, वह पातकी (दोष का भागी) होता है।Auspicious one (Parvati), whoever worships the dark radiance (Krishna) without the fair radiance (Radha), or chants or meditates on it so, becomes a wrongdoer.
श्लोकShloka 18
स ब्रह्महा सुरापी च स्वर्णस्तेयी च पञ्चमः। एतैर्दोषैर्विलिप्येत तेजोभेदान्महेश्वरि॥
हे महेश्वरी, इस तेज में भेद करने से वह ब्रह्महत्या करने वाले, मदिरा पीने वाले, सोना चुराने वाले और पाँचवें (ऐसे पापियों के संगी) के दोषों से लिप्त हो जाता है।Great goddess, by dividing this radiance such a person is stained with the faults of the killer of a brahmin, the drinker of liquor, the thief of gold, and the fifth (the companion of such sinners).
श्लोकShloka 19
तस्माज्ज्योतिरभूद्द्वेधा राधामाधवरूपकम्। तस्मादिदं महादेवि गोपालेनैव भाषितम्॥
इसीलिए वह एक ही ज्योति राधा और माधव के रूप में दो प्रकार से प्रकट हुई। हे महादेवी, इसी कारण यह (सहस्रनाम) स्वयं गोपाल ने कहा है।That is why the one light became twofold, in the forms of Radha and Madhava. And so, great goddess, this (hymn of names) was spoken by Gopala himself.
श्लोकShloka 20
दुर्वाससो मुनेर्मोहे कार्तिक्यां रासमण्डले। ततः पृष्टवती राधा सन्देहं भेदमात्मनः॥
कार्तिक पूर्णिमा की रात रास-मण्डल में, जब दुर्वासा मुनि मोह में पड़ गए थे, तब राधा ने (कृष्ण और) अपने बीच के भेद के विषय में अपना संदेह पूछा।On the Kartika full-moon night, in the circle of the rasa dance, when the sage Durvasa had been bewildered, Radha asked about her doubt: the difference between herself (and Krishna).
श्लोकShloka 21
निरञ्जनात्समुत्पन्नं मयाधीतं जगन्मयि। श्रीकृष्णेन ततः प्रोक्तं राधायै नारदाय च॥
हे जगन्मयी (जगत्-स्वरूपा), यह निरंजन (परमात्मा) से उत्पन्न हुआ और मैंने इसे सीखा। फिर श्रीकृष्ण ने इसे राधा को और नारद को सुनाया।Goddess who embodies the world, this arose from the stainless one (niranjana), and I learnt it. Then Shri Krishna spoke it to Radha and to Narada.
श्लोकShloka 22
ततो नारदतः सर्वं विरला वैष्णवास्तथा। कलौ जानन्ति देवेशि गोपनीयं प्रयत्नतः॥
फिर नारद से यह सब (आगे पहुँचा), और इस प्रकार हे देवेशी, कलियुग में विरले वैष्णव ही इसे जानते हैं; इसे यत्न से गुप्त रखना चाहिए।Then from Narada it all (went on), and so, queen of the gods, in the Kali age only a rare few Vaishnavas know it; it is to be guarded with care.
श्लोकShloka 23
शठाय कृपणायाथ दाम्भिकाय सुरेश्वरि। ब्रह्महत्यामवाप्नोति तस्माद्यत्नेन गोपयेत्॥
हे सुरेश्वरी, जो इसे किसी धूर्त, कृपण या दम्भी (पाखण्डी) को (देता है), वह ब्रह्महत्या के पाप का भागी होता है; इसलिए इसे यत्न से गुप्त रखना चाहिए।Queen of the gods, (whoever gives it) to a cheat, a miser or a hypocrite incurs the sin of killing a brahmin; therefore it should be guarded with care.
विनियोगViniyoga
अस्य श्रीगोपालसहस्रनामस्तोत्रमन्त्रस्य श्रीनारद ऋषिः, अनुष्टुप् छन्दः, श्रीगोपालो देवता, कामो बीजम्, माया शक्तिः, चन्द्रः कीलकम्, श्रीकृष्णचन्द्रभक्तिरूपफलप्राप्तये श्रीगोपालसहस्रनामजपे विनियोगः अथवा ॐ ऐं क्लीं बीजम्, श्रीं ह्रीं शक्तिः, श्रीवृन्दावननिवासः कीलकम्, श्रीराधाप्रियं परं ब्रह्मेति मन्त्रः, धर्मादिचतुर्विधपुरुषार्थसिद्ध्यर्थे जपे विनियोगः।
यह विनियोग है, जो पाठ से पहले संकल्प की तरह बोला जाता है। इसके अनुसार इस श्रीगोपाल-सहस्रनाम-स्तोत्र रूपी मन्त्र के ऋषि श्रीनारद हैं, छन्द अनुष्टुप् है, देवता श्रीगोपाल हैं, बीज 'काम' है, शक्ति 'माया' है और कीलक (मन्त्र को स्थिर रखने वाला) 'चन्द्र' है; श्रीकृष्णचन्द्र की भक्ति रूपी फल पाने के लिए सहस्रनाम के जप में इसका विनियोग (उपयोग) होता है। 'अथवा' के बाद छपा दूसरा विनियोग बीज 'ॐ ऐं क्लीं', शक्ति 'श्रीं ह्रीं', कीलक 'श्रीवृन्दावन-निवास' (वृन्दावन में रहने वाले) और मन्त्र 'श्रीराधाप्रिय परब्रह्म' (राधा के प्रिय, परम ब्रह्म) बताता है, और धर्म आदि चारों पुरुषार्थों की सिद्धि के लिए जप में विनियोग करता है।This is the viniyoga, the statement of purpose spoken before the recitation. It names the seer of this hymn-mantra of Shri Gopala's thousand names as Shri Narada, its metre as anushtup and its deity as Shri Gopala; its seed (bija) is "Kama", its power (shakti) "Maya" and its keystone (kilaka, what holds the mantra fast) "Chandra", and the recitation is dedicated to gaining the fruit that is devotion to Shri Krishnachandra. The second viniyoga, printed after "athava" (or), gives the bija as ॐ ऐं क्लीं, the shakti as श्रीं ह्रीं, the kilaka as "he who dwells in Shri Vrindavana" and the mantra as "Radha's beloved, the supreme Brahman", and dedicates the recitation to the four aims of life beginning with dharma.
करन्यासKaranyasa
करन्यासः ॐ क्लां अङ्गुष्ठाभ्यां नमः, ॐ क्लीं तर्जनीभ्यां नमः, ॐ क्लूं मध्यमाभ्यां नमः, ॐ क्लैं अनामिकाभ्यां नमः, ॐ क्लौं कनिष्ठिकाभ्यां नमः, ॐ क्लः करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः।
यह करन्यास है, जिसमें मन्त्र को हाथों पर स्थापित किया जाता है। 'ॐ क्लां' से 'ॐ क्लः' तक के छह बीज-मन्त्र बोलते हुए क्रम से दोनों अँगूठे, तर्जनी, मध्यमा, अनामिका और कनिष्ठिका उँगलियाँ, और अन्त में हथेलियाँ तथा हाथों का पिछला भाग छुआ जाता है।This is the karanyasa, in which the mantra is placed on the hands. Saying the six seed syllables from ॐ क्लां to ॐ क्लः, one touches in turn the thumbs, the index, middle, ring and little fingers, and last the palms and the backs of the hands.
हृदयादिन्यासHridayadi nyasa
हृदयादिन्यासः ॐ क्लां हृदयाय नमः, ॐ क्लीं शिरसे स्वाहा, ॐ क्लूं शिखायै वषट्, ॐ क्लैं कवचाय हुम्, ॐ क्लौं नेत्रत्रयाय वौषट्, ॐ क्लः अस्त्राय फट्।
यह हृदयादि-न्यास (छह अंगों का न्यास) है। उन्हीं छह बीज-मन्त्रों के साथ क्रम से हृदय, सिर, शिखा (चोटी का स्थान), कवच के रूप में दोनों कंधे और तीनों नेत्र (दोनों आँखें और भौंहों के बीच का स्थान) छुए जाते हैं, और अन्तिम मन्त्र 'अस्त्र' के रूप में चारों ओर रक्षा का घेरा बाँधता है, जो प्रायः ताली बजाकर किया जाता है।This is the hridayadi nyasa, the nyasa of six limbs. With the same six seed syllables one touches in turn the heart, the head, the crown tuft (shikha), the shoulders as an armour (kavacha) and the three eyes (the two eyes and the point between the brows); the last mantra, the weapon (astra), seals a circle of protection all round, usually with a clap.
ध्यानDhyana
ध्यानम् कस्तूरीतिलकं ललाटपटले वक्षःस्थले कौस्तुभं नासाग्रे वरमौक्तिकं करतले वेणुः करे कंकणम्। सर्वाङ्गे हरिचन्दनं सुललितं कण्ठे च मुक्तावली गोपस्त्रीपरिवेष्टितो विजयते गोपालचूडामणिः॥
यह ध्यान है, जिसमें पाठ से पहले गोपाल का रूप मन में बसाया जाता है: माथे पर कस्तूरी का तिलक, वक्ष पर कौस्तुभ मणि, नाक की नोक पर सुन्दर मोती, हथेली में वंशी और हाथ में कंगन; सब अंगों पर सुन्दर हरिचन्दन का लेप और गले में मोतियों की माला। गोपियों से घिरे गोपाल-चूडामणि (गोपालों के शिरोमणि, श्रीकृष्ण) की जय हो।This is the dhyana, in which Gopala's form is called to mind before the recitation: a tilak of musk on the forehead, the Kaustubha jewel on the chest, a fine pearl at the tip of the nose, the flute in the palm and a bangle on the wrist; fragrant hari-chandana paste over every limb and a string of pearls at the throat. Glory to the crest-jewel of the cowherds (Krishna), surrounded by the gopis.
ध्यानDhyana
फुल्लेन्दीवरकान्तिमिन्दुवदनं बर्हावतंसप्रियं श्रीवत्साङ्कमुदारकौस्तुभधरं पीताम्बरं सुन्दरम्। गोपीनां नयनोत्पलार्चिततनुं गोगोपसङ्घावृतं गोविन्दं कलवेणुवादनपरं दिव्याङ्गभूषं भजे॥
मैं उन गोविन्द का भजन करता हूँ जिनकी कान्ति खिले हुए नील कमल जैसी है, मुख चन्द्रमा जैसा है, जिन्हें मोरपंख का मुकुट प्रिय है, जिनके वक्ष पर श्रीवत्स का चिह्न है, जो श्रेष्ठ कौस्तुभ मणि और पीताम्बर धारण किए हैं और सुन्दर हैं; जिनका शरीर गोपियों के नयन-कमलों से पूजित है (वे उन्हें निहारती रहती हैं), जो गायों और गोपों के समूह से घिरे हैं, मधुर वंशी बजाने में लीन हैं और दिव्य आभूषण पहने हैं।I worship Govinda, radiant as a full-blown blue lotus, moon-faced, fond of his crest of peacock feathers, marked with the Shrivatsa, wearing the noble Kaustubha jewel and yellow silk, handsome; whose body is worshipped by the lotus eyes of the gopis (they cannot stop gazing at him), who is surrounded by cows and cowherds, absorbed in playing his sweet flute and adorned with divine ornaments.
नाम-श्लोकName shloka 1
ॐ क्लीं देवः कामदेवः कामबीजशिरोमणिः। श्रीगोपालो महीपालः सर्ववेदाङ्गपारगः॥
नाम-श्लोकName shloka 2
धरणीपालको धन्यः पुण्डरीकः सनातनः। गोपतिर्भूपतिः शास्ता प्रहर्ता विश्वतोमुखः॥
नाम-श्लोकName shloka 3
आदिकर्ता महाकर्ता महाकालः प्रतापवान्। जगज्जीवो जगद्धाता जगद्भर्ता जगद्वसुः॥
नाम-श्लोकName shloka 4
मत्स्यो भीमः कुहूभर्ता हर्ता वाराहमूर्तिमान्। नारायणो हृषीकेशो गोविन्दो गरुडध्वजः॥
नाम-श्लोकName shloka 5
गोकुलेन्द्रो महाचन्द्रः शर्वरीप्रियकारकः। कमलामुखलोलाक्षः पुण्डरीकशुभावहः॥
नाम-श्लोकName shloka 6
दुर्वासाः कपिलो भौमः सिन्धुसागरसङ्गमः। गोविन्दो गोपतिर्गोत्रः कालिन्दीप्रेमपूरकः॥
नाम-श्लोकName shloka 7
गोपस्वामी गोकुलेन्द्रो गोवर्धनवरप्रदः। नन्दादिगोकुलत्राता दाता दारिद्र्यभञ्जनः॥
नाम-श्लोकName shloka 8
सर्वमङ्गलदाता च सर्वकामप्रदायकः। आदिकर्ता महीभर्ता सर्वसागरसिन्धुजः॥
नाम-श्लोकName shloka 9
गजगामी गजोद्धारी कामी कामकलानिधिः। कलङ्करहितश्चन्द्रो बिम्बास्यो बिम्बसत्तमः॥
नाम-श्लोकName shloka 10
मालाकारः कृपाकारः कोकिलास्वरभूषणः। रामो नीलाम्बरो देवो हली दुर्दममर्दनः॥
नाम-श्लोकName shloka 11
सहस्राक्षपुरीभेत्ता महामारीविनाशनः। शिवः शिवतमो भेत्ता बलारातिप्रपूजकः॥
नाम-श्लोकName shloka 12
कुमारीवरदायी च वरेण्यो मीनकेतनः। नरो नारायणो धीरो राधापतिरुदारधीः॥
नाम-श्लोकName shloka 13
श्रीपतिः श्रीनिधिः श्रीमान् मापतिः प्रतिराजहा। वृन्दापतिः कुलग्रामी धामी ब्रह्म सनातनः॥
नाम-श्लोकName shloka 14
रेवतीरमणो रामश्चञ्चलश्चारुलोचनः। रामायणशरीरोऽयं रामी रामः श्रियःपतिः॥
नाम-श्लोकName shloka 15
शर्वरः शर्वरी शर्वः सर्वत्र शुभदायकः। राधाराधयितो राधी राधाचित्तप्रमोदकः॥
नाम-श्लोकName shloka 16
राधारतिसुखोपेतो राधामोहनतत्परः। राधावशीकरो राधाहृदयाम्भोजषट्पदः॥
नाम-श्लोकName shloka 17
राधालिङ्गनसम्मोहो राधानर्तनकौतुकः। राधासञ्जातसम्प्रीती राधाकामफलप्रदः॥
नाम-श्लोकName shloka 18
वृन्दापतिः कोशनिधिः कोकशोकविनाशकः। चन्द्रापतिश्चन्द्रपतिश्चण्डकोदण्डभञ्जनः॥
नाम-श्लोकName shloka 19
रामो दाशरथी रामो भृगुवंशसमुद्भवः। आत्मारामो जितक्रोधो मोहो मोहान्धभञ्जनः॥
नाम-श्लोकName shloka 20
वृषभानुर्भवो भावः काश्यपिः करुणानिधिः। कोलाहलो हली हाली हेली हलधरप्रियः॥
नाम-श्लोकName shloka 21
राधामुखाब्जमार्तण्डो भास्करो रविजो विधुः। विधिर्विधाता वरुणो वारुणो वारुणीप्रियः॥
नाम-श्लोकName shloka 22
रोहिणीहृदयानन्दी वसुदेवात्मजो बली। नीलाम्बरो रौहिणेयो जरासन्धवधोऽमलः॥
नाम-श्लोकName shloka 23
नागो नवाम्भो विरुदो वीरहा वरदो बली। गोपथो विजयी विद्वान् शिपिविष्टः सनातनः॥
नाम-श्लोकName shloka 24
पर्शुरामवचोग्राही वरग्राही शृगालहा। दमघोषोपदेष्टा च रथग्राही सुदर्शनः॥
नाम-श्लोकName shloka 25
वीरपत्नीयशस्त्राता जराव्याधिविघातकः। द्वारकावासतत्त्वज्ञो हुताशनवरप्रदः॥
नाम-श्लोकName shloka 26
यमुनावेगसंहारी नीलाम्बरधरः प्रभुः। विभुः शरासनो धन्वी गणेशो गणनायकः॥
नाम-श्लोकName shloka 27
लक्ष्मणो लक्षणो लक्ष्यो रक्षोवंशविनाशनः। वामनो वामनीभूतो वमनो वमनारुहः॥
नाम-श्लोकName shloka 28
यशोदानन्दनः कर्ता यमलार्जुनमुक्तिदः। उलूखली महामानी दामबद्धाह्वयी शमी॥
नाम-श्लोकName shloka 29
भक्तानुकारी भगवान् केशवोऽचलधारकः। केशिहा मधुहा मोही वृषासुरविघातकः॥
नाम-श्लोकName shloka 30
अघासुरविनाशी च पूतनामोक्षदायकः। कुब्जाविनोदी भगवान् कंसमृत्युर्महामखी॥
नाम-श्लोकName shloka 31
अश्वमेधो वाजपेयो गोमेधो नरमेधवान्। कन्दर्पकोटिलावण्यश्चन्द्रकोटिसुशीतलः॥
नाम-श्लोकName shloka 32
रविकोटिप्रतीकाशो वायुकोटिमहाबलः। ब्रह्मा ब्रह्माण्डकर्ता च कमलावाञ्छितप्रदः॥
नाम-श्लोकName shloka 33
कमला कमलाक्षश्च कमलामुखलोलुपः। कमलाव्रतधारी च कमलाभः पुरन्दरः॥
नाम-श्लोकName shloka 34
सौभाग्याधिकचित्तोऽयं महामायी महोत्कटः। तारकारिः सुरत्राता मारीचक्षोभकारकः॥
नाम-श्लोकName shloka 35
विश्वामित्रप्रियो दान्तो रामो राजीवलोचनः। लङ्काधिपकुलध्वंसी विभीषणवरप्रदः॥
नाम-श्लोकName shloka 36
सीतानन्दकरो रामो वीरो वारिधिबन्धनः। खरदूषणसंहारी साकेतपुरवासनः॥
नाम-श्लोकName shloka 37
चन्द्रावलीपतिः कूलः केशी कंसवधोऽमरः। माधवो मधुहा माध्वी माध्वीको माधवो मधुः॥
नाम-श्लोकName shloka 38
मुञ्जाटवीगाहमानो धेनुकारिर्धरात्मजः। वंशीवटविहारी च गोवर्धनवनाश्रयः॥
नाम-श्लोकName shloka 39
तथा तालवनोद्देशी भाण्डीरवनशंखहा। तृणावर्तकथाकारी वृषभानुसुतापतिः॥
नाम-श्लोकName shloka 40
राधाप्राणसमो राधावदनाब्जमधुव्रतः। गोपीरञ्जनदैवज्ञो लीलाकमलपूजितः॥
नाम-श्लोकName shloka 41
क्रीडाकमलसंदोहो गोपिकाप्रीतिरञ्जनः। रञ्जको रञ्जनो रङ्गो रङ्गी रङ्गमहीरुहः॥
नाम-श्लोकName shloka 42
कामः कामारिभक्तोऽयं पुराणपुरुषः कविः। नारदो देवलो भीमो बालो बालमुखाम्बुजः॥
नाम-श्लोकName shloka 43
अम्बुजो ब्रह्मसाक्षी च योगी दत्तवरो मुनिः। ऋषभः पर्वतो ग्रामो नदीपवनवल्लभः॥
नाम-श्लोकName shloka 44
पद्मनाभः सुरज्येष्ठो ब्रह्मा रुद्रोऽहिभूषितः। गणानां त्राणकर्ता च गणेशो ग्रहिलो ग्रही॥
नाम-श्लोकName shloka 45
गणाश्रयो गणाध्यक्षः क्रोडीकृतजगत्त्रयः। यादवेन्द्रो द्वारकेन्द्रो मथुरावल्लभो धुरी॥
नाम-श्लोकName shloka 46
भ्रमरः कुन्तली कुन्तीसुतरक्षी महामखी। यमुनावरदाता च काश्यपस्य वरप्रदः॥
नाम-श्लोकName shloka 47
शङ्खचूडवधोद्दामो गोपीरक्षणतत्परः। पाञ्चजन्यकरो रामी त्रिरामी वनजो जयः॥
नाम-श्लोकName shloka 48
फाल्गुनः फाल्गुनसखो विराधवधकारकः। रुक्मिणीप्राणनाथश्च सत्यभामाप्रियङ्करः॥
नाम-श्लोकName shloka 49
कल्पवृक्षो महावृक्षो दानवृक्षो महाफलः। अंकुशो भूसुरो भामो भामको भ्रामको हरिः॥
नाम-श्लोकName shloka 50
सरलः शाश्वतो वीरो यदुवंशी शिवात्मकः। प्रद्युम्नो बलकर्ता च प्रहर्ता दैत्यहा प्रभुः॥
नाम-श्लोकName shloka 51
महाधनो महावीरो वनमालाविभूषणः। तुलसीदामशोभाढ्यो जालन्धरविनाशनः॥
नाम-श्लोकName shloka 52
शूरः सूर्यो मृकण्डश्च भास्करो विश्वपूजितः। रविस्तमोहा वह्निश्च वाडवो वडवानलः॥
नाम-श्लोकName shloka 53
दैत्यदर्पविनाशी च गरुडो गरुडाग्रजः। गोपीनाथो महीनाथो वृन्दानाथोऽवरोधकः॥
नाम-श्लोकName shloka 54
प्रपञ्ची पञ्चरूपश्च लतागुल्मश्च गोपतिः। गङ्गा च यमुनारूपो गोदा वेत्रवती तथा॥
नाम-श्लोकName shloka 55
कावेरी नर्मदा तापी गण्डकी सरयूस्तथा। राजसस्तामसः सत्त्वी सर्वाङ्गी सर्वलोचनः॥
नाम-श्लोकName shloka 56
सुधामयोऽमृतमयो योगिनीवल्लभः शिवः। बुद्धो बुद्धिमतां श्रेष्ठो विष्णुर्जिष्णुः शचीपतिः॥
नाम-श्लोकName shloka 57
वंशी वंशधरो लोको विलोको मोहनाशनः। रवरावो रवो रावो बालो बालबलाहकः॥
नाम-श्लोकName shloka 58
शिवो रुद्रो नलो नीलो लाङ्गली लाङ्गलाश्रयः। पारदः पावनो हंसो हंसारूढो जगत्पतिः॥
नाम-श्लोकName shloka 59
मोहिनीमोहनो मायी महामायो महामखी। वृषो वृषाकपिः कालः कालीदमनकारकः॥
नाम-श्लोकName shloka 60
कुब्जाभाग्यप्रदो वीरो रजकक्षयकारकः। कोमलो वारुणो राजा जलजो जलधारकः॥
नाम-श्लोकName shloka 61
हारकः सर्वपापघ्नः परमेष्ठी पितामहः। खड्गधारी कृपाकारी राधारमणसुन्दरः॥
नाम-श्लोकName shloka 62
द्वादशारण्यसम्भोगी शेषनागफणालयः। कामः श्यामः सुखः श्रीदः श्रीपतिः श्रीनिधिः कृतिः॥
नाम-श्लोकName shloka 63
हरिर्हरो नरो नारो नरोत्तम इषुप्रियः। गोपालीचित्तहर्ता च कर्ता संसारतारकः॥
नाम-श्लोकName shloka 64
आदिदेवो महादेवो गौरीगुरुरनाश्रयः। साधुर्मधुर्विधुर्धाता भ्राता क्रूरपरायणः॥
नाम-श्लोकName shloka 65
रोलम्बी च हयग्रीवो वानरारिर्वनाश्रयः। वनं वनी वनाध्यक्षो महावन्द्यो महामुनिः॥
नाम-श्लोकName shloka 66
स्यमन्तकमणिप्राज्ञो विज्ञो विघ्नविघातकः। गोवर्द्धनो वर्द्धनीयो वर्द्धनी वर्द्धनप्रियः॥
नाम-श्लोकName shloka 67
वर्द्धन्यो वर्द्धनो वर्द्धी वार्द्धिन्यः सुमुखप्रियः। वर्द्धितो वृद्धको वृद्धो वृन्दारकजनप्रियः॥
नाम-श्लोकName shloka 68
गोपालरमणीभर्ता साम्बकुष्ठविनाशनः। रुक्मिणीहरणः प्रेम प्रेमी चन्द्रावलीपतिः॥
नाम-श्लोकName shloka 69
श्रीकर्ता विश्वभर्ता च नरो नारायणो बली। गणो गणपतिश्चैव दत्तात्रेयो महामुनिः॥
नाम-श्लोकName shloka 70
व्यासो नारायणो दिव्यो भव्यो भावुकधारकः। श्वःश्रेयसं शिवं भद्रं भावुकं भविकं शुभम्॥
नाम-श्लोकName shloka 71
शुभात्मकः शुभः शास्ता प्रशास्ता मेघनादहा। ब्रह्मण्यदेवो दीनानामुद्धारकरणक्षमः॥
नाम-श्लोकName shloka 72
कृष्णः कमलपत्राक्षः कृष्णः कमललोचनः। कृष्णः कामी सदाकृष्णः समस्तप्रियकारकः॥
नाम-श्लोकName shloka 73
नन्दो नन्दी महानन्दी मादी मादनकः किली। मिली हिली गिली गोली गोलो गोलालयो गुली॥
नाम-श्लोकName shloka 74
गुग्गुली मारकी शाखी वटः पिप्पलकः कृती। म्लेच्छहा कालहर्ता च यशोदायश एव च॥
नाम-श्लोकName shloka 75
अच्युतः केशवो विष्णुर्हरिः सत्यो जनार्दनः। हंसो नारायणो लीलो नीलो भक्तिपरायणः॥
नाम-श्लोकName shloka 76
जानकीवल्लभो रामो विरामो विघ्ननाशनः। सहस्रांशुर्महाभानुर्वीरबाहुर्महोदधिः॥
नाम-श्लोकName shloka 77
समुद्रोऽब्धिरकूपारः पारावारः सरित्पतिः। गोकुलानन्दकारी च प्रतिज्ञापरिपालकः॥
नाम-श्लोकName shloka 78
सदारामः कृपारामो महारामो धनुर्धरः। पर्वतः पर्वताकारो गयो गेयो द्विजप्रियः॥
नाम-श्लोकName shloka 79
कम्बलाश्वतरो रामो रामायणप्रवर्तकः। द्यौर्दिवो दिवसो दिव्यो भव्यो भाविभयापहः॥
नाम-श्लोकName shloka 80
पार्वतीभाग्यसहितो भ्राता लक्ष्मीविलासवान्। विलासी साहसी सर्वी गर्वी गर्वितलोचनः॥
नाम-श्लोकName shloka 81
मुरारिर्लोकधर्मज्ञो जीवनो जीवनान्तकः। यमो यमारिर्यमनो यामी यामविधायकः॥
नाम-श्लोकName shloka 82
वसुली पांसुली पांसुः पाण्डुरर्जुनवल्लभः। ललिताचन्द्रिकामाली माली मालाम्बुजाश्रयः॥
नाम-श्लोकName shloka 83
अम्बुजाक्षो महायक्षो दक्षश्चिन्तामणिः प्रभुः। मणिर्दिनमणिश्चैव केदारो बदराश्रयः॥
नाम-श्लोकName shloka 84
बदरीवनसम्प्रीतो व्यासः सत्यवतीसुतः। अमरारिनिहन्ता च सुधासिन्धुर्विधूदयः॥
नाम-श्लोकName shloka 85
चन्द्रो रविः शिवः शूली चक्री चैव गदाधरः। श्रीकर्ता श्रीपतिः श्रीदः श्रीदेवो देवकीसुतः॥
नाम-श्लोकName shloka 86
श्रीपतिः पुण्डरीकाक्षः पद्मनाभो जगत्पतिः। वासुदेवोऽप्रमेयात्मा केशवो गरुडध्वजः॥
नाम-श्लोकName shloka 87
नारायणः परंधाम देवदेवो महेश्वरः। चक्रपाणिः कलापूर्णो वेदवेद्यो दयानिधिः॥
नाम-श्लोकName shloka 88
भगवान् सर्वभूतेशो गोपालः सर्वपालकः। अनन्तो निर्गुणोऽनन्तो निर्विकल्पो निरञ्जनः॥
नाम-श्लोकName shloka 89
निराधारो निराकारो निराभासो निराश्रयः। पुरुषः प्रणवातीतो मुकुन्दः परमेश्वरः॥
नाम-श्लोकName shloka 90
क्षणावनिः सार्वभौमो वैकुण्ठो भक्तवत्सलः। विष्णुर्दामोदरः कृष्णो माधवो मथुरापतिः॥
नाम-श्लोकName shloka 91
देवकीगर्भसम्भूतो यशोदावत्सलो हरिः। शिवः संकर्षणः शम्भुर्भूतनाथो दिवस्पतिः॥
नाम-श्लोकName shloka 92
अव्ययः सर्वधर्मज्ञो निर्मलो निरुपद्रवः। निर्वाणनायको नित्यो नीलजीमूतसंनिभः॥
नाम-श्लोकName shloka 93
कलाक्षयश्च सर्वज्ञः कमलारूपतत्परः। हृषीकेशः पीतवासो वसुदेवप्रियात्मजः॥
नाम-श्लोकName shloka 94
नन्दगोपकुमारार्यो नवनीताशनः प्रभुः। पुराणपुरुषः श्रेष्ठः शङ्खपाणिः सुविक्रमः॥
नाम-श्लोकName shloka 95
अनिरुद्धश्चक्ररथः शार्ङ्गपाणिश्चतुर्भुजः। गदाधरः सुरार्तिघ्नो गोविन्दो नन्दकायुधः॥
नाम-श्लोकName shloka 96
वृन्दावनचरः शौरिर्वेणुवाद्यविशारदः। तृणावर्तान्तको भीमो साहसो बहुविक्रमः॥
नाम-श्लोकName shloka 97
शकटासुरसंहारी बकासुरविनाशनः। धेनुकासुरसंघातः पूतनारिर्नृकेसरी॥
नाम-श्लोकName shloka 98
पितामहो गुरुः साक्षी प्रत्यगात्मा सदाशिवः। अप्रमेयः प्रभुः प्राज्ञोऽप्रतर्क्यः स्वप्नवर्द्धनः॥
नाम-श्लोकName shloka 99
धन्यो मान्यो भवो भावो धीरः शान्तो जगद्गुरुः। अन्तर्यामीश्वरो दिव्यो दैवज्ञो देवतागुरुः॥
नाम-श्लोकName shloka 100
क्षीराब्धिशयनो धाता लक्ष्मीवाँल्लक्ष्मणाग्रजः। धात्रीपतिरमेयात्मा चन्द्रशेखरपूजितः॥
नाम-श्लोकName shloka 101
लोकसाक्षी जगच्चक्षुः पुण्यचारित्रकीर्तनः। कोटिमन्मथसौन्दर्यो जगन्मोहनविग्रहः॥
नाम-श्लोकName shloka 102
मन्दस्मिततमो गोपो गोपिकापरिवेष्टितः। फुल्लारविन्दनयनश्चाणूरान्ध्रनिषूदनः॥
नाम-श्लोकName shloka 103
इन्दीवरदलश्यामो बर्हिबर्हावतंसकः। मुरलीनिनदाह्लादो दिव्यमाल्याम्बराश्रयः॥
नाम-श्लोकName shloka 104
सुकपोलयुगः सुभ्रूयुगलः सुललाटकः। कम्बुग्रीवो विशालाक्षो लक्ष्मीवान् शुभलक्षणः॥
नाम-श्लोकName shloka 105
पीनवक्षाश्चतुर्बाहुश्चतुर्मूर्तिस्त्रिविक्रमः। कलङ्करहितः शुद्धो दुष्टशत्रुनिबर्हणः॥
नाम-श्लोकName shloka 106
किरीटकुण्डलधरः कटकाङ्गदमण्डितः। मुद्रिकाभरणोपेतः कटिसूत्रविराजितः॥
नाम-श्लोकName shloka 107
मञ्जीररञ्जितपदः सर्वाभरणभूषितः। विन्यस्तपादयुगलो दिव्यमङ्गलविग्रहः॥
नाम-श्लोकName shloka 108
गोपिकानयनानन्दः पूर्णचन्द्रनिभाननः। समस्तजगदानन्दः सुन्दरो लोकनन्दनः॥
नाम-श्लोकName shloka 109
यमुनातीरसञ्चारी राधामन्मथवैभवः। गोपनारीप्रियो दान्तो गोपीवस्त्रापहारकः॥
नाम-श्लोकName shloka 110
शृङ्गारमूर्तिः श्रीधामा तारको मूलकारणम्। सृष्टिसंरक्षणोपायः क्रूरासुरविभञ्जनः॥
नाम-श्लोकName shloka 111
नरकासुरहारी च मुरारिर्वैरिमर्दनः। आदितेयप्रियो दैत्यभीकरश्चेन्दुशेखरः॥
नाम-श्लोकName shloka 112
जरासन्धकुलध्वंसी कंसारातिः सुविक्रमः। पुण्यश्लोकः कीर्तनीयो यादवेन्द्रो जगन्नुतः॥
नाम-श्लोकName shloka 113
रुक्मिणीरमणः सत्यभामाजाम्बवतीप्रियः। मित्रविन्दानाग्नजितीलक्ष्मणासमुपासितः॥
नाम-श्लोकName shloka 114
सुधाकरकुले जातोऽनन्तप्रबलविक्रमः। सर्वसौभाग्यसम्पन्नो द्वारकायामुपस्थितः॥
नाम-श्लोकName shloka 115
भद्रासूर्यसुतानाथो लीलामानुषविग्रहः। सहस्रषोडशस्त्रीशो भोगमोक्षैकदायकः॥
नाम-श्लोकName shloka 116
वेदान्तवेद्यः संवेद्यो वैद्यब्रह्माण्डनायकः। गोवर्द्धनधरो नाथः सर्वजीवदयापरः॥
नाम-श्लोकName shloka 117
मूर्तिमान् सर्वभूतात्मा आर्तत्राणपरायणः। सर्वज्ञः सर्वसुलभः सर्वशास्त्रविशारदः॥
नाम-श्लोकName shloka 118
षड्गुणैश्वर्यसम्पन्नः पूर्णकामो धुरन्धरः। महानुभावः कैवल्यदायको लोकनायकः॥
नाम-श्लोकName shloka 119
आदिमध्यान्तरहितः शुद्धसात्त्विकविग्रहः। असमानः समस्तात्मा शरणागतवत्सलः॥
नाम-श्लोकName shloka 120
उत्पत्तिस्थितिसंहारकारणं सर्वकारणम्। गम्भीरः सर्वभावज्ञः सच्चिदानन्दविग्रहः॥
नाम-श्लोकName shloka 121
विष्वक्सेनः सत्यसन्धः सत्यवान् सत्यविक्रमः। सत्यव्रतः सत्यसंज्ञः सर्वधर्मपरायणः॥
नाम-श्लोकName shloka 122
आपन्नार्तिप्रशमनो द्रौपदीमानरक्षकः। कन्दर्पजनकः प्राज्ञो जगन्नाटकवैभवः॥
नाम-श्लोकName shloka 123
भक्तिवश्यो गुणातीतः सर्वैश्वर्यप्रदायकः। दमघोषसुतद्वेषी बाणबाहुविखण्डनः॥
नाम-श्लोकName shloka 124
भीष्मभक्तिप्रदो दिव्यः कौरवान्वयनाशनः। कौन्तेयप्रियबन्धुश्च पार्थस्यन्दनसारथिः॥
नाम-श्लोकName shloka 125
नारसिंहो महावीरः स्तम्भजातो महाबलः। प्रह्लादवरदः सत्यो देवपूज्योऽभयङ्करः॥
नाम-श्लोकName shloka 126
उपेन्द्र इन्द्रावरजो वामनो बलिबन्धनः। गजेन्द्रवरदः स्वामी सर्वदेवनमस्कृतः॥
नाम-श्लोकName shloka 127
शेषपर्यङ्कशयनो वैनतेयरथो जयी। अव्याहतबलैश्वर्यसम्पन्नः पूर्णमानसः॥
नाम-श्लोकName shloka 128
योगेश्वरेश्वरः साक्षी क्षेत्रज्ञो ज्ञानदायकः। योगिहृत्पङ्कजावासो योगमायासमन्वितः॥
नाम-श्लोकName shloka 129
नादबिन्दुकलातीतश्चतुर्वर्गफलप्रदः। सुषुम्णामार्गसञ्चारी देहस्यान्तरसंस्थितः॥
नाम-श्लोकName shloka 130
देहेन्द्रियमनःप्राणसाक्षी चेतः प्रसादकः। सूक्ष्मः सर्वगतो देही ज्ञानदर्पणगोचरः॥
नाम-श्लोकName shloka 131
तत्त्वत्रयात्मकोऽव्यक्तः कुण्डलीसमुपाश्रितः। ब्रह्मण्यः सर्वधर्मज्ञः शान्तो दान्तो गतक्लमः॥
नाम-श्लोकName shloka 132
श्रीनिवासः सदानन्दो विश्वमूर्तिर्महाप्रभुः। सहस्रशीर्षा पुरुषः सहस्राक्षः सहस्रपात्॥
नाम-श्लोकName shloka 133
समस्तभुवनाधारः समस्तप्राणरक्षकः। समस्तसर्वभावज्ञो गोपिकाप्राणवल्लभः॥
नाम-श्लोकName shloka 134
नित्योत्सवो नित्यसौख्यो नित्यश्रीर्नित्यमङ्गलः। व्यूहार्चितो जगन्नाथः श्रीवैकुण्ठपुराधिपः॥
नाम-श्लोकName shloka 135
पूर्णानन्दघनीभूतो गोपवेषधरो हरिः। कलापकुसुमश्यामः कोमलः शान्तविग्रहः॥
नाम-श्लोकName shloka 136
गोपाङ्गनावृतोऽनन्तो वृन्दावनसमाश्रयः। वेणुवादरतः श्रेष्ठो देवानां हितकारकः॥
नाम-श्लोकName shloka 137
बालक्रीडासमासक्तो नवनीतस्य तस्करः। गोपालकामिनीजारश्चोरजारशिखामणिः॥
नाम-श्लोकName shloka 138
परंज्योतिः पराकाशः परावासः परिस्फुटः। अष्टादशाक्षरो मन्त्रो व्यापको लोकपावनः॥
नाम-श्लोकName shloka 139
सप्तकोटिमहामन्त्रशेखरो देवशेखरः। विज्ञानज्ञानसन्धानस्तेजोराशिर्जगत्पतिः॥
नाम-श्लोकName shloka 140
भक्तलोकप्रसन्नात्मा भक्तमन्दारविग्रहः। भक्तदारिद्र्यदमनो भक्तानां प्रीतिदायकः॥
नाम-श्लोकName shloka 141
भक्ताधीनमनाः पूज्यो भक्तलोकशिवङ्करः। भक्ताभीष्टप्रदः सर्वभक्ताघौघनिकृन्तनः॥
नाम-श्लोकName shloka 142
अपारकरुणासिन्धुर्भगवान् भक्ततत्परः॥
फलश्रुतिPhalashruti 1
इति श्रीराधिकानाथसहस्रं नामकीर्तनम्। स्मरणात् पापराशीनां खण्डनं मृत्युनाशनम्॥
यह श्रीराधिकानाथ (राधा के स्वामी, श्रीकृष्ण) के हज़ार नामों का कीर्तन है। इसका स्मरण पापों के ढेर को काट देता है और मृत्यु का नाश करने वाला है।Such is the singing of the thousand names of Shri Radhikanatha (Radha's lord, Krishna). Remembering it cuts through heaps of sin and destroys death.
फलश्रुतिPhalashruti 2
वैष्णवानां प्रियकरं महारोगनिवारणम्। ब्रह्महत्या सुरापानं परस्त्रीगमनं तथा॥
यह वैष्णवों को प्रिय है और बड़े रोगों को दूर करने वाला है। ब्रह्महत्या, मदिरापान, पराई स्त्री से सम्बन्ध, —It is dear to the Vaishnavas and wards off grave illness. The killing of a brahmin, drinking liquor, going to another man's wife, —
फलश्रुतिPhalashruti 3
परद्रव्यापहरणं परद्वेषसमन्वितम्। मानसं वाचिकं कायं यत्पापं पापसम्भवम्॥
— पराया धन हरना, दूसरों से द्वेष रखना, और मन, वाणी तथा शरीर से हुआ जो भी पाप है और पाप से उपजा जो भी पाप है, —— taking what belongs to others, harbouring hatred of others, and whatever sin is committed in mind, speech or body, and whatever sin springs from sin, —
फलश्रुतिPhalashruti 4
सहस्रनामपठनात् सर्वं नश्यति तत्क्षणात्। महादारिद्र्ययुक्तो यो वैष्णवो विष्णुभक्तिमान्॥
— वह सब सहस्रनाम के पाठ से उसी क्षण नष्ट हो जाता है। जो वैष्णव भारी दरिद्रता में हो और विष्णु का भक्त हो, —— all of it perishes at once through reading the thousand names. A Vaishnava devoted to Vishnu who is in deep poverty —
फलश्रुतिPhalashruti 5
कार्तिक्यां सम्पठेद्रात्रौ शतमष्टोत्तरं क्रमात्। पीताम्बरधरो धीमान् सुगन्धिपुष्पचन्दनैः॥
— वह कार्तिक पूर्णिमा की रात को क्रम से एक सौ आठ बार इसका पाठ करे; बुद्धिमान साधक पीला वस्त्र पहनकर, सुगन्धित फूलों और चन्दन से —— should, on the night of Kartika Purnima, recite it a hundred and eight times in order: wise, dressed in yellow, with fragrant flowers and sandal paste —
फलश्रुतिPhalashruti 6
पुस्तकं पूजयित्वा तु नैवेद्यादिभिरेव च। राधाध्यानाङ्कितो धीरो वनमालाविभूषितः॥
— और नैवेद्य आदि से (इस स्तोत्र की) पुस्तक की पूजा करके, राधा के ध्यान में लीन, धीर होकर और वनमाला (वन के फूलों की माला) पहनकर (पाठ करे)।— having worshipped the book (of this hymn) with food offerings and the rest, steady, absorbed in meditation on Radha and wearing a garland of forest flowers (vanamala).
फलश्रुतिPhalashruti 7
शतमष्टोत्तरं देवि पठेन्नामसहस्रकम्। तुलसीमालया युक्तो वैष्णवो भक्तितत्परः॥
हे देवी, भक्ति में तत्पर वैष्णव तुलसी की माला लेकर इस सहस्रनाम का एक सौ आठ बार पाठ करे।Goddess, a Vaishnava intent on devotion, wearing a tulasi mala, should read the thousand names a hundred and eight times.
फलश्रुतिPhalashruti 8
रविवारे च शुक्रे च द्वादश्यां श्राद्धवासरे। ब्राह्मणं पूजयित्वा च भोजयित्वा विधानतः॥
रविवार, शुक्रवार, द्वादशी और श्राद्ध के दिन विधिपूर्वक ब्राह्मण का पूजन करके और उन्हें भोजन कराकर —On a Sunday, a Friday, a dvadashi and the day of a shraddha, having honoured a brahmin and given a meal as the rite prescribes —
फलश्रुतिPhalashruti 9
यः पठेद्वैष्णवो नित्यं स याति हरिमन्दिरम्। कृष्णेनोक्तं राधिकायै मयि प्रोक्तं पुरा शिवे॥
— जो वैष्णव नित्य इसका पाठ करता है, वह हरि के धाम को जाता है। हे शिवे (पार्वती), इसे पहले श्रीकृष्ण ने राधिका को सुनाया था और मुझे भी बताया गया था।— the Vaishnava who reads it daily goes to the abode of Hari. Auspicious one (Parvati), long ago Krishna spoke it to Radhika, and it was told to me as well.
फलश्रुतिPhalashruti 10
नारदाय मया प्रोक्तं नारदेन प्रकाशितम्। मया त्वयि वरारोहे प्रोक्तमेतत्सुदुर्लभम्॥
मैंने इसे नारद को बताया और नारद ने इसे लोक में प्रकट किया। हे वरारोहे (सुन्दरी), यह अत्यन्त दुर्लभ स्तोत्र अब मैंने तुम्हें सुनाया है।I told it to Narada, and Narada made it known. Fair one, this most rare hymn I have now told to you.
फलश्रुतिPhalashruti 11
गोपनीयं प्रयत्नेन न प्रकाश्यं कथञ्चन। शठाय पापिने चैव लम्पटाय विशेषतः॥
इसे यत्न से गुप्त रखना चाहिए और किसी भी तरह प्रकट नहीं करना चाहिए, विशेषकर धूर्त, पापी और लम्पट (विषयों में डूबे) व्यक्ति के आगे।It is to be guarded with care and never laid open in any way, above all before a cheat, a wrongdoer or a lecher.
फलश्रुतिPhalashruti 12
न दातव्यं न दातव्यं न दातव्यं कदाचन। देयं शिष्याय शान्ताय विष्णुभक्तिरताय च॥
इसे (ऐसे लोगों को) कभी नहीं देना चाहिए, नहीं देना चाहिए, नहीं देना चाहिए। यह शान्त शिष्य को और विष्णु-भक्ति में लगे व्यक्ति को देना चाहिए।It must never be given (to such people): never, never. It may be given to a calm disciple and to one devoted to Vishnu.
फलश्रुतिPhalashruti 13
गोदानब्रह्मयज्ञादेर्वाजपेयशतस्य च। अश्वमेधसहस्रस्य फलं पाठे भवेद् ध्रुवम्॥
गोदान, ब्रह्मयज्ञ (वेद-पाठ) आदि का, सौ वाजपेय यज्ञों का और हज़ार अश्वमेध यज्ञों का जो फल है, वह इसके पाठ से निश्चय ही मिलता है।The fruit of giving cows, of the brahma-yajna (study of the Veda) and the like, of a hundred Vajapeya sacrifices and of a thousand Ashvamedhas, is surely found in reading this.
फलश्रुतिPhalashruti 14
एकादश्यां नरः स्नात्वा सुगन्धिद्रव्यतैलकैः। आहारं ब्राह्मणे दत्त्वा दक्षिणां स्वर्णभूषणम्॥
एकादशी के दिन जो मनुष्य सुगन्धित द्रव्यों और तेलों से स्नान करके, ब्राह्मण को भोजन और दक्षिणा में सोने का आभूषण देकर —The person who, on an Ekadashi, bathes with fragrant substances and oils, gives a brahmin a meal and, as dakshina, an ornament of gold, —
फलश्रुतिPhalashruti 15
तत आरम्भकर्ताऽस्मात् सर्वं प्राप्नोति मानवः। शतावृत्तं सहस्रं च यः पठेद्वैष्णवो जनः॥
— फिर इसका पाठ आरम्भ करता है, वह मनुष्य इससे सब कुछ पाता है। जो वैष्णव जन इस सहस्रनाम की सौ बार आवृत्ति करता है, —— and then begins the recitation, gains everything from it. The Vaishnava who reads the thousand names a hundred times over —
फलश्रुतिPhalashruti 16
श्रीवृन्दावनचन्द्रस्य प्रसादात् सर्वमाप्नुयात्। यद्गृहे पुस्तकं देवि पूजितं चैव तिष्ठति॥
— वह श्रीवृन्दावनचन्द्र (वृन्दावन के चन्द्रमा, श्रीकृष्ण) की कृपा से सब कुछ पाता है। हे देवी, जिस घर में (इस स्तोत्र की) पुस्तक पूजित होकर रखी रहती है, —— gains everything by the grace of Shri Vrindavanachandra (the moon of Vrindavana, Krishna). Goddess, the house in which the book (of this hymn) is kept and worshipped —
फलश्रुतिPhalashruti 17
न मारी न च दुर्भिक्षं नोपसर्गभयं क्वचित्। सर्पादिभूतयक्षाद्या नश्यन्ति नात्र संशयः॥
— वहाँ न महामारी होती है, न अकाल, न कहीं किसी उपद्रव का भय; साँप आदि, भूत और यक्ष आदि (की बाधाएँ) नष्ट हो जाती हैं, इसमें संशय नहीं।— knows no epidemic, no famine and no fear of calamity anywhere; snakes and the like, spirits, yakshas and such are driven away, of this there is no doubt.
फलश्रुतिPhalashruti 18
श्रीगोपालो महादेवि वसेत् तस्य गृहे सदा। गृहे यत्र सहस्रं च नाम्नां तिष्ठति पूजितम्॥
हे महादेवी, जिस घर में (गोपाल के) हज़ार नाम पूजित होकर रहते हैं, उस (व्यक्ति) के घर में श्रीगोपाल सदा निवास करते हैं।Great goddess, Shri Gopala lives for ever in the home of the one in whose house the thousand names are kept and worshipped.
यह स्तोत्र कहाँ से हैWhere it comes from
गीता प्रेस के छपे पाठ की समाप्ति-पंक्ति के अनुसार यह सहस्रनाम सम्मोहन तन्त्र में पार्वती और ईश्वर के संवाद के रूप में आता है। कैलास पर पार्वती शिव से पूछती हैं कि जब ब्रह्मा, विष्णु और सब देवता उन्हीं की पूजा करते हैं, तो वे स्वयं प्रतिदिन किसका स्तोत्र पढ़ते हैं। शिव पहले इसे परम रहस्य बताते हैं और फिर कहते हैं कि वे उस श्यामल, उज्ज्वल और सनातन ज्योति का चिन्तन करते हैं जो गोपाल बनकर वृन्दावन में प्रकट हुई।
पूर्वभाग इस स्तोत्र की परम्परा भी बताता है। कार्तिक पूर्णिमा की रात रास-मण्डल में राधा ने अपने और कृष्ण के बीच के भेद के विषय में प्रश्न किया; उत्तर यह है कि एक ही ज्योति राधा और माधव के दो रूपों में प्रकट हुई, और इसी कारण गोपाल ने स्वयं ये नाम कहे। स्तोत्र के अनुसार श्रीकृष्ण ने इसे राधा को और नारद को सुनाया, शिव ने भी इसे पाया और नारद को बताया, नारद ने इसे लोक में प्रकट किया, और अब शिव इसे पार्वती को सुना रहे हैं।
According to the closing line of the Gita Press text, this sahasranama comes from the Sammohana Tantra, as a dialogue between Parvati and Ishvara. On Kailasa, Parvati asks Shiva: if Brahma, Vishnu and all the gods worship him, whose hymn does he himself recite every day? Shiva first calls it the highest secret, then says that he meditates on the dark, radiant and eternal light that appeared in Vrindavana as Gopala.
The opening dialogue also gives the hymn's lineage. On the Kartika full-moon night, in the circle of the rasa dance, Radha asked about the difference between herself and Krishna; the answer is that one light appeared in two forms, Radha and Madhava, and that is why Gopala himself spoke these names. According to the hymn, Krishna told it to Radha and to Narada, Shiva too received it and passed it to Narada, Narada made it known in the world, and now Shiva tells it to Parvati.
नामों का पाठ कैसे करेंHow the names are read
पाठ तीन भागों में छपा है। पहले 23 श्लोकों का पूर्वभाग है, जिसमें पार्वती का प्रश्न और शिव का उत्तर है; फिर विनियोग, करन्यास, हृदयादि-न्यास और दो ध्यान-श्लोक आते हैं। इसके बाद 'ॐ क्लीं देवः कामदेवः' से नाम आरम्भ होते हैं और 142 नाम-श्लोकों तक चलते हैं; अन्तिम नाम-श्लोक आधा है और 'अपारकरुणासिन्धुर्भगवान् भक्ततत्परः' पर समाप्त होता है। अन्त में 18 श्लोकों की फलश्रुति है, जो 'इति श्रीराधिकानाथसहस्रं नामकीर्तनम्' से शुरू होती है। छपे पाठ की तरह इस पृष्ठ पर भी हर भाग की गिनती फिर से एक से शुरू होती है।
नाम-श्लोकों में प्रायः हर शब्द भगवान् का एक नाम है, जो प्रथमा विभक्ति में आता है (जैसे गोपालः, गोविन्दः), और श्लोक को लगातार पढ़ने पर नामों की माला-सी बनती है। कई नाम एक से अधिक बार आते हैं, और कुछ नाम दूसरे देवताओं और नदियों के भी हैं (शिव, गणेश, ब्रह्मा, गंगा, यमुना), क्योंकि स्तोत्र गोपाल को सब रूपों का मूल मानता है। नामावली वह अलग रूप है जिसमें हर नाम को चतुर्थी विभक्ति में 'ॐ … नमः' के साथ बोला जाता है (जैसे ॐ गोपालाय नमः), प्रायः अर्चना में फूल या तुलसी चढ़ाते हुए; यह पृष्ठ केवल स्तोत्र का पाठ देता है, नामावली नहीं।
कुछ प्रसिद्ध नाम और उनके अर्थ: गोपाल (नाम-श्लोक 1, गायों का पालन और रक्षा करने वाले), गोविन्द (4, गायों के रक्षक और उन्हें आनन्द देने वाले), राधापति (12, राधा के स्वामी), यशोदानन्दन (28, यशोदा को आनन्द देने वाले उनके पुत्र), माधव (37, लक्ष्मी के पति), देवकीसुत (85, देवकी के पुत्र), पुण्डरीकाक्ष (86, कमल जैसे नेत्रों वाले), दामोदर (90, जिनकी कमर यशोदा ने रस्सी से बाँधी), वृन्दावनचर (96, वृन्दावन में विचरने वाले), गोवर्द्धनधर (116, गोवर्धन पर्वत उठाने वाले), वेणुवादरत (136, वंशी बजाने में आनन्द लेने वाले) और नवनीतस्य तस्कर (137, माखन चुराने वाले)।
The text is printed in three parts. First comes the opening dialogue (purva-bhaga) of 23 shlokas, with Parvati's question and Shiva's answer; then the viniyoga, the karanyasa, the hridayadi nyasa and two dhyana verses. The names then begin with ॐ क्लीं देवः कामदेवः and run through 142 name shlokas; the last name shloka is a half-shloka ending अपारकरुणासिन्धुर्भगवान् भक्ततत्परः. Last comes the phalashruti of 18 shlokas, which opens with इति श्रीराधिकानाथसहस्रं नामकीर्तनम्. As in the print, the count starts again from one in each part on this page.
In the name shlokas almost every word is one name of the Lord, in the nominative case (such as Gopalah, Govindah), and reading a shloka straight through strings the names like a garland. Several names come more than once, and some belong to other deities and to rivers (Shiva, Ganesha, Brahma, the Ganga, the Yamuna), because the hymn sees Gopala as the source of every form. A namavali is a different form, in which each name is said in the dative with ॐ … नमः (for example ॐ गोपालाय नमः), usually while offering a flower or a tulasi leaf in archana; this page gives the hymn itself, not a namavali.
Some well-known names and what they mean: Gopala (name shloka 1, the one who tends and protects the cows), Govinda (4, protector of the cows and the one who delights them), Radhapati (12, Radha's lord), Yashodanandana (28, Yashoda's son, her joy), Madhava (37, the husband of Lakshmi), Devakisuta (85, Devaki's son), Pundarikaksha (86, lotus-eyed), Damodara (90, the one whose waist Yashoda tied with a rope), Vrindavanachara (96, the one who roams Vrindavana), Govardhanadhara (116, the lifter of Mount Govardhana), Venuvadarata (136, the one who delights in playing the flute) and Navanitasya taskara (137, the butter thief).
पाठ विधिHow to read it
स्नान करके, स्वच्छ स्थान पर राधा-कृष्ण या बाल गोपाल के चित्र या विग्रह के सामने दीपक जलाकर बैठें। पहले पूर्वभाग पढ़ा जाता है, फिर विनियोग, करन्यास और हृदयादि-न्यास, फिर दोनों ध्यान-श्लोक, उसके बाद 142 नाम-श्लोक और अन्त में फलश्रुति। जिन्हें न्यास की विधि नहीं आती, वे बहुत-से भक्तों की तरह ध्यान-श्लोक पढ़कर सीधे नाम पढ़ सकते हैं।
फलश्रुति स्वयं पाठ की कुछ रीतियाँ बताती है: तुलसी की माला, पीला वस्त्र, सुगन्धित फूल और चन्दन, नैवेद्य से पुस्तक की पूजा, और पाठ के समय राधा का ध्यान। विशेष अवसरों पर, जैसे कार्तिक पूर्णिमा की रात, यह एक सौ आठ बार पाठ की बात करती है; रोज़ के लिए एक पूरा पाठ पर्याप्त माना जाता है।
पूर्वभाग और फलश्रुति बार-बार कहते हैं कि यह स्तोत्र धूर्त, दम्भी और लोभी व्यक्ति को न दिया जाए और शान्त, भक्त व्यक्ति को दिया जाए। परम्परा इसका अर्थ यह लेती है कि इसका पाठ विनय और भक्ति से किया जाए, दिखावे के लिए नहीं।
After a bath, sit in a clean place before a picture or image of Radha and Krishna or of the child Gopala, with a lamp lit. The opening dialogue is read first, then the viniyoga, the karanyasa and the hridayadi nyasa, then the two dhyana verses, then the 142 name shlokas and last the phalashruti. Those who do not know how to do the nyasas can, like many devotees, read the dhyana verses and go straight on to the names.
The phalashruti itself describes some customs of the reading: a tulasi mala, yellow clothes, fragrant flowers and sandal paste, worship of the book with food offerings, and meditation on Radha during the reading. For special occasions, such as the night of Kartika Purnima, it speaks of a hundred and eight readings; for daily practice one full reading is considered enough.
The opening dialogue and the phalashruti say again and again that the hymn is not to be given to the cunning, the hypocritical or the greedy, and is to be given to the calm and the devoted. Tradition takes this to mean that it should be read with humility and devotion, not for show.
महत्व और फलMeaning and fruit
इस स्तोत्र का केन्द्रीय विचार पूर्वभाग में है: राधा और कृष्ण एक ही ज्योति हैं। शिव कहते हैं कि वे इसी श्यामल, उज्ज्वल ज्योति का ध्यान करते हैं, और गौर तेज (राधा) को छोड़कर केवल श्याम तेज (कृष्ण) की उपासना को वे दोष बताते हैं। इसीलिए इस सहस्रनाम में राधा से जुड़े नामों की लम्बी शृंखला है (नाम-श्लोक 15 से 17) और फलश्रुति पाठ के समय राधा के ध्यान की बात करती है।
फलश्रुति के अनुसार इस पाठ से पापों का नाश, बड़े रोगों का निवारण, दरिद्रता से मुक्ति और बड़े यज्ञों के बराबर फल मिलता है, और जिस घर में यह पुस्तक पूजित होकर रहती है वहाँ गोपाल सदा निवास करते हैं। ये श्रद्धा के कथन हैं; पाठ से मन को शान्ति और भक्ति में स्थिरता मिलती है, यह अधिकतर पाठक अनुभव करते हैं।
The heart of the hymn is in its opening dialogue: Radha and Krishna are one light. Shiva says that this dark, radiant light is what he meditates on, and he calls it a fault to worship the dark radiance (Krishna) while leaving out the fair radiance (Radha). That is why this sahasranama has a long run of names tied to Radha (name shlokas 15 to 17), and why the phalashruti asks for meditation on Radha during the reading.
According to the phalashruti, the reading destroys sin, wards off grave illness, lifts poverty and brings fruit equal to great sacrifices, and Gopala lives for ever in the house where the book is kept and worshipped. These are statements of faith; what most readers find is peace of mind and steadiness in devotion.
कब पढ़ेंWhen to read
रोज़ प्रातः या संध्या को, स्नान के बाद। फलश्रुति एकादशी, द्वादशी, रविवार, शुक्रवार और कार्तिक पूर्णिमा की रात को विशेष बताती है; परम्परा में जन्माष्टमी, राधाष्टमी और पूरे कार्तिक मास में भी इसका पाठ किया जाता है।Daily, in the morning or evening, after a bath. The phalashruti singles out Ekadashi, dvadashi, Sundays, Fridays and the night of Kartika Purnima; by custom it is also read on Janmashtami, on Radhashtami and through the month of Kartika.
कुंडली मेंIn your kundli
गोपाल सहस्रनाम को चन्द्र और शुक्र से जोड़ा जाता है। स्तोत्र श्रीकृष्ण को चन्द्रवंश में जन्मा बताता है (नाम-श्लोक 114: सुधाकरकुले जातो), विनियोग में कीलक 'चन्द्र' है और उन्हें कृष्णचन्द्र तथा वृन्दावनचन्द्र कहा गया है; शुक्र प्रेम, सौन्दर्य, संगीत और रास का ग्रह है, और फलश्रुति शुक्रवार को पाठ का विशेष दिन बताती है। इसलिए यह पाठ तब सुझाया जाता है जब कुंडली में चन्द्रमा नीच (वृश्चिक), क्षीण या राहु, केतु अथवा शनि से पीड़ित हो, जब शुक्र नीच (कन्या), अस्त या पीड़ित हो, और जब चन्द्र या शुक्र की महादशा-अन्तर्दशा में मन की अशान्ति या घर-परिवार और सम्बन्धों में उलझन हो। यह पाठ मन को स्थिर करने और भक्ति में लगाने का साधन है; डॉक्टर, वकील या व्यावहारिक सावधानी की जगह नहीं लेता। अपनी कुंडली में चन्द्र और शुक्र की स्थिति और चल रही दशा इसी साइट पर कुंडली बनाकर देखी जा सकती है।The Gopal Sahasranama is linked with the Moon and Venus. The hymn speaks of Krishna as born in the lunar line (name shloka 114: सुधाकरकुले जातो), its viniyoga names the Moon (Chandra) as its kilaka, and it calls him Krishnachandra and Vrindavanachandra; Venus is the planet of love, beauty, music and the rasa dance, and the phalashruti names Friday as a special day for the reading. So the hymn is suggested when the Moon in the kundli is debilitated (in Scorpio), waning or afflicted by Rahu, Ketu or Saturn, when Venus is debilitated (in Virgo), combust or afflicted, and during a Moon or Venus mahadasha or antardasha that brings unrest of mind or tangles at home and in relationships. The reading is a way to steady the mind and turn it to devotion; it does not take the place of a doctor, a lawyer or practical care. The Moon and Venus in your own chart, and the dasha now running, can be seen by building your kundli on this site.
ग्रह: Grahas: चन्द्रMoon, शुक्रVenus
अपनी कुंडली में देखेंCheck it in your kundliप्रश्नोत्तरQuestions people ask
- गोपाल सहस्रनाम किस ग्रन्थ से है?Which scripture does the Gopal Sahasranama come from?
- इसकी समाप्ति-पंक्ति के अनुसार यह सम्मोहन तन्त्र में पार्वती और ईश्वर (शिव) के संवाद का अंश है। स्तोत्र स्वयं कहता है कि इसे श्रीकृष्ण ने राधा को सुनाया, शिव ने नारद को बताया और नारद ने इसे लोक में प्रकट किया; इसके रचयिता का नाम ज्ञात नहीं है।Its closing line places it in the Sammohana Tantra, as part of a dialogue between Parvati and Ishvara (Shiva). The hymn itself says that Krishna told it to Radha, Shiva passed it to Narada and Narada made it known in the world; its author is not known.
- गोपाल सहस्रनाम कब और कितनी बार पढ़ना चाहिए?When, and how many times, should the Gopal Sahasranama be read?
- रोज़ एक बार पूरा पाठ पर्याप्त है, प्रातः या संध्या को। फलश्रुति एकादशी, द्वादशी, रविवार, शुक्रवार और कार्तिक पूर्णिमा को विशेष बताती है और विशेष साधना के रूप में एक सौ आठ बार पाठ की बात करती है; पर कोई संख्या अनिवार्य नहीं, नियमितता और श्रद्धा अधिक महत्त्व की हैं।One full reading a day, morning or evening, is enough. The phalashruti singles out Ekadashi, dvadashi, Sundays, Fridays and Kartika Purnima, and speaks of a hundred and eight readings as a special practice; but no number is compulsory, and regularity and faith matter more.
- गोपाल सहस्रनाम पढ़ने के क्या लाभ हैं?What are the benefits of reading the Gopal Sahasranama?
- फलश्रुति कहती है कि इसका पाठ पाप और बड़े रोग दूर करता है, दरिद्रता हटाता है और बड़े यज्ञों का फल देता है, और जिस घर में यह पूजित होकर रहता है वहाँ महामारी, अकाल और उपद्रव नहीं होते तथा गोपाल सदा निवास करते हैं। ये श्रद्धा के कथन हैं; अधिकतर पाठक इससे मन की शान्ति और श्रीकृष्ण के प्रति प्रेम का अनुभव बताते हैं।The phalashruti says that the reading removes sin and grave illness, lifts poverty and brings the fruit of great sacrifices, and that the house where it is kept and worshipped is free of epidemic, famine and calamity, with Gopala living there for ever. These are statements of faith; most readers speak of peace of mind and a growing love for Krishna.
- गोपाल सहस्रनाम पढ़ने के नियम क्या हैं?What are the rules for reading the Gopal Sahasranama?
- स्नान करके स्वच्छ स्थान पर, राधा-कृष्ण या गोपाल के चित्र के सामने दीपक जलाकर पाठ करें; परम्परा में तुलसी की माला और पीला वस्त्र शुभ माने गए हैं। विनियोग, न्यास और ध्यान के बाद नाम पढ़े जाते हैं, और फलश्रुति के अनुसार पाठ के समय राधा का स्मरण रखा जाता है। स्तोत्र इसे दिखावे के लिए नहीं, विनय और भक्ति से पढ़ने को कहता है।Read after a bath, in a clean place, before a picture of Radha and Krishna or of Gopala, with a lamp lit; by tradition a tulasi mala and yellow clothes are considered auspicious. The names are read after the viniyoga, the nyasas and the dhyana, and, as the phalashruti asks, Radha is kept in mind during the reading. The hymn asks to be read with humility and devotion, not for show.
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